इस समय गेहूं में बढ़ सकता है पीला रतुआ रोग का प्रकोप, समय से करें प्रबंधन 

इस समय गेहूं में बढ़ सकता है पीला रतुआ रोग का प्रकोप, समय से करें प्रबंधन इस बीमारी के लक्षण ज्यादातर नमी वाले क्षेत्रों में ज्यादा देखने को मिलते हैं

इस समय ज्यादातर क्षेत्रों में गेहूं की बुवाई हो गई है, इस समय नमी वाले तराई क्षेत्रों में गेहूं की फसल पीला रतुआ बीमारी होने की संभावना बढ़ जाती है, ऐसे में समय रहते किसानों को इस रोग का प्रबंधन करना चाहिए।

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मुख्यता पीला रतुआ पहाड़ों के तराई क्षेत्रों में पाया जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में इस रोग का प्रकोप पाया गया है। मैदानी क्षेत्रों में समान्यता गेहूं की अगेती और पछेती किस्मों में यह रोग छोटे-छोटे खंडों में क्षेत्रीय एकीकृत नाशीजीवी प्रबंधन केन्द्र द्वारा रिपोर्ट किया गया है।

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क्षेत्रीय एकीकृत नाशीजीवी प्रबंधन केन्द्र के संयुक्त निदेशक डॉ. टीए उस्मानी (फसल सुरक्षा) कहते हैं, "जनवरी और फरवरी में गेहूं की फसल में लगने वाले पीला रतुआ रोग आने की संभावना रहती है। निम्न तापमान और उच्च आर्दता पीला रतुआ के स्पोर अंकुरण के लिए सही होता है। हाथ से छूने पर धारियों से फफूंद के बीजाणू पीले रंग की तरह हाथ में लगते हैं। फसल के इस रोग के चपेट में आने से कोई पैदावार नहीं होती है।"

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार इस रबी सत्र में 283 लाख हेक्टेयर में गेहूं की बुवाई हुई है।

उत्तर भारत के पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में पीली रतुआ के प्रकोप से साल 2011 में करीब तीन लाख हेक्टेयर गेहूं के फसल का नुकसान हुआ था।

रोग के लक्षण एवं पहचान

डॉ. टीए उस्मानी आगे कहते हैं, "इस बीमारी के लक्षण ज्यादातर नमी वाले क्षेत्रों में ज्यादा देखने को मिलते हैं, साथ ही पोपलर व यूकेलिप्टस के आस-पास उगाई गई फसल में ये रोग पहले आती है। पत्तों पर पीला होना ही पीला रतुआ नहीं है, पीला रंग होने के कारण फसल में पोषक तत्वों की कमी, जमीन में नमक की मात्रा ज्यादा होना व पानी का ठहराव भी हो सकता है। पीला रतुआ बीमारी में गेहूं की पत्तों पर पीले रंग का पाउडर बनता है, जिसे हाथ से छूने पर हाथ पीला हो जाता है।"

  • पत्तों का पीलापन होना ही पीला रतुआ नहीं कहलाता, बल्कि पाउडरनुमा पीला पदार्थ हाथ पर लगना इसका लक्षण है।

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  • पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले रंग की धारी दिखाई देती है, जो धीरे-धीरे पूरी पत्तियों को पीला कर देती है।
  • पीला पाउडर जमीन पर गिरा देखा जा सकता है।
  • पहली अवस्था में यह रोग खेत में 10-15 पौधों पर एक गोल दायरे में शुरु होकर बाद में पूरे खेत में फैल जाता है।
  • तापमान बढ़ने पर पीली धारियां पत्तियों की निचली सतह पर काले रंग में बदल जाती है।

जैविक उपचार:

  • एक किग्रा. तम्बाकू की पत्तियों का पाउडर 20 किग्रा. लकड़ी की राख के साथ मिलाकर बीज बुवाई या पौध रोपण से पहले खेत में छिड़काव करें।
  • गोमूत्र व नीम का तेल मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर लें और 500 मिली. मिश्रण को प्रति पम्प के हिसाब से फसल में तर-बतर छिड़काव करें।
  • गोमूत्र 10 लीटर व नीम की पत्ती दो किलो व लहसुन 250 ग्राम का काढ़ा बनाकर 80-90 लीटर पानी के साथ प्रति एकड़ छिड़काव करें।
  • पांच लीटर मट्ठा को मिट्टी के घड़े में भरकर सात दिनों तक मिट्टी में दबा दें, उसके बाद 40 लीटर पानी में एक लीटर मट्ठा मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें।

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रसायनिक उपचार:

रोग के लक्षण दिखाई देते ही 200 मिली. प्रोपीकोनेजोल 25 ई.सी. या पायराक्लोट्ररोबिन प्रति लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। रोग के प्रकोप और फैलाव को देखते हुए दूसरा छिड़काव 10-15 दिन के अंतराल में करें।

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