विशेषज्ञ की सलाह: अधिक उत्पादन के लिए गेहूं की इन पछेती किस्मों की बुवाई करें किसान

ये ख़बर उन किसानों के लिए अहम है जो अब तक गेहूं की बुवाई नहीं कर पाए हैं। इंदौर स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक किसानों के पिछौती बुवाई के लिए ये कुछ खास किस्मों की बुवाई का सुझाव देते हैं।

Shyam DangiShyam Dangi   23 Nov 2021 7:44 AM GMT

विशेषज्ञ की सलाह: अधिक उत्पादन के लिए गेहूं की इन पछेती किस्मों की बुवाई करें किसान

इंदौर स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक ने किसानों को दी सलाह, कैसे होगा गेहूं का ज्यादा उत्पादन।

इंदौर (मध्य प्रदेश)। रबी सीजन का मौसम चल रहा है। मध्य प्रदेश समेत देश के विभिन्न राज्यों में किसानों ने गेहूं की अगेती किस्मों की बुवाई 20 से अक्टूबर से 10 नवंबर तक और समय पर बोई जाने वाली किस्मों की बुवाई 10 नवंबर से 25 नवंबर तक बीच पूरी कर चुके हैं। ऐसे में जिन किसानों ने गेहूं की बुवाई नहीं की है वे गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई कर सकते हैं। लेकिन यहां किसानों को सही किस्मों का चुनाव करना होगा, वर्ना आगे चलकर तापमान बढ़ने पर फसल को नुकसान और उत्पादन कम हो सकता है।

इंदौर स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के क्षेत्रीय केंद्र ने किसानों को कुछ खास पछेती किस्सों को बोने की सलाद दी है, , जिनसे अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। इन किस्मों पर बदलते मौसम का प्रकोप कम होता है।

संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. कैलाश चंद्र शर्मा गांव कनेक्शन को बताते हैं, 'गेहूं कि पछेती किस्मों को बुवाई दिसंबर और जनवरी महीने के मध्य करना चाहिए। पछेती किस्मों के अधिक उत्पादन के लिए 4से 5 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। प्रति एकड़ 50 किलोग्राम बीज डालना चाहिए।" इसके अलावा वो प्रति हेक्टेयर 100:50:25 (N:P:K) उर्वरक की संतुलित मात्रा डालने की सलाह देते हैं।


रतुआ रोग प्रतिरोधक हैं दो नई किस्में पूसा वाणी, पूसा अहिल्या

संस्थान के मुताबिक इस बार किसानों को गेहूं की कई नई किस्मों के बीज उपलब्ध कराए गए हैं। इनमें पूसा वाणी (एच.आई. 1633) और पूसा अहिल्या (एच.आई. 1634) प्रमुख हैं। यह दोनों ही गेहूं की पछेती किस्म हैं। जो रतुआ रोग प्रतिरोधक होती हैं।

डॉ. कैलाश चंद्र शर्मा बताते हैं, "गेहूं किसी भी नई किस्म को ईजाद करने में 13 साल से अधिक समय लगता है। इस दौरान बीज कई परीक्षणों से गुजरता है। सीड के ट्रायल में ही लगभग 5-6 साल लग जाते हैं। मूल किस्म से क्रॉस वैरायटीज में किसी तरह की बीमारियां न आये इसका ख़ास ध्यान रखा जाता है।"

उन्होंने बताया, "किसी भी किस्म के ईजाद के बाद बीज सीड ग्रोवर को उपलब्ध कराया जाता है। जो फाउंडेशन सीड का निर्माण करता है। फाउंडेशन सीड से सर्टिफाइड सीड तैयार किया जाता है। इसके बाद किसानों को यह सर्टिफाइड बीज उपलब्ध कराया जाता है। किसानों तक बीज पहुंचने में लगभग दो साल का समय लग जाता है।"

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गेहूं की किस्में

गेहूं की इन पछेती किस्मों की करें बुवाई

जे.डब्ल्यू 1202 (jwu-1202)

गेहूं कि यह पछेती किस्म हैं। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 35-45 क्विंटल उत्पादन लिया जा सकता है। डॉ. शर्मा का कहना है इस किस्म कई प्रगतिशील किसान 60 से 70 क्विंटल तक उत्पादन ले रहे हैं। यह एक प्रमुख उन्नत किस्म है।

मध्य प्रदेश कृषि विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, गेहूं की यह किस्म मध्य प्रदेश के विंध्य पठार भाग (रायसेन, विदिशा, सागर, गुना), नर्मदा घाटी (जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, हरदा), बैनगंगा घाटी (बालाघाट, सिवनी), हवेली क्षेत्र (रीवा, जबलपुर, नरसिंहपुर), सतपुड़ा पठार (छिंदवाड़ा, पठार), निमाड़ अंचल (खंडवा, खरगोन, धार, झाबुआ) के लिए उपयुक्त है।

जे.डब्लयू 1203- (jwu-1203)

यह किस्म मालवा अंचल (रतलाम, मंदसौर, इंदौर, उज्जैन, शाजापुर, राजगढ़, सीहोर, धार, देवास, गुना (दक्षिण भाग), विंध्य पठार (रायसेन, विदिशा, सागर, गुना), नर्मदा घाटी (जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, हरदा), हवेली क्षेत्र (रीवा, जबलपुर, नरसिंहपुर), सतपुड़ा पठार (छिंदवाड़ा, पठार), गिर्द क्षेत्र (ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना, दतिया) के लिए उपयुक्त हैं। इससे भी प्रति हेक्टेयर 35-45 क्विंटल उत्पादन लिया जा सकता है।

गेहूं की अगैती फसल। फोटो अरेंजमेंट


एमपी 3336 (MP-3336)

यह भी गेहूं कि पछेती उन्नत किस्म है। अच्छे उत्पादन के लिए 4-5 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। प्रति हेक्टेयर 35-45 क्विंटल उत्पादन देने में सक्षम हैं।

राज- 4238

यह भी गेहूं पछेती किस्म है। जिससे प्रति हेक्टेयर 34-45 क्विंटल उत्पादन लिया जा सकता है।

एचआई 1633 या पूसा वाणी

गेहूं कि इस किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने ईजाद किया है। यह महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्य के लिए अनुशंसित है। प्रति हेक्टेयर 35-45 क्विंटल उत्पादन लिया जा सकता है। इस किस्म की बुवाई दिसंबर-जनवरी के मध्य करना चाहिए।

एचआई 1634 या पूसा अहिल्या

यह भी गेहूं कि पछेती किस्म है। इसे भी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने ईजाद किया है। यह किस्म मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान (कोटा, उदयपुर क्षेत्र) के लिए अनुशंसित है। अच्छे उत्पादन के लिए 20 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करना चाहिए।

गेहूं की सघन खेती के लिए सुझाव

संस्थान ने कहा कि गेहूं के अधिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए किसानों को विशेष सुझाव दिए है। गेहूं कि सघन खेती के लिए किसानों को अनुमोदित नवीनतम प्रजातियों के प्रमाणणिक बीज की बुवाई करना चाहिए। विभिन्न किस्मों का सही समय पर बुवाई करना करें तथा खाद की संतुलित मात्रा देना चाहिए। फसल चक्र में समय-समय पर बदलाव लाना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए खेत के रास्ते, मेड़, नालियों को खरपतवार मुक्त रखना चाहिए। पलेवा करने की बजाय खाद एवं बीज को सूखे में ही बो कर पानी दें। एक या दो पानी वाली किस्मों में 40-45 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। खरपतवार और फफूंद नाशकों का उपयोग नहीं करें। फसलों के अवशेष खेत में नहीं जलाना चाहिए।



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