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जिन मोटे अनाजों की चर्चा पीएम मोदी ने की वो देश के लिए इतना जरूरी क्यों है ?

Mithilesh DharMithilesh Dhar   30 Aug 2019 1:00 PM GMT

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"आज हम देखते हैं कि जिस भोजन को हमने छोड़ दिया, उसको दुनिया ने अपनाना शुरू कर दिया। जौ, ज्वार, रागी, कोदो, सामा, बाजरा, सांवा, ऐसे अनेक अनाज कभी हमारे खान-पान का हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन ये हमारी थालियों से गायब हो गए। अब इस पोषक आहार की पूरी दुनिया में डिमांड है।" प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 अगस्त को आयुष मंत्रालय के कार्यक्रम में यह कहते हैं।

इसके बाद से देश में एक बार फिर मोटे अनाजों की चर्चा शुरू हो गई है। वही मोटा अनाज जिसे बहुत पहले तक गरीबों का खाना कहा जाता रहा है।

मोदी सरकार पिछले दो सालों से इस पर खासा ध्यान दे रही है। इसी कड़ी में वर्ष 2018 में मोटे अनाजों (ज्वार, बाजरा, रागी, लघु धान्य अर्थात कुटकी, कोदो, सांवा, कांगनी और चीना) का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया गया।

मोटा अनाज देश के लिए क्यों जरूरी है और क्यों इस पर इतना जोर दिया जा रहा है, इसके कई कारण हैं।

मोटा अनाज मतलब पानी की बचत

मोटे अनाज पर सरकार कितना जोर दे रही इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2018 को पूर्व केंद्रीय कृषि एवं कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष के रूप में मनाया था। साथ ही उन्होंने ने संयुक्त राष्ट्र संघ खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के महासचिव जोस ग्रेजियानो डॉ. सिल्वा को पत्र लिखकर प्रस्ताव यह मांग की थी कि वर्ष 2019 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष (International Year of Millets) घोषित किया जाये।

जर्नल ग्लोबल एनवायरनमेंटल चेंज 2017 की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि गेहूं और धान की अपेक्षा मोटे अनाजों में पानी की खपत बहुत कम होती है। इसके अलावा इसकी खेती के लिए यूरिया या अन्य रसायनों की जरूरत भी नहीं पड़ती। ऐसे में ये पर्यावरण के लिए बेहतर हैं।

इसी रिपोर्ट के अनुसार चीन जैसे बड़े देश अब चावल की खेती कम कर रहे हैं। वहीं भारत ने वर्ष 2018 में 37 लाख टन बासमती चावल का निर्यात दूसरे देशों को किया जिसकी खेती में ज्यादा पानी लगता है।

डाटा ब्लॉग की रिपोर्ट में बताया गया है कि एक किलो गेहूं उगाने में लिए 500 से 4,000 लीटर तक पानी का खर्च आता है।

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जर्नल साइंस एडवांसेस की रिपोर्ट के अनुसार भारत में उपलब्ध भू-जल के कुल इस्तेमाल का 80 फीसदी खेती में उपयोग हो रहा है। मोटे अनाज की खेती से भारी मात्रा में पानी बचाया जा सकता है।

कृषि विज्ञान केंद्र कूल्लू हिमाचल प्रदेश की प्रसार विशेषज्ञ डॉ. चन्द्रकान्ता वत्स अपनी रिपोर्ट में बताती हैं कि मोटे अनाजों की फसल को बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है। ज्वार, बाजरा और रागी के लिए गन्ने और केले के मुकाबले 25 प्रतिशत कम और धान के मुकाबले 30 प्रतिशत कम बारिश की जरूरत होती है। हम एक किलो धान पैदा करने के लिए 4000 लीटर पानी का उपयोग करते है, जबकि इन सभी अनाजों की फसलें बिना सिंचाई के ही पैदा हो जाती हैं।

ऐसे समय में जब पानी और खाद्यान्न की भारी कमी है तो ये हमारे पोषण की जरूरत को पूरी करेंगी और देश में खाद्यान्न की कमी भी नहीं होगी।

डॉ. चन्द्रकान्ता वत्स गांव कनेक्शन से कहती हैं, " मोटे अनाज पर सरकार जोर दे रही है लेकिन अभी इसके बारे में लोग जागरूक नहीं हैं। शहरों में तो लोग इसे अपना रहे हैं कि लेकिन गांवों में लोग इसके फायदे से अनभिज्ञ हैं। ऐसे में तो सबसे ज्यादा जोर जागरुकता पर होना चाहिए।"

वे आगे बताती हैं कि मोटे अनाज खराब मिट्टी में भी अच्छी तरह उग सकते हें। मोटे अनाज जल्दी खराब नहीं होते। देश का बड़ी मात्रा में अनाज बेहतर रखरखाव के अभाव में नष्ट हो जाता है, जबकि मोटे अनाज उगने के 10 से 12 वर्ष बाद भी खाने योग्य बने रहते हैं।

पोषण से भरपूर

मोटे अनाज को पोषण का सबसे बेहतरीन जरिया माना जाता रहा है। सरकार इसलिए भी इसकी पैदावार पर जोर दे रही है। इसके पोषक गुणों को देखते हुए ही इसे मिड-डे मील स्कीम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में भी शामिल किया गया है।

4 जुलाई 2018 को अमरिका की पत्रिका जर्नल साइंस एडवांसेस ने 'अल्टरनेटिव सेरिल्स केन इंप्रूव वाटर यूजेस ऐंड न्यूट्रीशन' नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें बताया गया है कि भारत के लोगों की थाली में पोशक तत्व कम हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के साथ उनके स्वास्थ्य पर इसका विपरीत असर पड़ने वाला है।


रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत का खाद्यान उत्पादन तो बढ़ रहा है लेकिन उसकी पौष्टिकता लगातार घट रही है। चावल की अपेक्षा मक्का ज्यादा पौष्टिक है बावजूद इसके उसकी पैदावार घट रही है।

वर्ष 1960 में भारत में प्रति व्यक्ति गेहूं की मांग सालाना 27 किलो थी जो आज 55 किलो से ज्यादा हो गई है। वहीं मोटे अनाज ज्वार-बाजरा की मांग पिछले चार दशक में 32.9 किलो से घटकर 4.2 किलो पर पहुंच गई है। इसलिए इन फसलों की बुवाई भी घटी है जबकि इनकी खेती के लिए पानी की की जरूरत बहुत कम पड़ती है।

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इस मामले में वनस्पति वैज्ञानिक दीपक आचार्य कहते हैं, " गांवों में कुपोषण मिटाने का सबसे कारगर है मोटा अनाज। ये अनाज खून की कमी को पूरा करते हैं और सुलभ उपलब्ध भी होते हैं। लेकिन जरूरत है इसके फायदे को जन-जन तक पहुंचाने की। पहले मोटे अनाज ग्रामीण थाली की पहली पसंद थे लेकिन चावल, गेहूं दाल आदि के ज्यादा प्रचार ने इनको खात्मे के कगार पर खड़ा कर दिया। कोदो और मडुआ खाने से हड्डियां मजबूत रहती थीं। इन्हें दोबारा से हमारी थाली तक पहुंचाने की जरूरत है।"

सरकार मोटे अनाज की पैदावार बढ़ाने के लिए योजना भी शुरू की है। इसके तहत देश के 14 राज्यों के दो सौ से अधिक जिलों को चिन्हित किया गया है। इन राज्यों की जलवायु मोटे अनाज की खेती के अनुकूल है।


वहीं डॉ. चन्द्रकान्ता वत्स अपनी रिपोर्ट में बताती हैं कि मोटे अनाजों में प्रोटीन, खनिज लोहा, कैल्शियम, मैगनीज, फासफोरस, पोटाशियम व सभी जरूरी विटामिन अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। ये स्वास्थ व संपूर्ण शारीरिक, मानसिक विकास के लिए आवश्यक हैं। इसके अलावा ये अनाज हृदय, मधुमेह, खून की कमी लीवर कैसंर के खतरे को कम करता है।

रागी में चावल के मुकाबले 30 गुणा ज्यादा कैल्शियम होता है और बाकी अनाज की किस्मों में कम से कम दोगुना कैल्शियम रहता है। काकुन और कुटकी (कोदो) जैसी उपज में आयरन की मात्रा बहुत होती है। वे आगे कहती हैं कि इन अनाजों की पौष्टिकता को देखते हुए इन अनाजों को मोटे अनाज की जगह पोषक अनाज के नाम से संबोधित करना ज्यादा उचित रहेगा।

मानसून के बदलते चक्र में भी कारगर

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मोटे अनाज से काफी उम्मीदें की जा रही हैं। मार्च 2017 में रिसर्चगेट पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार मोटे अनाज चावल और गेहूं की अपेक्षा जलवायु परिवर्तन से कम प्रभावित होते हैं। मोटे अनाज पर बारिश की पानी पर ज्यादा निर्भर भी नहीं होते। रिपोर्ट में बताया गया है कि उन्होंने 1966 से 2011 के बीच फसलों पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन की जांच की। इसमें पाया गया कि मानसूनी बारिश में लगातार कमी आई है।

रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि मोटे अनाज की तुलना में चावल की पैदावार बारिश के कम या ज्यादा होने से अधिक प्रभावित होती हैं। ऐसे में जहां चावल खेती ज्यादा प्रभावित होती है वहां मोटे अनाज की खेती विकल्प हो सकती है। खाद्य आपूर्ति बनाए रखने के लिए मोटे अनाज की खेती जरूरी है।

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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)गुजरात के पूर्व निदेशक डॉ. एम बसु गांव कनेक्शन को बताते हैं, " मोटे अनाजों पर जलवायु परिवर्तन का असर न के बराबर पड़ता है। इनके लिए पानी की जरूरत भी न के बराबर होती है। इनके लिए कीटनाशक या यूरिया की भी जरूरत नहीं पड़ती। जलवायु परिवर्तन के इस समय में किसानों के लिए मोटे अनाज की खेती आय का प्रमुख साधन बनेगी।"

चुनौतियां भी कम नहीं

सरकार मोटे अनाज की पैदावार पर जोर तो दे रही है लेकिन इनके लिए अलग से सरकारी खरीद केंद्र और भंडारण की कोई व्यवस्था नहीं है। इस बारे में डॉ. एम बसु कहते हैं, " मोटे अनाज को बढ़ावा देना तो अच्छी बात है लेकिन किसानों को इसका पूरा लाभ मिलना चाहिए। इसके लिए देश में इसके लिए पहले सरकारी खरीद केंद्र और भंडारण की व्यवस्था ठीक होनी चाहिए। अन्य उत्पादों की तरह ऐसा न हो कि फसल बारिश में खराब हो जाये। साथ ही किसानों को उचित मूल्य भी मिलना चाहिए।"

एक चुनौती मोटे अनाज की पैदावार बढ़ाने की भी है। भारतीय कृषि मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1966 में देश में करीब 4.5 करोड़ हेक्टेयर में मोटा अनाज उगाया जाता था जबकि अब इसका रकबा घटकर ढाई करोड़ हेक्टेयर के आसपास रह गया है।

भारत में पैदा होने वाले कुल अनाज उत्पादन में चावल का हिस्सा 44 प्रतिशत है और खरीफ के मौसम में कुल खाद्यान्न उत्पादन में 73 प्रतिशत चावल शामिल रहता है। खरीफ के दौरान शेष 27 प्रतिशत अनाज उत्पादन में मक्का (15%), बाजरा (8%), ज्वार (2.5%) और रागी (1.5%) शामिल हैं।

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