सब्जियों के इस गांव में महिला किसान मजदूरी नहीं, करती हैं खेती और निकालती हैं सालभर का घरखर्च

सब्जियों के इस गांव में महिला किसान मजदूरी नहीं, करती हैं खेती और निकालती हैं सालभर का घरखर्चखेतों में काम करतीं महिला किसान।

नीतू सिंह, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

सोरांव (इलाहाबाद)। जिन महिलाओं की कम खेती है वो महिलाएं अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए अब दूसरों के खेत में मजदूरी नहीं करतीं बल्कि अपने कम खेत में ही सब्जियों की खेती करके अपना खर्चा चला रही हैं।

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इलाहाबाद जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर सोरांव ब्लॉक के अरइसपुर डिहवा गाँव के किसान छोटी जोत के हैं। सोरांव ब्लॉक के आसपास के कई गाँव के किसान सब्जियों की खेती करते हैं। गेहूं और धान की मुख्य फसल लेने के बाद जब खेत खाली हो जाते हैं, उस समय सब्जियां बो कर यहां के किसान अच्छा मुनाफा कमा लेते हैं। अरइसपुर डिहवा गाँव की रहने वाली पुष्पा देवी (38 वर्षीय) का कहना है, “हमारा गाँव सब्जियों के लिए जाना जाता है, सब्जियों की बोआई मार्च में शुरू हो जाती है और जून जुलाई तक सब्जियां बाजार में बिकती रहती हैं।” आसपास गाँव की जिन महिलाओं के पास अपनी खेती नहीं है, उन महिलाओं ने महिला समाख्या के समूह से जुड़कर शुरुआत सामूहिक खेती से की और आज उनकी रोजी रोटी चल रही है।

पहले सब्जियों में उतना अच्छा उत्पादन नहीं ले पाते थे ,अब एक दूसरे के देखा देखी नई-नई चीजें सीख रहें हैं, सब्जी की खेती में अब अच्छी पैदावार भी हो रही है और अच्छा मुनाफा भी मिल रहा है, कई बार जब भाव सस्ता होता है तब थोड़ा परेशानी होती है, इसलिए कई तरह की सब्जियां लगाते हैं जिससे एक के घाटे की भरपाई दूसरे से हो जाए।
अमरावती, महिला किसान

धारूपुर गाँव की रहने वाली अमरावती (48 वर्षीय) खुश होकर बताती हैं, “आठ दस विसुवा में दो तीन हजार की लागत लगाकर मूली बो लेते हैं, दो तीन महीने में 8-10 हजार आराम से आ जाता है, इन सब्जियों की बेचाई से ही हमारा पूरे साल का घरेलू खर्चा चलता है।”

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