खेती में खर्च तो बढ़ा लेकिन आमदनी नहीं

खेती में खर्च तो बढ़ा लेकिन आमदनी नहींGaon Connection

लखनऊ। लगातार मौसम में आते बदलाव, खेती में बढ़ते खर्च और कम मुनाफा ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी है। लगातार दो वर्षों से सूखा पड़ने से खरीफ और बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि से रबी की फसल बर्बाद हो रही है।

लखनऊ से लगभग 40 किमी दूर उन्नाव जिले के हसनगंज ब्लॉक के नसरतपुर गाँव के किसान राम प्रसाद (45 वर्ष) सब्जियों की खेती करते हैं, वह कहते हैं, “टमाटर की फसल के बाद अब मूंग की फसल की बुवाई करेंगे।” खेती में बढ़ती लागत और कम मुनाफे ने इनकी चिंता बढ़ा दी है। 

पिछले वर्ष कम बारिश की वजह से खरीफ की फसल भी प्रभावित हुई थी, कम बारिश के कारण भूगर्भीय जल का स्तर भी कम हुआ है। जो डीजल या फिर बिजली से चलने वाला इंजन एक घंटे में एक बीघे की सिंचाई करता था वही अब ज्यादा समय लगाता है।

नसरतगंज के किसान राम प्रसाद कहते हैं, ‘‘दो साल पहले तक एक घंटे की सिंचाई का किराया 100 रुपए था, अब उसी एक घंटे का 125 रुपए लगने लगा है, अब तो सिंचाई में भी ज्यादा समय लगता है। पहले जिस डीजल इंजन ट्यूबवेल इंजन से एक घंटे में एक बीघा की सिंचाई होती थी, लेकिन अब उसी से डेढ़ घंटे से ज्यादा समय लग जाता है।”

सबसे ज्यादा परेशानी उन किसानों के लिए बढ़ी है जो पूरी तरह से सिंचाई के प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। नसरतगंज के ही किसान राकेश भी धान-गेंहू के साथ ही सब्जियों की भी खेती करते हैं। उनके खेत की सिंचाई पास से ही गुजरने वाली सई नदी के पानी पर ही निर्भर है। अब नदी में इतना कम पानी बचा है कि सिंचाई के लिए बोरिंग का प्रयोग कर रहे हैं।

राकेश सिंह बताते हैं, “हम लोग नदी में डीजल इंजन लगाकर ही खेत की सिंचाई करते हैं, लेकिन अब इतना कम पानी रह गया है कि मजबूरन हम लोगों को डीजल इंजन से सिंचाई करनी पड़ रही है।''

हर वर्ष खेती में बढ़ती लागत और कम मुनाफा के वजह से किसान खेती छोड़ रहे हैं। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2012-2013 में कृषि विकास दर 1.2 प्रतिशत थी, जो 2013-14 में बढ़कर 3.7 प्रतिशत हुई और 2014-15 में फिर घटकर 1.1 प्रतिशत पर आ गई। पिछले कई वर्षों में बुवाई के रकबे में 18 प्रतिशत की कमी आई है। यही नहीं पिछले वर्ष के मुकाबले डीएपी और यूरिया जैसे उर्वरकों के दाम भी बढ़े हैं। उर्वरक के बढ़े दाम के बारे में सरोजनीनगर ब्लॉक के बंथरा गाँव के उर्वरक विक्रेता अमन सिंह बताते हैं, “पिछले दो साल में डीएपी और यूरिया का दाम भी बढ़ा है। 2015 में जो डीएपी की बोरी 1180 रुपए में थी, वही अब 1251 में है और यूरिया का दाम 310 से बढ़कर 348 हो गया है।’’

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कृषि अर्थव्यस्था विभाग के प्रोफेसर नीरज सिंह कृषि क्षेत्र में बढ़ते खर्च के बारे में बताते हैं, “पिछले दो-तीन साल में खराब मानसून भी खेती में बढ़ते खर्च का एक बड़ा कारण है, जबकि आमदनी बढ़ने के बजाय लगातार घट रही है। इसके लिए किसानों को अपने खेती में बदलाव लाना होगा। जिससे कम खर्च में ही अच्छी उपज मिल सके।”

खेती का खर्च बढ़ा है, लेकिन किसानों की आमदनी कम हुई है।

मौसम विभाग के जारी आंकड़ों के अनुसार देश में 640 में से 340 जिलों में मानसून की बारिश में 20 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है। आज भी सिंचाई के लिए ज्यादातर किसान प्रकृति पर निर्भर हैं।

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