जीरा उगाना किसानों के लिए बनेगा हीरा

जीरा उगाना किसानों के लिए बनेगा हीराजीरा

लखनऊ। मसालों के रूप में जीरा की मांग पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। जिसमें भी काले जीरे की मांग यूरोपीय देशों में सबसे ज्यादा है। ऐसे में केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान जोधपुर राजस्थान और जड़ी बूटी शोध संस्थान चमोमी उत्तराखंड के वैज्ञानिकों ने जीरा की खेती के लिए किसानों को बढ़ावा देने के लिए जीरा की नई किस्मों को विकसित करके वितरित कर रहे हैं।

केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान जोधपुर राजस्थान के कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमपी सिंह ने बताया, ''जीरे की बुवाई एक नवंबर से लेकर 25 नवंबर के बीच उस समय करना चाहिए जब तामपान 20 से लेकर 25 सेंटीग्रेड रहे।'' उन्होंने बताया कि जीरा मसाले वाली मुख्य बीजीय फसल है। देश का 80 प्रतिशत से अधिक जीरा गुजरात और राजस्थान में उगाया जाता है।

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उन्होंने बताया कि किसानों के लिए जीरे के आरजेड-19, आरजेड-209 जीसी-4 और आरजेड-223 नामक प्रजातियां विकसित की गई हैं। यह किस्में जीरे में लगने वाले उखठा और झुलसा रोगों के प्रति प्रतिरोधी हैं। जीरे की फसल बलुई दोमट और दोमट में अच्छे से होती है।

काले जीरे की खेती भी अब किसानों की पहल पंसद बन रही है। हिमांचल और उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में काले जीरे (बोनियम परसिकम) की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है। यहां पर इस खेती की शुरूआत भोटिया जनजाति के लोगों की ओर से की गई, लेकिन उसके बाद यह खेती कम हो गई थी। ऐसे में हिमाचल में उगाए जाने वाले काले जीरे को जड़ी बूटी शोध संस्थान के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाने की मुहिम शुरू की तो किसानों ने इसे हाथों हाथ लिया।

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हिमाचल में सेब बागानों के अंदर इस काले जीरे को उगाकर किसान लाखों कमाते हैं। इन्हीं संभावनाओं को आगे बढ़ाते हुए शोध संस्थान के वैज्ञानिकों ने चमोली के जोशीमठ, पिथौरागढ़ के धारचूला, मुनस्यारी में काला जीरा की खेती कर किसानों को आमदनी की नई राह दिखाई।

जड़ी बूटी शोध संस्थान चमोली के वैज्ञानिक डॉ. विजय प्रसाद भट्ट ने बताया, ''काले जीरे के बीजों का उच्च क्वालिटी के मसालों के रूप में प्रयोग होता है। इसका बाजार भाव 1500 रुपए प्रति किलोग्राम है। यह खाने में स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ पेट की बीमारियों, जैसे भूख न लगना, एसिडिटी, कब्ज को ठीक करता है।''

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उन्होंने बताया कि काले जीरे से तेल भी बनाया जाता है। विदेशों में इसके सुगंधित तेल को उच्च क्वालिटी की शराब में मिलाकर सुगंधित बनाया जाता है। यूरोप के बाजारों में काले जीरे की मांग इतनी है कि अभी तक मांग के अनुरूप भारत से मात्र 10 प्रतिशत ही हो पा रही है।

भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतगर्त आने वाले मसाला बोर्ड के अनुसार जीरा एक छोटे-से पतले वार्षिक शाक का शुष्क, भूरे रंगवाला सफेद फल है। इस फल के ऊपरी भाग पर पांच स्पष्ट रेखाएं, एकान्तर रूप में चार अस्पष्ट मध्यम रेखाएं और असंख्य छोटे रोयें होते हैँ। इसका पौधा 15.5 से.मी. ऊंचा होता है। इसके सफेद या गुलाबी रंग के फूल छोटे-छोटे पुष्पछत्रों में खिलते हैं।

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जीरे का उत्तत्ति का स्थान उत्तर ईजिप्ट, सीरिया, मेडिटेरेनियन क्षेत्र, ईरान और भारत का माना जाता है। मेक्सिको, चीन, सिसिली और माल्टा में भी इसकी खेती की जाती है। जीरा उष्ण कटिबन्धी पौधा है और इसकी खेती ऐसे इलाकों मे जहां फरवरी-मार्च के दौरान वायुमण्डलीय आर्द्रता कम रहती है, रबी फसल के रूप में की जाती है।

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