कॉस्मेटिक उत्पादों का ज्यादा प्रयोग जानलेवा

कॉस्मेटिक उत्पादों का ज्यादा प्रयोग जानलेवाgaonconnection

कॉस्मेटिक उत्पादों ने ग्रामीण इलाकों में भी खूब पैर पसार लिया है। जानकारी के अभाव में आज भी खतरनाक रसायनयुक्त कई कॉस्मेटिक पदार्थ या उत्पाद बेधड़क ग्रामीण बाज़ारों में बिक रहे हैं। उदाहरण के तौर पर “पेराबेन” को ही ले लीजिए, पेराबेन्स अंत: स्त्रावी ग्रन्थियों (एण्डोक्राइन) की क्रियाविधि को प्रभावित करने वाला एक घातक रसायन तो है ही इसके अलावा यह मानव शरीर में पाए जाने वाले हार्मोन “एस्ट्रोजेन” की तरह कार्य करने की क्षमता रखता है।

अब जानने लायक बात यह है कि एस्ट्रोजन महिलाओं में प्रजनन क्षमता के विकास के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन इसकी संतुलित मात्रा ही विकास में सहायक होती है लेकिन किन्ही वजहों से इसकी सक्रियता ज्यादा हो जाए तो यह जानलेवा भी हो सकता है।

पेराबेन्स ऐसे पेट्रोकेमिकल कम्पाउण्ड हैं जो एस्ट्रोजन की तरह होते हैं और जब इन्हे महिलाएं शरीर पर लगाती हैं तो यह शरीर के भीतर जाकर एस्ट्रोजन की तरह सक्रिय होकर घातक स्वरूप ले लेते हैं। महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन का जो सामान्य लेवल होता है उसके 10 लाख गुना ज्यादा लेवल पेराबेन्स का होता है, इसके घातक परिणामों की कल्पना भी करना कठिन है। कैंसर से लेकर कई जानलेवा बीमारियों की वजह यही पेराबेन्स हो सकते हैं। जब हम पेट्रोकेमिकल्स युक्त कॉस्मेटिक्स को अपनी त्वचा पर लगाते हैं तब ये हमारे लसीका और रक्त परिवहन तंत्र से होते हुए सीधे आंतरिक अंगों और वसाओं के साथ मिल जाते हैं।

जब किसी पदार्थ का हम सेवन करते हैं तो हमारे शरीर के भीतर यकृत नामक पहरेदार इनकी खोज परख करता है लेकिन त्वचा मार्ग से शरीर में प्रवेश होने वाले इस तरह के रसायनों के लिए किसी तरह के पहरेदार की व्यवस्था शरीर में नहीं है, यानि इस बात से निष्कर्ष निकाल लिया जाना चाहिए कि जिस वस्तु को हम खा नहीं सकते उसे त्वचा पर लगाने से दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। सन 2001 में जर्नल ऑफ इन्वेस्टिगेटिव डर्मेटोलॉजी में एक रोचक शोध पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमें बाज़ार के बड़े-बड़े ब्राण्ड्स के कॉस्मेटिक्स को UVB से उपचारित चूहों पर लगाकर इनमें ट्यूमर बनने की समयावधि पर परिणाम प्रकाशित किए गए। डर्माबेस, डर्मोवेन, यूसेरिन और वेनिक्रीम जैसे बड़े-बड़े यूरोपियन ब्रांड्स के कॉस्मेटिक्स चूहों में ट्यूमर की संख्या और ट्यूमर बनने को क्रम में इजाफा करते दिखाई दिए।

एक सेमिनार में मेरी इसी बात का पुरजोर विरोध हुआ, वहां मुझसे पूछा गया कि मनुष्य कोई चूहा थोड़े है, मनुष्यों की प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा है, इस तरह के रसायनों से मनुष्य जाति को कोई खतरा नहीं है। मैंने सिर्फ एक ही बात में बहस खतम कर दी कि “क्या हमें हजारों करोड़ रुपए खर्च करके अब ये पता करना है कि पेराबेन जैसे रसायनों के क्या घातक परिणाम मनुष्यों में दिखाई देंगे, वो भी पूरे पचास साल बाद?” क्या हम चूहों पर किए गए अध्ययन और उससे निकले परिणामों से जरा भी नहीं डर रहे? यदि इसके बावजूद भी कॉर्पोरेट्स का दबाव और लोगों में अज्ञानता का भाव होगा तो प्रोडक्ट हर घर में दिखाई देगा।”

पेट्रोकेमिकल्स के घातक परिणामों को लेकर एक और शोध किया गया था जिसमें यह देखा गया कि पेराबेन जैसे घातक रसायन आखिर कर क्या सकते हैं? इस शोध में ऑटोप्सी एक रिपोर्ट तैयार की गई, इसमें बताया गया कि पेट्रोकेमिकल युक्त पदार्थों को त्वचा पर लगाने वाले कुल व्यक्तियों में यकृत में 47 फीसदी, स्पलीन (तिल्ली) में 46 फीसदी “लाईपोग्रेनुलोमा” के लक्षण दिखाई दिए, कुल मिलाकर इस पूरी शोध में 465 ऑटोप्सी रिपोर्ट्स पर अध्ययन हुआ था। लाईपोग्रेनुलोमा कोशिकाओं और ऊतकों में विदेशी रसायनों और तैलीय पदार्थों के जमावड़ा होने के बाद बनी संरचना है जो आगे चलकर घातक कैंसर में भी तब्दील हो सकती है।

इतनी गहराई से इस मुद्दे को इस लेख में लेने का तात्पर्य ये नहीं कि आप सब को डरा दिया जाए बल्कि उद्देश्य यह है कि हम ये समझ पाएं कि हम क्यों कृत्रिम रसायनों की तरफ दौड़ लगाएं जबकि हमें प्रकृति ने ही सारे संसाधन उपलब्ध कराए हैं, हम क्यों बाज़ार का रूख करने को बेताब हैं? आज हम पेट्रोकेमिकलयुक्त उत्पादों के समुंदर में खुद को डुबो चुके हैं और आहिस्ता-आहिस्ता शरीर को जहरीला बनाए जा रहे हैं। पेट्रोलियम के नाम से खौफ खाना जरूरी है क्योकि ये हर जगह, हर तरफ है। कार पेट्रोलियम से चल रही, सब्जियों और फलों पर पेट्रोलियम पदार्थों से कोटिंग करके चमक लाई जा रही है, कीटनाशकों से लेकर खाद तक सारे एग्रीकेमिकल्स का उद्गम पेट्रोकेमिकल्स से ही हुआ है। इन सब के बावजूद हम काफी हद तक अपने आप को सुरक्षित करने की कवायद कर सकते हैं। कम से कम कॉस्मेटिक्स की बात आए तो पेट्रोकेमिकलयुक्त ब्राण्ड्स को अलग फेंककर स्वदेशी ज्ञान पर भरोसा किया जा सकता है। 

(लेखक हर्बल विषयों के जानकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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