किसानों के लिए बनाई गई योजनाओं में किसान होता है क्या ?

किसानों के लिए बनाई गई योजनाओं में किसान होता है क्या ?योजनाओं से उल्टे किसान को नुकसान ही हो रहा है।

नई दिल्ली। सरकार किसानों के लिए योजनाएं तो बनाती हैं लेकिन उसमें किसान होता है क्या ? किसानों को इन सरकारी योजनाओं का लाभ क्यों नहीं मिल पाता, आखिर ये योजनाएं असफल क्यों हो जाती हैं ? हम आज कुछ ऐसी ही योजनाओं की पड़ताल कर उनकी जमीनी हकीकत जानने की कोशिश करेंगे।

मंडी में भावों के उतार-चढ़ाव से किसानों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए पिछले दिनों मध्य प्रदेश सरकार ने 2017 के लिए चालू खरीफ के मौसम में प्रायोगिक आधार पर ‘‘मुख्यमंत्री भावांतर भुगतान योजना’’ शुरू की। इस योजना के तहत सरकार किसान को मंडी में उपज का दाम कम मिलने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य या औसत आदर्श दर से अंतर की राशि का सरकार सीधे किसान के खाते में भुगतान करेगी।

योजना 13 अक्टूबर से शुरू हो गई है। इसके लिए किसानों का रजिस्ट्रेशन भी करवाया गया। गड़बड़ी यहीं से शुरू हो गई। इससे पहले भी कई योजनाएं ऐसी रही हैं जिनकी पहुंच से किसान दूर रहे और परिणाम ये रहा कि योजना असफल रही। इस योजना का लब्बोलुआब भी कुछ ऐसा ही दिख रहा है। नेशनल ब्यूरो ऑफ इंडिया के सर्वे के अनुसार प्रदेश में किसानों की संख्या 54 लाख है, जबकि न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार 16 अक्टूबर तक इस योजना के लिए केवल 19 लाख 8 हजार किसानों का ही रजिस्ट्रेशन हुआ। योजना तो यहीं असफल हो गई। 35 लाख किसानों का तो रजिस्ट्रेशन ही नहीं हुआ, तो लाभ कहां से मिलेगा ?

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किसानों के सामने परेशानी ये है कि भावांतर को ढाल बनाकर व्यापारी समर्थन मूल्य पर फसल की खरीदी नहीं कर रहे हैं। किसानों की मांग है कि उनकी फसल समर्थन मूल्य पर खरीदना सुनिश्चित कराया जाए।

सीएम शिवराज की गेम चेंजर कही जा रही इस भावांतर योजना को लेकर किसानों की नाराजगी की वजह ये भी है कि सरकार ने बाजार मूल्य और एमएसपी के अंतर का ही भुगतान किसानों को देने का फैसला किया है। ये फायदा भी किसानों को खरीदी बंद होने के दो महीने बाद किया जाएगा। ऐसे में अब किसानों की मांग है कि भाव के अंतर के बजाए सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदी कराना सुनिश्चित कराए। योजना को लेकर उठ रहे सवालों के बाद सरकार के अधिकारी सामने आकर सफाई ज़रूर दे रहे हैं लेकिन किसानों को फायदा कैसे मिलेगा इस पर उनके पास भी कोई पुख्ता जवाब नहीं है।

16 अक्टूबर यानि भावांतर योजना लागू होने से पहले उन्हें सोयाबीन का प्रति क्विंटल भाव 2800 रुपए मिल रहा था, लेकिन योजना लागू होने के बाद व्यापारी 2200 से 2300 रुपए प्रति क्विंटल से ज्यादा देने के लिए तैयार नहीं हैं। जिसके कारण प्रति क्विंटल 500 रुपए तक नुकसान हो रहा है। इसी तरह व्यापारियों ने दाल और अन्य फसलों के भाव भी गिरा दिए हैं।

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सतना के किसान सुरेश मिश्रा का कहना है "भावांतर का पैसा कब मिलेगा और कितना मिलेगा पता नहीं, लेकिन फौरी तौर पर किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। किसानों को जानकारी नहीं है कि पैसा खातों में कब आएगा। सरकार के ऐलान के उलट किसान को कैश मिलने में भी भारी परेशानी हो रही है। ऐसे में किसान बेहद गुस्से में हैं।"

हरदा मंडी में किसानों ने कल दोपहर हंगामा कर दिया। इससे मंडी में खरीदी बंद हो गई। किसानों का कहना था कि उन्हें मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी 50 हजार तक का नगद भुगतान नहीं किया जा रहा है। किसानों ने कहा कि दस हजार की उपज बेची, उसका भी भुगतान नकद नहीं किया गया। हरदा के किसान नेता मनोज पटेल का आरोप है कि किसानों की उड़द और सोयाबीन की उपज समर्थन मूल्य से काफी कम रेट में खरीदी जा रही है।

उड़द 800 से 2200 रुपए क्विंटल तक खरीदी जा रही है, जबकि इसका समर्थन मूल्य 5400 रुपए प्रति क्विंटल है। इधर व्यापारी राजीव जैन का कहना है "जब आयकर विभाग हमें लिखित में नहीं देता कि पचास हजार नगद भुगतान करने पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हम नगद भुगतान नहीं करेंगे। किसानों के बवाल के बाद वहां के जिलाधिकारी ने किसानों को इकट्ठा न होने का फरमार जारी कर दिया है। अगर ऐसा होता है तो उनपर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। मतलब किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का पूरा दाम भी नहीं मिलेगा, और उन्हें एकजुट भी नहीं होने दिया जाएगा।

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धार में भी यही हाल है। जिले में किसानों को उड़द 1900 रुपए प्रति क्विंटल बेचनी पड़ी, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य 5400 रुपए प्रति क्विंटल है। स्थानीय किसान नेता विजय झाला ने बताया कि व्यापारियों ने मिली भगत कर के भाव ही गिरा दिया है। इसका सीधा-सीधा लाभ व्यापारी ले रहे हैं। किसान के 3500/ रुपए प्रति क्विंटल के नुकसान और इसकी भरपाई कैसे और कितनी होगी, इस बारे में किसी को नहीं पता। वहीं राजगढ़ के जिले की ब्यावरा मंडी में गुरुवार को सोयाबीन का सही दाम न मिलने पर किसानों ने हंगामा कर दिया। हंगामे के चलते मंडी में खरीदी बंद हो गई। किसानों का आरोप था कि सोयाबीन का समर्थन मूल्य 3050 रु तय है, जबकि व्यापारी दो हजार से 2500 रु प्रति क्विंटल खरीद रहे हैं।

भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश महामंत्री अनिल यादव का कहना है "जिस दिन से भावांतर योजना लागू हुई है, उसी दिन से व्यापारी कम दर पर सोयाबीन खरीद रहे हैं, पहले 3000 रुपये प्रति क्विंटल खरीद रहे थे और अब 2100 रुपए प्रति क्विंटल पर खरीद रहे हैं। इस पर किसानों ने नाराजगी जताई। इसके चलते तीन किसान नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

अभी तो योजना अपने पहले चरण में है। लेकिन जो स्थिति है उसे देखकर तो ये नहीं लगता कि योजना सफल होने वाली है। ये पहली बार नहीं है जब किसानों की योजना उनके लिए ही नुकसानदायक साबित हो रही है। और ऐसा पहली बार नहीं होगा ये योजना असफल हो जाए या इसमें आगे चलकर बदलाव किया जाएगा। देखते हैं ऐसी ही कुछ सरकार योजनाएं जो असफल साबित हुईं....

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फसल बीमा योजना में कई खामियां

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने इसी साल 22 जुलाई को अपनी रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' में कई खामियों को उजागर किया था। रिपोर्ट में बताया गया कि राज्यों द्वारा प्रभावित किसानों को बीमा राशि मुहैया कराने में की जा रही देरी के चलते किसानों को समय से वित्तीय मदद प्रदान करने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया।

रिपोर्ट में फसल बीमा योजना के तहत कई कमियों के बारे में बताया गया। इसमें बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा किसानों के खातों में बीमा राशि जमा करने अनियमितता सहित कई और खामियों का उल्लेख किया गया, साथ ही राज्य सरकारों को इस संबंध में उनके लिए आवंटित धनराशि समय पर देने के लिए एक प्रणाली विकसित करने की सिफारिश भी की गई थी। कैग का यह भी कहना है कि कृषि बीमा कंपनी (एआईसी) निजी कंपनियों को धनराशि देने से पहले उनके दावों के सत्यापन में तत्परता दिखाने में असफल रहा।

कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि जितने किसानों पर सर्वेक्षण किया गया, उनमें से दो तिहाई (66.66 फीसदी) किसानों को इस योजना की जानकारी ही नहीं थी। बता दें कि योजना के तहत लाभान्वित किसानों की संख्या बेहद कम पाई गई, जबकि ऋण न लेने वाले किसानों को नजरअंदाज किया गया। ये योजना किसानों के लिए वरदान बताई जा रही थी। लेकिन इसका हश्र हम सभी देख चुके हैं। भावांतर का हाल भी कुछ ऐसा ही लग रहा है।

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इस बारे किसाने नेता और स्वराज अभियान के फाउंडर मेंबर अविक शाह कहते हैं " योजनाओं के बारे में सब समझते हैं। सरकार अगर किसानों का भला करना चाहती है तो उसे किसान के भले को अपने दिमाग में लाना होगा, सोच राजनीतिक लाभ से ऊपर उठानी होगी। किसान और किसानी का भला एक साथ नहीं हो सकता। निजीकरण के चक्कर में किसान की योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा। किसान नीतियों में किसानों का नुकसान जुड़ा हुआ होता, योजना लागू करने से पहले उनपर विचार होना चाहिए।"

असफल सिंचाई योजना के लिए 9020 करोड़ रुपए ?

त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी) के तहत पिछले 20 वर्षों में 72000 करोड़ रुपए खर्च हुआ है। पिछले साल बजट के समय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि इस योजना के लिए सरकार 86500 करोड़ रुपए अगले पांच साल में खर्च करेगी। सरकार का इन वर्षों में 80 मिलियन हेक्टेयर खेती की जमीन की सिंचित करने का लक्ष्य है, जबकि 2014 में जारी आंकड़ों के अनुसार आजादी के बाद से 6.5 करोड़ खेत ही सिंचित हो पाए, मतलब सरकार पांच साल में उतनी जमीन सिंचित करेगी जितनी 69 सालों में नहीं हुई।

इस योजना को लेकर कैग ने जो रिपोर्ट जारी की थी वो तो और चौंकाने वाली थी। रिपोर्ट के अनुसार 2008 तक इस योजना पर 34,000 करोड़ रुपए खर्च हुए जबकि एआईबीपी 19 मिलियन हेक्टर सिंचाई के निर्धारित लक्ष्य में से पांच मिलियन से अधिक सिंचाई नहीं कर पाया, जो कि 29 फीसदी है। यह आंकड़े, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग), केन्द्रीय सरकार के लेखा परीक्षक के इस ऑडिट रिपोर्ट (2010) में सामने आए थे।

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आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 कहती है कि 2007 से 2011 के दौरान एआईबीपी द्वारा बनाई सिंचाई क्षमता में से केवल एक तिहाई खेत को वास्तविकता में पानी मिला है। कैग रिपोर्ट के अनुसार, “त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम, बड़ी सिंचाई परियोजनाओं और किसानों को सिंचाई के पानी के लाभों के वितरण की गति के लक्ष्य को पूरा करने में विफल रहा है।” ऐसे में अब सवाल से उठता है कि इस योजना पर सरकार और पैसे क्यों खर्च करना चाहती है। लाखों करोड़ों रुपए खर्च तो हो जाते हैं लेकिन उसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।

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