कम खेत में ज्यादा उत्पादन के लिए करें सहफसली खेती

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लखनऊ। समय के साथ छोटी जोत वाले किसानों की संख्या बढ़ रही है, ऐसे में किसान सही जानकारी अपनाकर सहफसली विधि से खेती कर सकता है। ये समय अरहर की बुवाई का सही समय समय होता है, ऐसे में किसान अरहर के साथ मूंग, उड़द के साथ ही ज्वार की खेती कर सकते हैं।

केन्द्रीय दलहन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डाॅ पुरुषोत्तम कुमार सहफसली खेती के बारे में बताते हैं, “पहले किसान अरहर के साथ ही कई दूसरी फसलें भी बोते थे, जिससे कम खेत में ही ज्यादा फायदा होता है। साथ ही इसका वैज्ञानिक महत्व भी है, ज्वार को अरहर के साथ लगाने से अरहर में उकठा रोग कम लगता है। ज्वार की जड़ों से एक प्रकार को रसायन निकलता है, जिससे अरहर में उकठा रोग नहीं लगता है।

कन्नौज के किसान राम नरेश वर्मा के पास सिर्फ पांच बीघा जमीन है, मेड़ पर अरहर लगा देते हैं और खेत में मूंग, उड़द की फसल बो देते हैं।फसल की बुवाई करते समय लाइन से दूरी 60 सेंटीमीटर रखनी चाहिए और पौधे से पौधे की दूरी 25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। बुवाई के समय किसानों को मिट्टी के परीक्षण के आधार पर खाद का प्रयोग करना चाहिए। 

जलवायु और मिट्टी

अरहर की खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु के साथ साथ बुवाई के समय 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान होना चाहिए। अरहर की अच्छी उपज के लिए दोमट या बलुई दोमट भूमि अच्छी मानी जाती है।

अरहर की किस्में

अरहर की खेती के लिए दो प्रकार की उन्नतशील प्रजातियां उगाई जाती है, पहली अगेती प्रजातियां  होती हैं, जिसमें उन्नत प्रजातियां है, पारस, टाइप 21, पूसा 992, उपास 120, दूसरी पछेती या देर से पकने वाली प्रजातियां हैं बहार, अमर, पूसा 9, नरेन्द्र अरहर 1, आजाद अरहर 1, मालवीय विकास, मालवीय चमत्कार जिनको देर से पकने वाली प्रजातियों के रूप से जानते हैं।

 खेत की तैयारी

खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले से करने की जरूरत होती है, उसके बाद दो तीन जुताई कल्टीवेटर से करना जरूरी है, इसके बाद आखिरी जुताई के बाद 200-300 कुंतल गोबर की खाद मिलाकर पाटा लगाना जरूरी है।

 बुवाई का सही समय

जल्दी पकने वाली प्रजातियों की जून के प्रथम सप्ताह में बुवाई करना बहुत ही अच्छा रहेगा। साथ ही देर से पकने वाली अरहर की प्रजातियों की जुलाई के प्रथम सप्ताह में बुवाई करनी चाहिए।

बीज की मात्रा और सही तरीका

अरहर की जल्दी पकने वाली प्रजातियां है, उनमे 15 से 20 किलो ग्राम बीज एक हेक्टर के लिए पर्याप्त होता है, इसी प्रकार देर से पकने वाली प्रजातियों के लिए 12 से 15 किलो ग्राम बीज एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होता है, अरहर के बीज की बुवाई लाइनों में हल के पीछे करनी चाहिए, लाइन से लाइन  की दूरी जल्दी पकने वाली प्रजातियों के लिए 45 सेंटी मीटर पौध से पौध की दूरी 20 सेंटी मीटर रखते है। 

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