विश्व खाद्य दिवस विशेष : गेहूं के उत्पादन को घटा देगा जलवायु परिवर्तन

विश्व खाद्य दिवस विशेष : गेहूं के उत्पादन को घटा देगा जलवायु परिवर्तन16 अक्टूबर विश्व खाद्य दिवस विशेष

लखनऊ। खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 के दौरान लगभग 19.46 करोड़ भारतीय (15.2 प्रतिशत) को कम भोजन मिला। यह हाल तब है जब भारत ने 2015-16 के दौरान भी उत्पादन 922.9 लाख टन गेहूं का उत्पादन किया। आने वाले दिनों में भारत में खाद्य संकट और बढ़ सकता है क्योंकि पिछले दो साल से देश में गेहूं का रिकार्ड उत्पादन कर रहे देश में इस बार के रबी सीजन में बढ़ते तापमान के कारण गेहूं का उत्पादन घटने की संभवना है। गेहूं अनुसंधान निदेशालय, करनाल के अनुसार अगर मार्च महीने के औसत तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो गेहूं के उत्पादन में पांच प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है।

आज (16 अक्टूबर) विश्व खाद्य दिवस है। इस दिवस पर लोगों को जलवायु परिवर्तन से खाद्ध उत्पादन पर पड़ने वाले खतरे को लेकर जागरूक किया जाता है। मधुबनी से बीजेपी सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हुकुमदेव नारायण यादव की अध्यक्षता वाली कृषि संबंधी स्टैंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण गेहूं की फसल पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थानों ने बढ़ते तापमान पर जताई चिंता

गेहूं पर अनुसंधान करने वाले भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली और भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल ने भी अपनी एक रिपोर्ट में इस बात की चिंता जताई है कि जिस तेजी से तापमान बढ़ रहा है उससे गेहूं की फसल को नुकसान होने की बहुत संभावना है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2020 तक गेहूं के उत्पादन में चार से पांच मिलियन टन उत्पादन कम होगा। यहां के वैज्ञानिकों राजपाली मीना, चंद्रनाथ मिश्र और सतीश कुमार ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि गेहूं की फसल अधिक तापमान के प्रति संवेदनशील होती है और एक निश्चित तापमान से गेहूं की बालियों में स्वस्थ्य और सुडौल दाने नहीं बन पाते हैं। 36 डिग्री सेल्सियस तापमान गेहूं की फसल को पूरी तरह से नष्ट कर देता है।

एक उदाहरण के रूप में उन्होंने बताया कि साल 2004 में भारत के मैदानी क्षेत्रों में तापमान में अचानक से 3 से लेकर 6 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो गई थी जिसके कारण से फसल 10 से 20 दिन पहले ही पक गई थी, जिससे गेहूं के उत्पादन में चार मिलियन टन की गिरावट आई।

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उच्च तापमान या सूखे की स्थिति गेहूं के लिए हानिकारक

गेहूं अनुसंधान निदेशालय के प्रधान कृषि वैज्ञानिक रतन तिवारी ने बताया '' उच्च तापमान या सूखे की स्थिति गेहूं के लिए हानिकारक हैं। गेहूं के पकने के समय 14-15 डिग्री सेल्सियस के औसत तापमान की आवश्यकता है। अनाज भरने और विकास के समय में उचित तापमान की स्थिति उपज के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस अवधि के दौरान 25 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान अनाज का वजन कम कर देता हैं। अधिक तापमान रहने से गेहूं का पौधा बहुत अधिक ऊर्जा वाष्पीकरण के जरिए व्यर्थ कर देता है और कम पैदावार होती है। ''

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2050 तक पूरे देश में तापमान में होगी वृद्धि

कृषि विभाग की स्टैंडिग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि साल 2050 तक पूरे देश में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 2.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। जिसके कारण मानसून के महीनों में कमी आ जाएगी और बारिश कम होगी।

देश में इस साल 2016-17 में गेहूं का रिकार्ड 974.4 लाख टन उत्पादन हुआ है लेकिन देश में गेहूं की जो वार्षिक खपत 1000 लाख टन है उसकी तुलना में यह उत्पादन कम है। गेहूं भारत में मुख्य अनाज फसल है। देश में लगभग 29.8 मिलियन हेक्टेयर में गेहूं की खेती की जाती है।

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जलवायु परिवर्तन के कारण खेती में पड़ेगा गहरा असर

जब भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ तब गेहूं की फसल का उत्पादन और उत्पादकता काफी कम थी। वर्ष 1950-51 में गेहूं का उत्पादन केवल 6.46 मिलियन टन और उत्पादकता मात्र 663 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, जो कि भारतीय आबादी को खिलाने के लिए पर्याप्त नहीं थी। हमारा देश पीएल-480 के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे कई देशों से लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में गेहूं का आयात किया करता था। देश में हरित क्रांति के बाद गेहूं उत्पादन में देश अग्रणी देश बन गया लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण एक बार फिर गेहूं पर खतरा मंडरा रहा है।

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