कितना विचित्र है कि भारत की कोई राष्ट्र भाषा नहीं

कितना विचित्र है कि भारत की कोई राष्ट्र भाषा नहींgaonconnection

हमारे देश के दो प्रधानमंत्री, अटल बिहारी वाजपेयी और वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जिस विचारधारा से निकले हैं वहां हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान के नारे बुलन्द होते रहे हैं। मोदी आजकल धुआंधार अंग्रेजी में भाषण देते हैं जबकि आरम्भ के दिनों में विदेशों में भी हिन्दी में भाषण दिया करते थे। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी शायद दो बार संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण दिया था। एक बार 1977 में विदेश मंत्री के रूप में बाद में प्रधानमंत्री की हैसियत से। तो क्या हिन्दी प्रेम जबानी जमा खर्च तक ही सीमित है। शायद अब देर हो चुकी है हिन्दी की बातें करने के लिए लेकिन ‘अब नहीं तो कभी नहीं’ वाली हालत है इसमें सन्देह नहीं।

किसी देश की नींव यदि कमजोर हो जाए तो मकान मजबूत नहीं बनता। हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू यदि चाहते तो हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा बन सकती थी लेकिन उन्होंने भारत में 27 औपचारिक भाषाएं बनाईं जिनमें हिन्दी भी एक है। अदालती फैसलों में साफ़ किया गया है कि हमारे देश की कोई औपचारिक राष्ट्रभाषा नहीं है। विडम्बना है कि हमारे देश के पहले शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद जो अरबी, फारसी, उर्दू के अच्छे विद्वान थे मगर हिन्दी लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे। जब हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा बनाने पर चर्चा हो रही थी तो अधिकांश लोग हिन्दी के पक्ष में थे।

कुछ लोगों का हिन्दी के लिए अति उत्साह हानिकारक रहा है। एक दिन इन्टरमीडिएट होम साइंस की शरीर विज्ञान की पुस्तक देख रहा था उसमें सैकड़ों तकनीकी शब्द प्रयोग हुए हैं जैसे ‘‘छुद्रान्त्र’’। इसे सरल भाषा में छोटी आंत कह सकते थे। इसके विपरीत अंग्रेजी में लचीलापन है जो उसे ताकत देता है, दुनिया की सभी भाषाओं के शब्द जैसे ‘‘हुक्का” इसमें घुलमिल गए हैं। यदि सरल हिन्दी में तकनीकी विषयों पर कम दाम में किताबें मिलें तो पढ़ने वालों की संख्या बढ़ेगी। हम लोग जर्मन, जापानी, चीनी और हेब्रू भाषाओं का उदाहरण देते रहते हैं परन्तु भूल जाते हैं कि उन भाषाओं में कितना काम हुआ है। चीनी और जापानी भाषाओं की अपनी जटिलता है फिर भी उन भाषाओं ने अपने लिए सम्माननीय स्थान प्राप्त कर लिया है। हमारे यहां तो न्यायालय में बहस और आदेश तक हिन्दी में नहीं होते और अनेक नौकरियों की प्रतियोगात्मक परीक्षाएं भी हिन्दी में सम्भव नहीं।

प्रारम्भिक वर्षों में दक्षिण भारत में भी हिन्दी प्रचारिणी सभा जैसी संस्थाओं को देश के अन्तिम गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी जैसे नेताओं का समर्थन हासिल था। बाजारू भाषा के रूप में इसे सिनेमा, रेडियो और टीवी ने कुछ हद तक प्रचारित किया है। उधर सरकार की तरफ से हिन्दी में लिखी गई किताबों को पुरस्कार तो दिए जाते हैं परन्तु प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में हिन्दी का प्रयोग वर्जित है, इतना ही नहीं अच्छे साहित्य, विज्ञान और कानूनी पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद भी नहीं होता। जब तक हिन्दी में उच्च स्तर की मौलिक और अनुवादित पाठ्य सामग्री नहीं होगी, नौकरियों का लालच नहीं होगा तो विदेशियों की कौन कहे अपने देश के लोग भी आकर्षित नही होंगे। 

हिन्दी को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक है कि हिन्दी माध्यम स्कूल कॉलेजों को इस लायक बनाया जाए कि नेता, अभिनेता और अधिकारी अपने बच्चों को उनमें भेजने के लिए लालायित हों। सर्व शिक्षा हो या न हो गुणवत्तापरक शिक्षा हो जिसे सम्मान मिले। यह श्रद्धान्जलि भी होगी सेठ गोविन्द दास, डॉ. रघुवीर और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे मनीषियों को जिन्होंने हिन्दी के विकास के लिए जीवन अर्पित कर दिया था। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हमारे देश में उन्हीं लोगों को पद और सम्मान मिला जो अच्छी अंग्रेजी जानते थे। उन्हें किनारे किया गया जो हिन्दी के पक्षधर थे। यदि गुलाम मानसिकता नहीं बदली तो एक दिन अंग्रेजी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित करना पड़ेगा।    

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