इस तकनीक से गेहूं बोने पर कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी बेमौसम बारिश, वैज्ञानिकों ने किया सिद्ध 

इस तकनीक से गेहूं बोने पर कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी बेमौसम बारिश, वैज्ञानिकों ने किया सिद्ध भारत में लगभग 03 करोड़ हेक्टेयर में होती है गेहूं की खेती। फोटो- अभिषेक वर्मा

खेती में पहली बार ये सिद्ध हुआ है कि ज़ीरो टिलेज तकनीक से गेहूं की बुआई करने पर उत्पादन बढ़ जाता है। ये तरीका खासतौर पर मौसम के बदलावों और अनियमितताओं से लड़ रहे छोटे किसानों के खेती में अच्छे भविष्य के लिए एक सशक्त विकल्प हो सकता है।

ज़ीरो टिलेज तकनीक में किसान धान की कटाई के बाद बिना खेत से खरपतवार हटाए और बिना जुताई किये सीधे नई फसल के बीज बो देता है।

इस तरीके की पुष्टि हरियाणा के करनाल में 200 छोटे-मंझोले किसानों के साथ खेती के शोध के बाद की गई। इन 200 किसानों ने ज़ीरो टिलेज तकनीक से खेती करके ये पाया कि पहले पारम्परिक तकनीक के मुकाबले गेंहू की उपज औसतन 16 प्रतिशत ज़्यादा हुई। इस तकनीक का दूसरा फायदा ये पाया गया कि मौसम की अनियमितताओं के चलते दिसम्बर-फरवरी के दौरान की बेमौसम बारिश की स्थिति में भी गेहूं खराब नहीं हुए।

पारंपरिक तरीके से गेंहू की खेती किसानों के लिए एक खर्चीला व्यवसाय बन चुका है। पारम्परिक तरीके से खेती का मतलब ये हुआ कि किसान धान की फसल हटने के बाद पहले मजदूर लगाकर खरपतवार खेत से हटाएं, फिर दो-तीन पर ट्रैक्टर किराए पर लेकर पूरे खेत की जुताई करें। फिर अकेले या मजदूरों के माध्यम से छिड़काव करके बीज की बुआई होती है। इन प्रक्रियाओं के बाद एक राउंड रोटरी से फिर जुताई करनी पड़ती है।

बेमौसम बारिश से नहीं पड़ेगा गेहूं को फर्क

ज़ीरो टिलेज तकनीक से गेहूं की खेती करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें बेमौसम बारिश से फसल बर्बाद नहीं होती। हाल के कुछ वर्षों में विश्व भर के मौसम में आ रहे बदलावों का असर भारत की खेती पर भी पड़ा है। लगातार कुछ वर्षों से जनवरी से मार्च के दौरान होने वाली बारिश से देश की रबी की फसल में काफी नुकसान देखा गया है। लेकिन नई तकनीक गेहूं की फसल बर्बाद होने का ख़तरा कम हो जाता है।

''पारम्परिक तरीके से बोए गए गेहूं के बीज तेज़ बारिश से पानी भर जाने पर खराब हो जाते हैं,'' करनाल में हुई रिसर्च के मुखिया जीतेंद्र प्रकाश आर्यल ने बताया। जीतेंद्र की रिसर्च को गेहूं पर शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था सीमिट ने अपनी पत्रिका में प्रकाशित किया है।

जीतेंद्र ने बताया कि ज़ीरों टिलेज तकनीक में होता यह है कि गेहूं को बिना जुताई सीधे धान के खरपतवार के साथ एक निश्चित गहराई पर बो दिया जाता है। बुवाई में खास तरह की मशीन का इस्तेमाल होता है। धान के खरपतवार बारिश होन की स्थिति में न सिर्फ बीजों की रक्षा करते हैं बल्कि पानी तेजी से सोखकर फसल को बचाते हैं।

विश्व की बड़ी आबादी को रोज़गार देने वाले गेहूं के लिए ज़रूरी है ये नई तकनीक

भारत में लगभग तीन करोड़ हेक्टेयर में गेहूं की खेती की जाती है। एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में गेहूं करोड़ों लोगों को रोज़ाना खाना उपलब्ध कराने के लिए ज़रूरी फसल है। इस फसल पर करोड़ों किसानों की कमाई भी निर्भर है।

इतनी ज़रूरी फसल को मौसम के बदलावों से बचाने की बहुत ज़रूरत है। शोध में प्रकाशित जानकारी के अनुसार एशिया महाद्वीप के दक्षिणी हिस्से में तापमान में वृद्धि हो रही है और बेमौसम बारिश स्थिति और खराब बना रही है।

गेहूं जैसी फसल पर रात के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस का अंतर भी उपज में 6 प्रतिशत तक प्रभाव डालता है। ऐसे में गेहूं की फसल को मौसम के बदलावों से बचाने के लिए इस तरह की नई तकनीकों को अपनाना किसानों के लिए ज़रूरी होता जा रहा है।

हरियाणा ने नई तकनीक प्रमोट करने की बनाई योजना

हरियाणा सरकार ने ज़ीरो टिलेज तकनीक को प्रमोट करने की योजना बना ली है। इसके तहत सरकार इस तकनीके के लिए ज़रूरी बुवाई के औजार पर भारी सब्सिडी देने की बात कह रही है।

फिलहाल हरियाणा में कुल 25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की बुवाई होती है जिसमें नई तकनीक का इस्तेमाल करने वाले किसान 0.3 प्रतिशत से भी कम हैं।

बची फसल खेत में जलाने से मिलेगी फुरसत

ज़ीरो टिलेज तकनीक से खेती करने पर एक बड़ा बदलाव ये भी आएगा कि किसान जल्दबाज़ी में जो अभी धान काटने के बाद खरपतवार और बची फसल को खेत में आग लगाकर हटाते हैं, वो बंद होगा। इससे पर्यावरण पर पड़ रहे बुरे प्रभाव में कमी आएगी।

देश के उत्तरी राज्यों में बची फसल खेत में जलाना इतना बड़ा मुद्दा बन चुका है कि पर्यावरण के मामलों की देश की न्यायालय NGT ने राज्य सरकारों को इस विषय पर फटकार लगाई है।

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