राजमा की 6 नई वैरायटी लॉन्च, खेती के लिए अभी से करें तैयारी

राजमा की 6 नई वैरायटी लॉन्च, खेती के लिए अभी से करें तैयारीराजमा की खेती।

लखनऊ। शाकाहारी भोजन में राजमा की मांग देश-दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। राजमा की खासियत यह है कि एक तरफ जहां स्वादिष्ट और स्वास्थवर्धक है वहीं दूसरी तरफ इसकी खेती से किसानों को अच्छा मुनाफा मिलता है।

देश में राजमा की खेती को बढ़ावा देने के लिए आधा दर्जन राजमा की नई किस्मों को विकसित किया है गया है, जिनकी इस बार के रबी सीजन में खेती करके किसान अच्छा उत्पादन कर सकते हैं। राजमा की बुवाई का समय अक्टूबर के तीसर सप्ताह से शुरू होता है, ऐसे में कृषि विभाग ने किसानों को अभी से राजमा की बुवाई की तैयारी करने की सलाह जारी की है।

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राजमा की खेती दोमट और हल्की दोमट मिट्टी जहां पानी निकासी की अच्छी व्यवस्था हो वहां पर अच्छे से हो सकती है। नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. ए.के. सिंह ने बताया, ''राजमा की बुवाई से पहले खेत की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए, इसके बाद 2 या 3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करने पर खेत तैयार हो जाता है। बुवाई के समय भूमि में पर्याप्त नमी अति आवश्यक है।''

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उन्होंने बताया कि देश के उत्तरपूर्व भाग में राजमा की बुवाई का समय अक्तूबर के आखिरी हफ्ते से ले कर नवंबर के पहले हफ्ते तक होता है लेकिन देश के उत्तरपश्चिमी भागों (उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब) में अकटूबर के पहले सप्ताह इसकी बुवाई करते हैं। देर से बुवाई करने पर राजमा की उपज में भारी गिरावट हो जाती है क्योंकि ऐसी अवस्था में तापमान में गिरावट के कारण राजमा के पौधों की बढ़ोतरी घट जाती है। जिससे फलियों की संख्या और दानों के भार दोनों में कमी आ जाती है।

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राजमा की खेती के लिए 120 से लेकर 140 किलोग्राम बीज की प्रति हेक्टेयर जरूरत होती है. खास बात यह है कि राजमा से अधिकतम उत्पादन लेने के लिए ढाई से साढ़े 3 लाख पौधे प्रति हेक्टेयर जरूरी होते हैं। पौधों की यह संख्या दानों के भार के अनुसार हासिल की जा सकती है।

राजमा की बुवाई करते समय एक पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-40 सेंटीमीटर होनी चाहिए। बीज को 8-10 सेंटीमीटर गहराई में थीरम से बीज उपचार करने के बाद डालना चाहिएं ताकि पर्याप्त नमी मिल सके।

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राजमा में 2 या 3 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। बुवाई के चार सप्ताह बाद पहली सिंचाई करनी चाहिए। पहली सिंचाई के बाद निराई एवं गुड़ाई करनी चाहिए। गुडाई के समय थोड़ी मिट्टी पौधे पर चढ़ा देनी चाहिए ताकि फली लगने पर पौधे को सहारा मिल सके। फसल उगने के पहले पेन्डीमेथलीन का छिड़काव 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से करनी चाहिए।

राजमा ऐसी दलहनी फसल है, जो मिट्टी की बिगड़ती हुई सेहत को भी कुछ हद तक सुधारने का माद्दा रखती है। राजमा की खेती परंपरागत ढंग से देश के पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है, पर इस फसल की नवीनतम प्रजातियों के विकास के बाद इसे उत्तरी भारत के मैदानी भागों में भी सफलतापूर्वक उगाया जाने लगा है।

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राजमा की उन्नत किस्में

1-पी.डी.आर.-14 (उदय) राजमा की लाल चित्तीदार रंगी प्रजाति है। 125 से लेकर 130 दिनों में यह तैयार हो जाती है। प्रति हेक्टेयर 30 से लेकर 35 कुंतल इसकी पैदावार होती है।

2-मालवीय-15- सफेद रंगी राजमा की यह प्रजाति 115 से लेकर 120 दिन में तैयार हो जाती है। प्रति हेक्टेयर 25 से लेकर 30 कुंतल इसकी पैदावार होती है।

3-मालवीय-137- राजमा की यह प्रजाति लाल रंगी की होती है, जो 110 से लेकर 115 दिन में तैयार हो जाती है। प्रति हेक्टेयर 25 से लेकर 30 कुंतल इसकी उपज होती है।

4-वीएल-63-राजमा की यह प्रजाति भूरा चित्तीदार होती है। 115 से लेकर 120 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी उपज भी प्रति हेक्टेयर 25 से लेकर 30 कंतल होती है।

5-अम्बर-राजमा की यह प्रजाति लाल चित्तीदार होती है। यह 20 से लेकर 25 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी उपज 20 से लेकर 25 कुंतल प्रति हेक्टेयर होती है।

6-उत्कर्ष- गहरा लाल चित्तीदार रंग की यह प्रजाति 130 से 135 दिन में तैयार हो जाती है। प्रति हेक्टेयर 20 से लेकर 25 कुंतल इसकी उपज होती है।

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