बीजोपचार के बाद ही करें मसूर की बुवाई, उकठा जैसे रोग लगने की नहीं रहेगी संभावना

Divendra SinghDivendra Singh   20 Nov 2018 9:54 AM GMT

बीजोपचार के बाद ही करें मसूर की बुवाई, उकठा जैसे रोग लगने की नहीं रहेगी संभावना

लखनऊ। रबी मौसम में अभी किसान मसूर की खेती कर सकते हैं, इस फसल की खास बात ये होती है, इसका उपयोग दाल के अलावा खड़ी मसूर और आटे के रूप में भी की जाती है।

भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक राजेश कुमार बताते हैं, "मसूर की बुवाई में सबसे जरूरी होता है बीजोपचार के बाद बुवाई करनी चाहिए, बीजोपचार करने से उकठा जैसे कई तरह के बीज जनित रोग लगने की संभावना नहीं रहती है, इसलिए बीजोपचार बहुत जरूरी होता है।

मसूर की खेती मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में मसूर की खेती होती है। पूरे देश में मध्य प्रदेश (40.53%), उत्तर प्रदेश (37.60%), बिहार (10.80%), पश्चिम बंगाल (4.00%) में मसूर का उत्पादन होता है, जिसमें मध्य प्रदेश नंबर एक पर है।

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मसूर की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन रेतीली दोमट मिट्टी जिसमें जल धारण और जल निकास क्षमता अधिका हो, सही रहती है। खेत की तैयारी के लिये खरीफ की फसल की कटाई के बाद मिट्टी में नमी के अनुसार एक या दो बार जुताई कर मिट्टी भुरभुरी बना लेनी चाहिए। इसके तुरन्त बाद पाटा चला कर खेत समतल करने से नमी सुरक्षित रहती हैं और बुवाई के समय बीज एक समान गहराई पर बोया जाता हैं, जिससे बीज का अंकुरण भी अच्छा होता हैं।

बीजोपचार

अच्छे उत्पादन के लिये गुणवत्ता वाला साफ, बीमारी व खरपतवार के बीज रहित बीज का उपयोग करना चाहिये। उन्नत किस्म का बीज जिसकी अंकुरण क्षमता अच्छी हो, उसी का चुनाव करना चाहिए। छोटे दाने वाली प्रजाति का 25-30 किलो और बड़े दाने वाली प्रजाति का 35-40 किलो बीज प्रति हेक्टेयर क्षेत्र की बुवाई के लिये पर्याप्त होता हैं।

फसल को विभिन्न बीज जनित रोगों जैसे उकठा रोग से बचाने के लिये बुवाई से पहले बीज का उपचार थाइरम 2 ग्राम और कार्बोनडाज़िम एक ग्राम या वाविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से करना चाहिये। इसके बीज को 5 ग्राम राइजोबियम कल्चर और 5 ग्राम पीएसबी कल्चर प्रति किलो बीज से भी उपचारित करने से पौधों के जड़ो में जड़ ग्रंथिया (रूट नाडूलस) अधिक बनने से पौधों का विकास अच्छा होता हैं।

बुवाई का समय और विधि

अक्टूबर से लेकर नवंबर तक इसकी बुवाई कर सकते हैं। मसूर की बुवाई कतार में 30 सेमी. की दूरी और बीज से बीज का अन्तर 5 से 7.5 सेमी. पर देशी हल या सीड ड्रिल की सहायता से 4-5 सेमी. की गहराई पर करना चाहिए। बुवाई में देर होने पर कतारों का अन्तर 20-25 सेमी. रखा जाता हैं।

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मसूर उत्पादन के लिए खाद और उर्वरक

खेत की मिट्टी परीक्षण के अनुसार खाद और उर्वरक देना लाभप्रद होता है। यदि गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद या कम्पोस्ट उपलब्ध हो तब 5 टन/हेक्टेयर की दर से खेत में अच्छी तरह मिलाना चाहिये। असिंचित क्षेत्रों में 15-20 किलो नाइट्रोजन औश्र 20 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना चाहिये। सिंचित फसल में 20-25 किलो नाइट्रोजन 20 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर का उपयोग करना चाहिए।

सिंचाई

सामान्यतः मसूर की खेती वर्षा आधारित क्षेत्रों में की जाती हैं, लेकिन फसल की क्रान्तिक अवस्था जैसे फल्ली बनने या फल्ली में दाना बनने पर एक हल्की सिंचाई करना फायदेमंद होता है। सिंचित अवस्था में सिंचाई फसल की आवश्यकता व मौसम अनुसार पहली सिंचाई पौधों में शाखाये निकलने पर तथा दूसरी सिंचाई भूमि की आवश्यकता अनुसार फल्ली अवस्था पर स्प्रिकलर या बहाव विधि से (हल्की) करना चाहिये।

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खरपतवार नियंत्रण

फसल में खरपतवार की उपलब्धता अनुसार बुवाई के 20-25 दिन व 40-45 दिन बाद निराई-गुड़ाई, खुरपी से करनी चाहिए इससे खरपतवार का नियंत्रण होगा और मिट्टी में वायु संचार होने से पौधों की वृद्धि और विकास भी अच्छा होगा। खरपतवार के रसायनिक नियंत्रण के लिए पेन्डी-मिथेलिन या फ्लूक्लोरोलिन 0.75 किलो ग्राम को 500 लीटर पानी में मिलाकर एक हेक्टेयर में घोलकर छिड़काव कर मिट्टी में मिलाने से खरपतवारों के प्रकोप से बचा जा सकता हैं। खरपतवार नाशी के उपयोग के समय खेत में पर्याप्त मात्रा में नमीं उपलब्ध होना चाहिए।

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