कृषि विशेषज्ञों की सलाह: उकठा जैसे रोगों से बचाने के लिए बीजोपचार के बाद करें चने की बुवाई

चने की बुवाई के साथ ही किसान इस समय गाजर, मूली, आलू जैसी फसलों की बुवाई कर सकते हैं, शुरू से कुछ बातों का ध्यान रखकर किसान बढ़िया मुनाफा कमा सकते हैं।

कृषि विशेषज्ञों की सलाह: उकठा जैसे रोगों से बचाने के लिए बीजोपचार के बाद करें चने की बुवाई

इस समय किसान रबी की फसलों की बुवाई कर रहे हैं, चना की फसल प्रमुख रबी फसलों में से एक है, चने की फसल को लेकर किसानों के मन में कई तरह के सवाल रहते हैं जैसे कि इन्हें रोग-कीटों से कैसे बचाया जाए।

किसानों के ऐसे ही कई सवालों के जवाब इस हफ्ते के पूसा समाचार में दिए गए हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के विशेषज्ञ ने किसानों से ऐसी ही कई जानकारियां साझा की हैं। संस्थान के पौध संरक्षण और जैव सुरक्षा संभाग के सहायक महानिदेशक डॉ एससी दुबे बताते हैं, "जैसे कि आप सभी जानते हैं कि चना एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है, इसमें फफूंद के कारण होने वाला म्लानि रोग लगता है, जिसे उकठा रोग भी कहते हैं।"

वो आगे कहते हैं, "उकठा रोग से किसानों को काफी नुकसान होता है, शुरुआती अवस्था में रोग लगने के कारण 70-80 प्रतिशत की क्षति हो जाती है। इसके नियंत्रण के लिए किसान भाईयों को बुवाई के समय से ही ध्यान देने की जरूरत है। जैसे कि यह रोग मृदा जनित है, इसलिए जब भी वो बुवाई करें, बीज को उपचारित जरूर करें।"

चने के बीजोपचार के बारे में वो कहते हैं, "चने की बीजों का उपचार करने के लिए कार्बेंडाजिम और थीरम दवा की सवा-सवा ग्राम मात्रा लेकर करके या एक-एक ग्राम भी मात्रा लेकर इसे दो-ढ़ाई किलो बीज में मिलाकर उपचारित करें। अगर आपके क्षेत्र में ट्राइकोडर्मा का कोई उत्पाद मिल रहा हो तो उसे लेकर उसकी 6-7 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज की दर से बीज को उपचारित करें।"

अगर इन रोगों से बचना है तो किसानों को चाहिए कि अवरोधी किस्मों का चुनाव करें, जैसे पुरानी प्रजातियों में पूसा 212 की बुवाई करें। इसके साथ ही पूसा 3042, पूसा 3062 की बुवाई करें। इसके साथ ही कई दूसरी प्रजातियां भी हैं, जिनकी जानकारी किसान अपने पास के कृषि विज्ञान केंद्र पर ले सकते हैं। अगर अवरोधी किस्मों का भी चुनाव करते हैं तो उसका बीजोपचार भी जरूर करें।

इस हफ्ते क्या जरूरी काम करें किसान

किसानों को सलाह है कि खरीफ फ़सलों (धान) के बचे हुए अवशेषों (पराली) को ना जलाएं। क्योंकि इससे वातावरण में प्रदूषण ज़्यादा होता है, जिससे स्वास्थय सम्बन्धी बीमारियों की संभावना बढ जाती है। इससे उत्पन्न धुंध के कारण सूर्य की किरणे फसलों तक कम पहुचती है, जिससे फसलों में प्रकाश संश्लेषण और वाष्पोत्सर्जन की प्रकिया प्रभावित होती है जिससे भोजन बनाने में कमी आती है इस कारण फसलों की उत्पादकता व गुणवत्ता प्रभावित होती है। किसानों को सलाह है कि धान के बचे हुए अवशेषों (पराली) को जमीन में मिला दें इससे मृदा की उर्वकता बढ़ती है, साथ ही यह पलवार का भी काम करती है। जिससे मृदा से नमी का वाष्पोत्सर्जन कम होता है। नमी मृदा में संरक्षित रहती है। धान के अवशेषों को सड़ाने के लिए पूसा डीकंपोजर कैप्सूल का उपयोग @ 4 कैप्सूल/हेक्टेयर किया जा सकता है।

किसानों को यह सलाह है कि वे मौसम को ध्यान में रखते हुए, गेंहू की बुवाई के लिए तैयार खेतों में पलेवा तथा उन्नत बीज व खाद की व्यवस्था करें। पलेवे के बाद यदि खेत में ओट आ गई हो तो उसमें गेहूँ की बुवाई कर सकते है। उन्नत प्रजातियाँ- सिंचित परिस्थिति- (एच. डी. 3226), (एच. डी. 18), (एच. डी. 3086), (एच. डी. 2967)। बीज की मात्रा 100 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर। जिन खेतों में दीमक का प्रकोप हो तो क्लोरपाईरिफाँस (20 ईसी) @ 5 लीटर प्रति हैक्टर की दर से पलेवा के साथ दें। नत्रजन, फास्फोरस तथा पोटाश उर्वरकों की मात्रा 120, 50 व 40 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर होनी चाहिये।

समय पर बोई गई सरसों की फ़सल में बगराडा कीट (पेटेंड बग) की निरंतर निगरानी करते रहें और फ़सल में विरलीकरण तथा खरपतवार नियंत्रण का कार्य करें।

वर्तमान मौसम प्याज की बुवाई के लिए अनुकूल है। बीज दर– 10 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर। बुवाई से पहले बीजों को केप्टान @ 2.5 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचार अवश्य करें।

वर्तमान मौसम आलू की बुवाई के लिए अनुकूल है अतः किसान आवश्यकतानुसार आलू की किस्मों की बुवाई कर सकते हैं। उन्नत किस्में- कुफरी बादशाह, कुफरी ज्योति (कम अवधि वाली किस्म), कुफरी अलंकार, कुफरी चंद्रमुखी। कतारों से कतारों और पौध से पौध की दूरी 45 ´ 20 या 60 ´ 15 सेमी. रखें। बुवाई से पहले बीजों को कार्बंडिज्म @ 0 ग्रा. प्रति लीटर घोल में प्रति कि.ग्रा. बीज पाँच मिनट भिगोकर रखें। उसके उपरांत बुवाई से पहले किसी छायादार जगह पर सूखने के लिए रखें।


इस मौसम में किसान गाजर की बुवाई मेड़ो पर कर सकते है। बुवाई से पहले मृदा में उचित नमी का ध्यान अवश्य रखें। उन्नत किस्में- पूसा रूधिरा। बीज दर 4.0 कि.ग्रा. प्रति एकड़। बुवाई से पहले बीज को केप्टान @ 2 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करें तथा खेत में देसी खाद, पोटाश और फाँस्फोरस उर्वरक अवश्य डालें। गाजर की बुवाई मशीन द्वारा करने से बीज 1.0 कि.ग्रा. प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है जिससे बीज की बचत तथा उत्पाद की गुणवत्ता भी अच्छी रहती है।

इस मौसम में किसान इस समय सरसों साग- पूसा साग-1, मूली- जापानी व्हाईट, हिल क्वीन, पूसा मृदुला (फ्रेच मूली); पालक- आल ग्रीन,पूसा भारती; शलगम- पूसा स्वेती या स्थानीय लाल किस्म; बथुआ- पूसा बथुआ-1; मेथी-पूसा कसुरी; गांठ गोभी-व्हाईट वियना,पर्पल वियना तथा धनिया- पंत हरितमा या संकर किस्मों की बुवाई मेड़ों (उथली क्यारियों) पर करें। बुवाई से पहले मृदा में उचित नमी का ध्यान अवश्य रखें।

यह समय ब्रोकली, पछेती फूलगोभी, बन्दगोभी तथा टमाटर की पौधशाला तैयार करने के लिए उपयुक्त है। पौधशाला भूमि से उठी हुई क्यारियों पर ही बनायें। जिन किसान भाईयों की पौधशाला तैयार है, वह मौसस को ध्यान में रखते हुये पौध की रोपाई ऊंची मेड़ों पर करें।

मिर्च और टमाटर के खेतों में विषाणु रोग से ग्रसित पौधों को उखाड़कर जमीन में गाड़ दें। यदि प्रकोप अधिक है तो इमिडाक्लोप्रिड़ @ 0.3 मि.ली. प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें।

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