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सरकारी रिपोर्ट : किसान की आमदनी 4923 , खर्चा 6230 रुपए

Ashwani NigamAshwani Nigam   12 Sep 2017 5:36 PM GMT

सरकारी रिपोर्ट : किसान की आमदनी 4923 , खर्चा 6230 रुपएपढ़िए कैसे कर्जदार हो रहा है किसान

अश्वनी निगम/ अरविंद शुक्ला

लखनऊ। केंद्र सरकार की ओर से वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी की योजना धरातल से कितनी दूर है, इसकी बानगी देखना हो तो गाँवों में जाइए।

लखनऊ से 30 किमी. दूर बीकेटी ब्लॉक के पालपुर गाँव के किसान संतराम (45 वर्ष) पांच बीघे में धान की खेती किए हैं, लेकिन अच्छी उपज के बाद भी उनको लाभ मिलेगा, इस पर संदेह है। संतराम बताते हैं, "हर साल खेती की लागत बढ़ रही, उपज भी अच्छी हो रही है, लेकिन उपज का भाव अच्छा नहीं मिल रहा। दूसरा कुछ काम नहीं कर सकते इसलिए खेती कर रहे हैं, मौका मिले तो खेती छोड़ दूंगा।"

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केंद्रीय कृषि मंत्रालय किसानों की आय दोगुनी करने के लिए जिस प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड और कृषि बाजार में सुधार की योजनाओं का अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है, मगर जमीनी हकीकत यह है कि अधिकतर किसानों तक यह योजना पहुंची ही नहीं है। संतराम आगे बताते हैं, "कृषि विभाग की कोई भी योजना का लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है। चक्कर लगाए पर फसल बीमा नहीं हो पाया।"

संतराम जैसे अधिकतर किसानों का यही हाल है। लखनऊ से 400 किमी. दूर ललितपुर के ग्राम टीकरा तिवारी, कचनौंदाकला के रमेश तिवारी बताते हैं, "10 बीघा खेत में पिछले साल उर्द लगाया था, कर्ज लेकर खाद पानी की व्यवस्था की थी, लेकिन अच्छी उपज के बाद सिर्फ इतनी आय हुई कि किसी तरह कर्ज दे पाया।" आगे कहा, "दोगुनी आय छोड़िए जो थोड़ी बहुत आमदनी है वह भी दिनों-दिन घट रही है।"

किसानों की आय दोगुनी करने के दावे को कृषि से जुड़े विशेषज्ञ भी हवा-हवाई बता रहे हैं। किसानों के मुद्दे पर लिखने वाले देश के जाने-माने पत्रकार पी. साईनाथ कहते हैं, "देश में बीज, उर्वरक, कीटनाशक और साथ ही कृषि यंत्रों की कीमत तेजी से बढ़ी है, जिसका नतीजा है कि कृषि लागत तेजी से बढ़ी है, लेकिन सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से बच रही है। सरकार जानबूझकर कृषि को किसानों के लिए घाटे का सौदा बना रही है ताकि किसान खेती-बाड़ी छोड़ दें और फिर कृषि कॉर्पोरेट के लिए बेतहाशा फ़ायदे का सौदा हो जाए।"

उत्तर प्रदेश कृषि विभाग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यूपी के किसानों की औसत मासिक आय मात्र 4,923 रुपए है, जो किसानों की राष्ट्रीय मासिक औसत आय 6,426 से कम है। वहीं, किसान का मासिक खर्च 6230 रुपए है, जो उसकी मासिक आय से 1307 रुपए अधिक है। ऐसे में प्रदेश का किसान हर महीने कर्जदार हो रहा है।

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यह पूछने पर कि केंद्र सरकार वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात कह रही है, क्या यह संभव है, उसके जवाब में इलाहाबाद जिले के दांडी गाँव निवासी गोविंद पासवान बताते हैं, "ऐसा कोई ठोस कदम सरकार की तरफ से नहीं दिखा जिससे यह सपना पूरा होता मान लिया जाए कि वर्ष 2022 तक हम किसानों की आय दोगुनी हो सकती है।"

किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले स्वराज इंडिया के संयोजक योगेन्द्र यादव बताते हैं, "आज देश एक बहुत बड़े कृषि संकट के दौर से गुज़र रहा है। किसान भारी कर्ज़े में डूबा हुआ है। हर दिन कहीं न कहीं से अन्नदाता के खुदकुशी की खबरें आती हैं। देश का पेट भरने वाला किसान खुद अपने परिवार का पेट नहीं पाल पा रहा। कर्ज़ न चुका पाने के अपमान के कारण अपनी जान तक देने को मजबूर हो रहा है। जिन कारणों से खेतीबाड़ी की ये स्थिति है, जिनकों दूर करने के लिए सरकारें काम नहीं कर रही हैं।"

सरकार जानबूझकर कृषि को किसानों के लिए घाटे का सौदा बना रही है ताकि किसान खेती-बाड़ी छोड़ दें और फिर कृषि कॉर्पोरेट के लिए बेतहाशा फ़ायदे का सौदा हो जाए।
पी. साईनाथ, रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता पत्रकार

पी. साईनाथ, रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता पत्रकार

योगेंद्र यादव आगे कहते हैं, "आज स्थिति ऐसी है कि कोई भी किसान अपने बच्चे को किसान नहीं बनाना चाहता। जिनके पास खेती की ज़मीन है वो लोग भी मजबूर होकर गाँव से पलायन कर रहे हैं। गाँव में खेती करने के बजाए शहर में रिक्शा चलाने को, मज़दूरी करने को भी तैयार हैं किसान। ऐसे में केन्द्र सरकार का वर्ष 2022 तक किसान की आय दोगुनी करने का दावा सिर्फ लोकलुभावन घोषणा के अलावा कुछ नहीं है।"

किसानों की स्थिति दिनों-दिन खराब कैसे हो रही है, इसको लखनऊ से सटे चिनहट ब्लाक के डल्लखेड़ा गाँव के रहने वाले किसान रामदुलारे यादव बताते हैं, "खेती में लागत बढ़ती जा रही है, खाद पानी देने से उपज भी ठीक-ठाक हो रही, लेकिन उपज का जो दाम मिलना चाहिए, नहीं मिल रहा, इसलिए खेती से निराशा होती है।"

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इलाहाबाद जिले के नैनी के चांडी गाँव निवासी रामदुलारे यादव (56 वर्ष) का कहना है, "खेती से कहां लाभ होता है, आय उतनी ही हुई कि खाद बीज का पैसा निकल आया।" आगे कहते हैं, "धान की खेती से तो इसकी भी उम्मीद नज़र नहीं आ रही है, क्योंकि सूखा पड़ने का आसार नजर आने लगा है। आगे भी आय बढ़ने के आसार नहीं दिख रहे हैं।"

एटा जिले के मारहरा निवासी किसान नुसूर अहमद बताते हैं, "पिछले साल मटर और मक्का की अच्छी खेती की थी। छह हजार रुपए बीघा मटर की लागत आई, मटर की पैदावार अच्छी रही लेकिन मण्डी में दाम नही मिल सके, तीन हजार रुपए बीघा मक्का में लागत आई, लेकिन 4-5 बीघा मक्का कम हुई और दाम भी कम रहा, इस हिसाब से कोई अच्छा लाभ नहीं मिल सका, मेहनत लगाकर देखा जाए तो इस वर्ष घाटे में रहे।"

कर्ज के चक्रव्यूह में किसान।

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