जलभराव वाले क्षेत्रों में धान बुवाई का ये उचित समय

जलभराव वाले क्षेत्रों में धान बुवाई का ये उचित समयधान की बेड़ लगाते किसान।

लखनऊ। खरीफ की मुख्य फसल धान की खेती की तैयारी का समय शुरू हो चुका है। धान की रोपाई विधि से बुवाई के लिए मई के अंतिम सप्ताह से जरई (नर्सरी) डालने का काम शुरू होगा। उत्तर में सिंचित और असिंचित क्षेत्रों के अलावा बहुत बड़ा भू-भाग जल प्लावित क्षेत्रों का है। जहां पर धान की खेती के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने विशेष प्रजातियों की खोज की है। जिसकी बुवाई करने का यह सही समय है।

उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद की मौसम आधारित राज्य स्तरीय कृषि परामर्श समिति की बैठक में कृषि वैज्ञानिकों ने प्रदेश के जलभराव वाले क्षेत्रों जहां खेत में 50 से लेकर 100 सेंटीमीटर तक पानी कम से कम 30 दिन रहता है वहां पर धान की जलनिधि एवं जलमग्न की सीधी बुवाई करने का निर्देश किसानों को दिया है। इस बारे में उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक प्रो. राजेन्द्र कुमार ने बताया '' जल-जमाव और बाढ़ वाले क्षेत्रों में धान की बुवाई के लिए कई प्रजातियों का अलग-अलग संस्थानों से विकसित किया है। जल लहरी और एनडीआर-8002 प्रजातियों की बुवाई करके किसान अच्छी पैदावार ले सकते हैँ। ''

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उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के अनुसार उत्तर प्रदेश देश का ऐसा राज्य है जहां सिंचित, असिंचित, जल प्लावित, असिंचित ऊसरीली और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में की जाती है। उत्तर प्रदेश भूमि सुधार निगम प्रदेश में ऐसे क्षेत्रों में जहां जल प्लावित या उसर में कम उपज के डर से किसान धान की खेती करने से बचते हैं, ऐसे क्षेत्रों में किसानों को प्रमाणिक बीज और सुविधाएं देकर धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है।

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नरेन्द्र देव कृषि एंव प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डा.ए.के़ सिहं ने बताया धान विश्व की तीन महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसलों में से एक है, जो कि 2.7 बिलियन लोगों का मुख्य भोजन है। इसकी खेती विश्व में लगभग 150 मिलियन हेक्टेयर में होती है। एशिया इसकी खेती 135 मिलिटयन हेक्टेयर में की जाती है।

भारत में लगभग 44 मिलियन हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश में लगभग 5.9 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है। भारतीय चावल अनुंसधान संस्थान, हैदराबाद देशभर में धान की खेती का बढ़ावा देने के साथ ही किसान अधिक से अधिक पैदावार कैसे प्राप्त करें इसके लिए धान की नई किस्मों के विकास के साथ ही किसानों को प्रशिक्षण देने का काम कर रहा है। उत्रत प्रदेश के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के लिए इसने कई किस्में विकसित किया है।

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