कृष्णा की पहल से पूरे गाँव में बने शौचालय

कृष्णा की पहल से पूरे गाँव में बने शौचालयgaonconnection

अमेठी। अमेठी जिले के नोहरेपुर में रहने वाली सत्रह वर्षीय कृष्णा अपने घर में शौचालय बनवाना चाहती थी लेकिन उसके भाई और पिता की मंज़ूरी के बिना ये काम नहीं हो सकता था।

एक दो बार तो उन्होंने कृष्णा की बात टाल दी लेकिन लगातार शौचालय बनाने की जिद के आगे उन लोगों को भी झुकना पड़ा और घर में सरकारी मदद से शौचालय बन गया। कृष्णा की इस पहल के आगे पूरे गाँव ने सबक लिया और अपने अपने घरों में शौचालय बनवाया।

कृष्णा ने पिता से कहा हमसे गरीब लोगों ने अपने घरों में शौचालय बनवा लिया है और गाँव के प्रधान भी जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति की मोहर पाने के लिए और नोहेरपुर को खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) घोषित करने के लिए बचे हुए घरों में शौचालय बनवाने के लिए फन्ड दे रहे हैं। इस बात पर कृष्णा के पिता मान गए और उनके घर के आंगन में एक नहीं बल्कि दो शौचालय बन गए।

कृष्णा की इस पहल ने पूरे गाँव में शौचालय के प्रति लोगों की सोच बदली आज उस गाँव के बाहर एक बोर्ड भी लगा है जो ये दर्शाता है कि नोहेरपुर खुले में शौच से मुक्त गाँव है। ये चर्चा पूरे गाँव में फैली और अब आने जाने वाले लोग कृष्णा के घर रुक कर उसे उसके इस कार्य के लिए बधाई ज़रूर देते हैं।

आखिरकार इस साल अप्रैल, मई और जून में उत्तर प्रदेश के 4 गाँव खुले में शौच से मुक्त घोषित किए गए, जिसमें से तीन तो अमेठी जिले के तिकारिया, नोहेरपुर और दरिपुर हैं और एक सुल्तानपुर जिले के खेरि दोवापुर में है। इन चार में से तीन गाँव में तीन साल से गेट्स फाउंडेशन की सहायता से पानी की सुरक्षा और स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है। 

इस बारे में अमेठी और सुल्तानपुर के जिला मजिस्ट्रेट चन्दरकान्त पान्डे और एस. राजलिंगम ने बताया “इन चारों गाँवों को ओडीएफ घोषित कर दिया गया है पर अभी स्वच्छ भारत मिशन की राज्य और केन्द्रीय समूह से अनुमति मिलनी बाकी है।” वो आगे बताते हैं, “उनका लक्ष्य वित्तीय वर्ष के अंत तक 52 गाँव को ओडीएफ की श्रेणी में लाना है।”

उत्तर प्रदेश का बिजनौर जिला अपने क्षेत्र को खुले में शौच मुक्त बनाने के लिए प्रयासरत है, और इस जिले में एक साल में 1100 शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया है जबकि जिले में शौचालय बनाए जाने और इस्तेमाल किए जाने के बारे में लोगों की विचारधारा बदलना आसान काम नहीं है।

इस बारे में राजीव गांधी महिला विकास परियोजना की सामुदायिक स्वास्थ्य प्रशिक्षक शंकुतला कहती हैं “मुझे चार साल लगे नोहेरपुर के छह स्वयं सहायता समूह को साफ-सफाई और शौचालय का महत्व समझाने में और आज गाँव के कुल 91 घरों में शौचालय और पानी की सुविधा है। अधिकांश घरों में छोटे और मामूली शौचालय हैं बहुत ने तो सरकार की 12000 रुपए की सहायता राशि से शौचालय बनाए।”

इस शौचालय को बनाने के लिए 2 गड्ढों के तरीके का इस्तेमाल किया जाता है। जब एक गड्ढा पांच साल में भर जाएगा, तो दूसरा गड्ढा इस्तेमाल किया जाएगा और पहले गड्ढे में सूखे हुए मल मूत्र को खाद की तरह इस्तेमाल किया जाएगा। अच्छी बात यह है कि पुरुष और महिलाएं दोनों शौचालयों को साफ करने की जि़म्मेदारी उठा रहे हैं। 

लोगों को खुले में शौच के खिलाफ जागरूक करने वाले तेग बहादुर, जो निगरानी समिति के सदस्य हैं, कहते हैं “पहले गाँव में लोग ‘घर और वर’ देखने आते थे, मगर अब ये देखने आते हैं कि हमारे घरों में शौचालय है या नहीं”। 26 मई 2016 को जिस दिन नोहरेपुर गाँव को खुले में शौचमुक्त घोषित किया गया इस खुशी मे जिला मजिस्ट्रेट की अगुवाई में पूरे गाँव में नाच गाने के साथ एक रैली का आयोजन किया गया जिसमें पूरे उत्साह के साथ लोग नारे लगा रहे थे “मेरे घर में शौचालय है”।

इस रैली में गाँव के युवाओं को सीटियां, टॉर्च और टोपियां दी गई ताकि वो गाँव की निगरानी करें और ये ध्यान रखें कि उनके इलाके में कोई गन्दगी न फैलाए। अगर कोई ऐसा करते हुए पकड़ा गया तो उनको इतना शर्मिन्दा करें कि वो शौचालय बनाने और उसको इस्तेमाल करने पर मजबूर हो जाए। 

सुलतानपुर जिला के खेरी दोवापुर के ओडीएफ घोषित होने से पहले भागवतीदीन (65 वर्ष) जो एक दैनिक मजदूर हैं उनके पास शौचालय बनवाने को न तो जमीन थी न पैसा। उन्होने “कोमल” समूह की सहायता से, घर में प्रवेश करने वाले स्थान पर ही एक छोटा शौचालय बनाया। 

ये शौचालय उनकी ओर से बहू के लिए उपहार था लेकिन इस्तेमाल घर के बाकी सद्स्य भी करते हैं। “माया महिला स्वयं सहायता समूह” की माया देवी ने अपने 16 जनों के परिवार के लिए दो शौचालय बनवाया। उन्होंने गाँव की एक सभा में  बताया की कैसे खुले में शौच से बीमारियां फैलती हैं।

आज गाँव के 64 घरों में शौचालय है और सतर्कता समिति सुबह शाम दो-दो घंटे गाँव को खुले में शौच से मुक्त करने के लिए पहरा देती हैं। गाँव के तालाब की भी सफाई करा दी गई है। अब इन गाँवों के लोग गर्व से कहते हैं कि मेरे घर में भी शौचालय है।

लेखक -ऊषा राय 

(साभार: चरखा)

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