किसानों को नहीं मिलती केले की सही कीमत

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लखनऊ। उद्यान विभाग केले की खेती को तो बढ़ावा दे देता है, लेकिन मार्केटिंग में कोई मदद नहीं करता है, जबकि दूसरे प्रदेशों में सोसाइटी और विभाग के माध्यम से ही केले की बिक्री होती है।

लखीमपुर जिले के ईशानगर ब्लॉक के समेसी गाँव के किसान जंग बहादुर बब्बर (45 वर्ष) ने इस बार 61 एकड़ खेत में केला लगाया है। जंग बहादुर सिंह कहते हैं, “हमारी मेहनत को व्यापारी ही तय करते हैं। व्यापारी जितना दाम लगा देते हैं, उसी दाम में बिकता है, जबकि दूसरे प्रदेशों में गाँव में किसान केले का दाम तय करते हैं, जबकि हमारे यहां व्यापारी केले का दाम तय करते हैं।” 

महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात जैसे प्रदेशों में कोआपरेटिव संस्थाएं और विभाग केला का दाम तय करती हैं। वही संस्था किसानों को केले के पौधे भी उपलब्ध कराती हैं। विश्व के कुल केला उत्पादन में भारत का लगभग 30 प्रतिशत योगदान है। यहां लगभग 4.9 लाख हेक्टेयर में केले की खेती होती है, जिससे 180 लाख टन उत्पादन प्राप्त होता है। देश के प्रमुख केला उत्पादक राज्यों में तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, गुजरात, असम, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश हैं। 

पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी, सीतापुर, बाराबंकी, इलाहाबाद, लखनऊ, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, बस्ती, सन्त कबीर नगर, श्रावस्ती, बलरामपुर और बहराइच के किसानों ने भी केले की खेती शुरु कर दी है। केला किसान एक एकड़ भूमि में लगभग 1800 से 2000 केले की पौध रोपते हैं। केले के एक पेड़ में 70 किलो से एक कुन्तल तक की पैदावार होती है। 

यहां से केले दूसरे प्रदेशों तक जाता है। इस समय केले की खेती किसानों द्वारा टीशू कल्चर विधि द्वारा उगाई गई पौध से की जा रही है। उत्तर प्रदेश में उद्यान विभाग किसानों को केला की खेती को बढ़ावा देने के लिए मदद करता है, लेकिन मार्केटिंग में कोई मदद नहीं करता है। 

उद्यान विभाग, उत्तर प्रदेश के फल उद्योग विकास अधिकारी और फ्रैक निदेशक डॉ. एस के चौहान कहते हैं, “हमारा विभाग केले की पौध उपलब्ध कराता है और इसको बढ़ावा देने में मदद करता है। विभाग सीधे तौर पर मदद नहीं करता है, व्यापारी ही उसका दाम तय करते हैं।” वो आगे बताते हैं, “मण्डियों में पैक हाउस बनाए गए हैं, जहां से किसान को अपना उत्पादन बेचने में आसानी होती है।”

गुजरात के ही सूरत जिले के कुड़सड़ गाँव के किसान विपुल देसाई (40 वर्ष) कहते हैं, “हमारे यहां कोआपरेटिव सोसाइटी केले का रेट तय करती है, सोसाइटी ही किसानों को केले की पौध, उर्वरक जैसी सुविधाएं वही सोसाइटी ही उपलब्ध कराती है। केले को बिकवाने में भी मदद करती है।”वो आगे बताते हैं, “अगर व्यापारी हमसे केला खरीदना चाहता है तो हम पहले ही उनसे बता देते हैं, कि सोसाइटी के दाम पर ही केला देंगे।” गुजरात के सूरत जिले के विहारा गाँव के किसान फेनेल पटेल (35 वर्ष) बताते हैं, “इस बार मैंने नौ टन केला बेच दिया है, अभी लगभग तीन टन केला खेत में है। 10-12 रुपए में केला बिक रहा है।”

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