यूपी में अधिक प्रोटीन वाले गेहूं को मिलेगा बढ़ावा

यूपी में अधिक प्रोटीन वाले गेहूं को मिलेगा बढ़ावाइस गेहूं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सामान्य गेहूं के मुकाबले प्रोटीन की मात्रा 1.5 से 2.0 अधिक पाई जाती है।

लखनऊ। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से परंपरागत गेहूं की गुणवत्ता और पौष्टिकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में कम खाद-पानी और उर्वरक के कम इस्तेमाल के बाद भी अधिक उपज देने वाले ड्यूरम गेहूं की मांग बढ़ रही है। इस गेहूं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सामान्य गेहूं के मुकाबले प्रोटीन की मात्रा 1.5 से 2.0 अधिक पाई जाती है।

साथ ही इसमें विटामिन-ए की अधिकता और बीटा कैरोटीन और ग्लूटीन भी पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है जिससे सूजी-रवा, पिज्जा, स्पेघेटी, सेवइयां, नूडल्स और शीघ्र पचन वाले पौष्टिक आहारों के लिए ड्यूरम गेहूं का इस्तेमाल हो रहा है। डयूरम गेहूं को कठिया गेहूं के नाम भी जाना जाता है।

राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय बाजार में ड्यूरम गेहूं की बढ़ती हुई मांग को देखते हुए उत्तर प्रदेश कृषि विभाग प्रदेश के किसानों में ड्यूरम गेहूं की खेती को बढ़ावा देने के लिए काम शुरू किया है। इस गेहूं से किसान अपनी आर्थिक स्थिति को किसान मजबूत करें, इसके लिए प्रचार-प्रसार शुरू किया गया है।
ज्ञान सिंह, निदेशक, उत्तर प्रदेश कृषि विभाग

ड्यूरम गेहूं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कम सिंचिंत क्षेत्र भी इसकी खेती हो सकती है। इसमें सिंचाई की कम जरूरत पड़ती है। गेहूं की इस किस्म में सूखा प्रतिरोधी क्षमता अधिक पाई जाती है। गोविंद बल्लभ पंत कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर आरपी सिंह ने बताया, “ड्यूरम गेहूं में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक पाई जाती है, इसके लिए तीन सिंचाई ही पर्याप्त होती है। इसकी पैदावार प्रति हेक्टेयर 40 से 50 कुंतल होती है।”

उन्होंने बताया के उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए ड्यूरम गेहूं की खेती काफी मुफीद रहेगी। पानी के कारण सूखा की समस्या से ग्रसित यहां के किसान खेत-तालाब योजना का लाभ उठाकर अपने खेत के पानी की सहायता से ड्यूरम गेहूं की खेती आसानी से कर सकते हैं। इससे एक तरह वहां के लोगों को खाद्यान्न सुरक्षा मिलेगी साथ ही पोषक तत्वों से युक्त इस गेहूं के सेवन से यहां के लोगों में पोषण की जो कमी है उसे भी पूरा किया जा सकता है।

भारत में इसकी खेती बहुत पुरानी है। पहले यह उत्तर-पश्चिम भारत के पंजाब में अधिक उगाया जाता था, इसके बाद दक्षिण भारत के कनार्टक, गुजरात के काठियावाड़ और पूर्व से पश्चिम बंगाल में फैला। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में भी इसकी बड़ी मात्रा में खेती होती थी, लेकिन बदलते समय के साथ इसकी खेती कम होती चली गई। लेकिन एक बार फिर से मध्य भारत खासकर मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र, गुजरात के सौराष्ट और काठियावाड़, राजस्थान का कोटा, मेवाड़, उदयपुर और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में इसकी खेती होने लगी है।

कई दशक पहले बुंदेलखंड में ड्यूरम गेहूं की होती थी बड़ी मात्रा में खेती

लखनऊ। पूरे देश में डयूरम गेहूं की खेती लगभग 25 लाख हेक्टेयर में की जाती है। इस बारे में जानकारी देते हुए भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान करनाल के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. रतन तिवारी ने बताया “ड्यूरम गेहूं की खेती मध्य और दक्षिण भारत के उष्ण जलवायु क्षेत्र में की जाती है। यह गेहूं ट्रिटकम परिवार में दूसरे स्तर का महत्वपूर्ण गेहूं है। गेहूं के तीनों उप परिवारों एस्टिवम, ड्यूरम और कोकम में उत्पादन की दृष्टि से ड्यूरम का दूसरा स्थान है।”

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