पानी की कमी से जूझ रहे पश्चिम बंगाल के किसानों ने खोजा बोरो धान का विकल्प

पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले में किसान रबी के मौसम में भी बोरो धान की खेती करते थे, लेकिन बारिश की अनियमतिता व सिंचाई के संसाधनों ने किसानों के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी। ऐसे में किसानों का रुझान दूसरी फसलों की तरफ बढ़ा, इसमें उनकी मदद की कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने।

पानी की कमी से जूझ रहे पश्चिम बंगाल के किसानों ने खोजा बोरो धान का विकल्प

पिछले कुछ वर्षों में बोरो धान की खेती करने वाले किसानों के सामने सिंचाई के संसाधनों की कमी से समस्या आयी की क्या करें, ऐसे में कृषि विज्ञान केन्द्र की मदद से मूंगफली की खेती उनके लिए मददगार साबित हो रही है।
पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले में किसान रबी के मौसम में भी बोरो धान की खेती करते थे, लेकिन बारिश की अनियमतिता व सिंचाई के संसाधनों ने किसानों के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी। ऐसे में किसानों का रुझान दूसरी फसलों की तरफ बढ़ा, इसमें उनकी मदद की कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने।

अब बोरो धान नहीं मूंगफली की खेती कर रहे किसान। फोटो- आईसीएआर

कृषि विज्ञान केन्द्र, पश्चिम मेदिनीपुर के वैज्ञानिक डॉ. एके मैती बताते हैं, "ये पूरा जिला बोरो धान की खेती के लिए जाना जाता है, लेकिन लगातार धान में होते नुकसान से किसानों के लिए एक विकल्प ढूंढना था, किसानों ने कई तरह की दूसरी फसलें और सब्जियों की खेती की लेकिन उतना फायदा नहीं हो पाया था।"
ऐसे में साल 2005-06 में पश्चिम मेदिनीपुर के जामरासुली, धुलीपुर, आस्थापारा और तुरा जैसे चार गाँवों के किसानों के एक समूह ने कृषि विज्ञान केन्द्र पर संपर्क किया और इस उत्पाद के लिए वैकल्पिक फसल खोजने के लिए सलाह मांगी, जिसमें उत्पादकता और विपणन क्षमता के मामले में आश्वासन दिया गया।
समस्या से निपटने के लिए केवीके के वैज्ञानिकों ने गाँव में जाकर वहां की खेती के बारे में समझा, कि बेहतर विकल्प क्या हो सकता है। किसानों से बातकर और वहां के बारे में पूरी जानकारी इकट्ठा कर केवीके ने चयनित गाँवों में क्षेत्र के लिए वैकल्पिक फसल में 'मूंगफली' पेश करने का फैसला किया। वास्तव में मूंगफली की खेती के कार्यक्रम को लागू करने से पहले संबंधित विभाग से नमी, सूरज की रोशनी, बादलों के दिनों आदि पर विस्तृत मौसम संबंधी जानकारी भी एकत्र की गई थी।
शुरुआत में केवीके ने टीजी-26, टीजी-38 बी, टीपीजी-41 और टीएजी-24 जैसी मूंगफली की चार किस्मों की बुवाई की गई। वैराइटल मूल्यांकन ने बीजों से पैदा होने वाली बीमारियों और कीट नियंत्रण के खिलाफ उपायों के प्रदर्शन का पालन किया। आखिर में टीएजी-24 किस्म की खेती की शुरूआत की। केवीके की सहायता से 150 हेक्टेयर क्षत्र में मूंगफली की खेती की शुरूआत की गई।
डॉ. एके मैती आगे कहते हैं, "बोरो धान की खेती में किसानों को 16-20 सिंचाई करनी पड़ती थी, वहीं पर मूंगफली की खेती चार-पांच सिंचाई में ही हो जाती है। साथ ही मूंगफली की खेती से खेत की मिट्टी भी उपजाऊ हो जाती है।"
इसके अलावा, मूंगफली की खेती पर मिट्टी के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पश्चिम मेदिनीपुर के साथ-साथ पड़ोसी जिलों में भी मूंगफली का अच्छा बाजार है, जिससे किसानों को मूंगफली की खेती के लिए तुरंत वापसी और प्रोत्साहन मिल सके। मूंगफली की खेती पश्चिम मेदिनीपुर जिले तक ही सीमित नहीं है। पुरुलिया और बांकुरा जिलों में समान कृषि-जलवायु स्थितियों के किसानों ने बोरो चावल के स्थान पर मूंगफली को अपनाना शुरू कर दिया है।

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