खरीफ का तिल, बोने का यह है सही समय

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लखनऊ। जुलाई महीने में किसानों के लिए तिल की खेती करना फायदेमंद है। बलुई और दोमट मिट्टी में पर्याप्त नमी होने पर फसल अच्छी होती है। तिलहन की खेती में पानी की तो कम जरूरत पड़ती ही है साथ ही इससे पशुओं के लिए चारा भी उपलब्ध हो जाता है इसलिए किसान इसकी खेती करना चाहते हैं।

तिलहन की खेती के बारे में गोरखपुर के कृषि वैज्ञानिक केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ संजीत सिंह बताते हैं, “तिलहन में इस समय किसान मूंगफली और तिल दोनों की खेती कर सकते हैं। इस बार जिन क्षेत्रों में मानसून देरी से पहुंचा है या वर्षा कम हो रही है वहां के किसान अपने खेतों में  जहां जलभराव न हो तुरंत बुवाई का काम निपटा सकते हैं।” प्रतापगढ़ जिले के पचपेड़ा गाँव के किसान विजय प्रताप सिंह (45 वर्ष) बताते हैं, “हम लगातार दो वर्षों से तिल की खेती कर रहे हैं। इसकी अच्छी कीमत मिल जाती है और ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं होती।”

बोने की विधि

फसल को आमतौर पर छिटक कर बोया जाता है, जिसके फलस्वरुप निराई-गुड़ाई करने में बाधा आती है। फसल से अधिक उपज पाने के लिए कतारों में बोनी करनी चाहिए। छिटकवां विधि से बुवाई करने पर 1.6-3.80 प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है। कतारों में बोने के लिए सीड ड्रील का प्रयोग किया जाता है तो बीज दर घटाकर 1-1.20 किग्रा प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है।

बोने के समय बीजों का समान रुप से वितरण करने के लिए बीज को रेत (बालू), सूखी मिट्टी या अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ 1:20 के अनुपात में मिलाकर बोना चाहिए। मिश्रित पद्धति में तिल की बीजदर एक किग्रा प्रति एकड़ से अधिक नहीं होना चाहिए। कतार से कतार और पौधे से पौधे के बीच की दूरी 30x10 सेमी रखते हुए लगभग 3 सेमी की गहराई पर बोना चाहिए।

उपज

अच्छी तरह से फसल प्रबंध होने पर तिल की सिंचित अवस्था में 400-480 किग्रा. प्रति एकड़ और असिंचित अवस्था में उचित वर्षा होने पर 200-250 किग्रा प्रति एकड़ उपज प्राप्त होती हैं।

खाद-उर्वरक की मात्रा और देने की विधि

जमीन की उत्पादकता को बनाए रखने के लिए और अच्छी उपज पाने के लिए भूमि की तैयारी करते समय अंतिम बखरनी के पहले चार टन प्रति एकड़ के हिसाब से अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद को मिला देना चाहिए। फास्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा आधार खाद के रूप में और नत्रजन की आधी मात्रा के साथ मिलाकर बोने के समय दी जानी चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा पौधों में फूल निकलने के समय यानी बोने के 30 दिन बाद दी जा सकती है। 

तिलहनी फसल होने के कारण मिट्टी में गंधक तत्व की उपलब्धता फसल के उत्पादन एवं दानों में तेल के प्रतिशत को प्रभावित करती है। अत: फास्फोरस तत्व की पूर्ति सिंगल सुपर फास्फेट उर्वरक से करना चाहिए। भूमि परीक्षण में उपरांत जमीन में यदि गंधक तत्व की कमी पाई जाती है तो वहां पर जिंक सल्फेट 10 किग्रा प्रति एकड़ की दर से भूमि में तीन साल में एक बार अवश्य प्रयोग करें।

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