धान की फसल को रोगों से बचाने के लिए ये उपाय हैं सबसे बढ़िया

Divendra SinghDivendra Singh   23 Aug 2019 8:00 AM GMT

धान की फसल को रोगों से बचाने के लिए ये उपाय हैं सबसे बढ़िया

ज्यादातर किसानों ने धान की रोपाई कर ली है, फसल से अच्छा उत्पादन पाने के लिए सिर्फ सिंचाई व उर्वरकों की जरूरत तो होती ही है, साथ ही इस समय रोगों का प्रकोप भी बढ़ जाता है। इसलिए समय रहते इसका नियंत्रण करें।

कृषि विज्ञान केंद्र, सुलतानपुर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ रवि प्रकाश मौर्य किसानों को बता रहे हैं कि कैसे धान की फसल इस समय रोगों से बचा सकते हैं।

खैरा रोग : धान की फसल मे खैरा रोग जिंक की कमी के कारण होता है। इस रोग की पहचान करना आसान है। इसमें पत्तियो पर हल्के पीले रंग के धब्बे बनते हैं, जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते है। पौधा बौना रह जाता है और व्यात कम होती है। प्रभावित पौधो की जडे़ भी कत्थई रंग की हो जाती हैं।

प्रबंधन: इसकी रोकथाम के लिए फसल पर पांच किलो जिंक सल्फेट 20 किग्रा. युरिया के साथ 1000 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

शीथ ब्लाइट रोग व झोका रोग : शीथ ब्लाइट रोग में पत्तियों पर अनियमित आकार के धब्बे बनते हैं, जिसका किनारा गहरा भूरा और मध्य भाग हल्के रंग का होता है। झोका रोग में पतियों पर आँख की आकृति के धब्बे बनते हैं। जो मध्य में राख के रंग के और किनारे कत्थई रंग के होते हैं। पत्तियों के अतिरिक्त बालियों, डठलों, पुष्प शाखाओं और गाठों पर काले भूरे धब्बे बनते हैं।

प्रबंधन : शीथ ब्लाइट व झोका दोनों रोगों के नियंत्रण के लिए हेक्साकोनाजोल 5 ई.सी. एक लीटर या कार्बेन्डाजिम 50 डब्लू.पी. 500 ग्राम को 500-750 लीटर पानी मे घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर छिड़काव करें।

भूरा धब्बा रोग : इसमें पतियों पर गहरे कत्थई रंग के गोल अथवा अंडाकार धब्बे बन जाते हैं। इन धब्बो के चारों तरफ पीला घेरा बन जाता है और मध्य भाग पीलापन लिये हुए कत्थई रंग का होता है।

नियंत्रण : रोकथाम के लिए एडीफेनफास 50 ई.सी. 500 मिली. या मैंकोजेब 75 डब्लू.पी. 2.किग्रा. को 500-750 ली. पानी मे घोल कर प्रति की दर से छिड़काव करें।

झुलसा रोग : इस रोग में पत्तियों के नोक अथवा किनारे से एकदम सूखने लगती है। सूखे हुए किनारे अनियमित व टेढे़ मेढ़े हो जाते हैं। जीवाणु धारी झुलसा रोग में पत्तियों पर नसों के बीच कत्थई रंग की लंबी -लंबी धारियां बन जाती है।

नियंत्रण : झुलसा के नियंत्रण के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट 90 प्रतिशत + टेटा्साइकलिन हाइड्रोक्लोराइड 10 प्रतिशत 15 ग्राम व कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 डब्लू.पी. 500ग्राम को 500-750 लीटर पानी मे घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

कण्डुआ रोग : इस रोग में बालियों के कुछ दाने पीले रंग के दाने के रूप मे बदल जाते हैं। जो बाद मे काले हो जाते हैं।

प्रबंधन : बाली में रोग के लक्षण दिखाई देते ही कार्बेन्डाजिम 50 डब्लू.पी. 500 ग्राम को 500-750 लीटर पानी मे घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

ये भी पढ़ें : धान को कीट-पतंगों से बचाने और ज्यादा उत्पादन के लिए अपनाएं ज्ञानी चाचा की सलाह



More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top