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किसानों को भा गई ‘लाख’ की खेती

किसानों को भा गई ‘लाख’ की खेतीgaonconnection

अकबापुर (सीतापुर)। अकबापुर गाँव के किसान विकास कुमार मौर्य को इन दिनों एक नई फसल की खेती करने की धुन लग हुई है। उन्होंने इस बार लाख की खेती शुरू की है।

“मैंने इसी बार से लाख की खेती करनी शुरू की है। ये ऐसी फसल है जिसमें न तो ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है और न फसल के खराब होने का डर रहता है। इसमें कोई कीट व रोग लगने का डर नहीं रहता है।’’ सीतापुर जि़ला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर पहला ब्लॉक के अकबापुर गाँव के विकास कुमार मौर्य (38 वर्ष) डन्डियों पर लगी लाख को दिखते हुए कहते हैं, ‘’फरवरी में फ्लेमेन्जिया की नर्सरी की रोपाई कर दी थी और जब जुलाई में पौधा करीब चार फुट का हो गया, तो उसपर लाख भ्रूण बांध दिया था। इस समय कीड़ा पौधों पर लाख बना रहा है।’’ फ्लेमेन्जिया का एक पौधा होता है जिस पर लाख का कीड़ा छोड़ा जाता है, जिसका रस चूसकर कीड़ा पौधे पर लाख बनाता है।

सीतापुर के कुछ किसानों ने अपनी पारम्परिक खेती के साथ लाख की खेती शुरू की है। पूरे सीतापुर जि़ले में इस बार करीब आठ एकड़ में लाख की खेती की जा रही है। विकास के पास करीब 12 एकड़ खेत है, जिसमें से करीब आधा एकड़ में इस बार वो लाख की खेती कर रहे हैं। लाख के साथ-साथ वो पपीता, गुलाब, हल्दी, मक्का व अन्य फसलों की भी खेती करते हैं। उनका कहना है कि वो लाख के बारे में जानते तो पहले से थे लेकिन इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं थी। इसकी पूरी जानकारी उन्हें कटिया के कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके) से मिली, तो अब उन्होंने इसकी खेती शुरू कर दी है।

कटिया कृषि विज्ञान केन्द्र सीतापुर जि़ले के बिसवां ब्लॉक क्षेत्र में आता है। उनका कहना है कि इस बार थोड़े से ही शुरुआत की है अगर सब कुछ ठीक रहा तो आगे से ज़्यादा लगाऊंगा। लाख उत्पादन में छत्तीसगढ़ देश का सबसे बड़ा लाख उत्पादक राज्य है, जिसने वर्ष 2008-9 में 7200 टन के साथ रिकॉर्ड कायम किया। यह देश के लाख उत्पादन का 42 फीसदी है।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़) की वेबसाइट से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत लाख उत्पादन की दृष्टि से विश्व में सर्वप्रथम देश है। पूरे विश्व की कुल उत्पादन का करीब 80 प्रतिशत ‘लाख’ भारत में होता है। इसके बाद थाइलैंड का नम्बर आता है। भारत में लाख उत्पादन झारखण्ड़ राज्य के छोटा नागपुर के क्षेत्र में, छत्तीसगढ़ राज्य, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश एवं महाराष्ट्र में होता है।

लाख की दो फसलें होती हैं। एक को कतकी-अगहनी कहते हैं तथा दूसरी को बैसाखी-जेठवीं कहते हैं। जून-जुलाई में कतकी-अगहनी की फसल के लिए और अक्टूबर नवंबर में बैसाखी-जेठवी फसलों के लिए लाख बीज बैठाए जाते हैं। अगहनी और जेठवी फसलों से प्राप्त कच्चे लाख को ‘कुसुमी लाख’  तथा कार्तिक एवं बैसाख की फसलों से प्राप्त कच्चे लाख को ‘रंगीनी लाख’ कहते हैं। अधिक लाख रंगीनी लाख से प्राप्त होती है, जबकि कुसमी लाख से प्राप्त लाख अच्छी किस्म की होती है।

कृषि विज्ञान केन्द्र कटिया सीतापुर के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. डीएस श्रीवास्तव बताते हैं, ‘’किसानों को लाख भ्रूण और फ्लेमेन्जिया की नर्सरी हमने बाहर से मंगवा कर उपलब्ध कराई थी। कीड़ा जब भ्रूण  से निकल कर पौधे पर चला जाए तो वो उस लाख को वापस हमे बेच सकते हैं, उसके बाद किसान जितनी लाख पैदा करेगा वो भी मेरे पास 150 रुपए किलो में बेच सकता है। इससे उसे बेचने में भी परेशानी नहीं होगी।’’

लाख एवं लाख कीट

लाख एक प्रकार का प्रकृतिक राल है जो लाख कीट लेसीफेरा लेक्का के मादा कीट से स्राव के फलस्वरूप बनता है। पूरे विश्व में लाख कीट की नौ जातियां पाई जाती है परंतु भारतवर्ष में दो ही जातियां हैं जिनका नाम लेसीफेरा एवं पैराटेकारडिना है।

लाख का उपयोग

लाख ग्रामोफोन  रिकार्ड बनाने में, विद्युत यंत्रों में, पृथक्कारी के रूप में, वार्निश और पॉलिश बनाने में, विशेष प्रकार की सीमेंट और स्याही के बनाने में, शानचक्रों में चूर्ण के बांधने के काम में, ठप्पा देने की लाख बनाने इत्यादि, अनेक कामों में प्रयुक्त होता है।

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