कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, पहाड़ा कब तक?

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कश्मीर अशान्त है और यह अशान्ति पाकिस्तान के कारण नहीं देश के अन्दर मौजूद अलगाववादियों और उनके समर्थकों के कारण है। अशान्ति का पौधा नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने लगाया था, हमें विरासत में मिला है। भारत का दुर्भाग्य कि उन्हीं के वंशज कश्मीर समस्या का हल ढूंढते रहे उसी विरासत की पृष्ठभूमि में। भला हो श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जिन्होंने समस्या की जड़ पर चोट करने की कोशिश की लेकिन विरासत इतनी मजबूत थी कि मुखर्जी अपनी जान गवां बैठे।

आजादी के समय कश्मीर एक रियासत थी और कर्णसिंह के पिता हरिसिंह वहां के राजा थे। पाकिस्तान ने कबाइलियों के नाम से अपने सैनिक और अर्धसैनिक बलों की घुसपैठ कराई और वे श्रीनगर हवाई अड्डे के पास तक पहुंच गए थे। हरिसिंह ने भारत सरकार से सैनिक मदद मांगी तो वल्लभ भाई पटेल ने समझाया कि जब तक कश्मीर भारत का अंग नहीं बनता हम सेनाएं वहां नहीं भेज सकते। कश्मीर का भारत में विलय हुआ। पटेल की दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम था कि हमारी सेना घुसपैठियों को पीछे खदेड़ रही थी और कश्मीर सही अर्थों में भारत का अभिन्न अंग बन रहा था।

उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में फरियाद कर दी और यथास्थिति बनाए रखने का वादा कर आए। यह अजीब मामला था जब विजयी होता पक्ष फरियादी बन गया था। इतना ही नहीं जवाहर लाल नेहरू ने वहां जनमत संग्रह कराने का भी वादा कर दिया जिस पर पटेल खिन्न हुए थे। नेहरू सरकार ने धारा 370 का प्रावधान बनाया जिसकी विलय के बाद कोई आवश्यकता नहीं थी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि कश्मीर समस्या नेहरू की देन है अन्यथा पटेल ने इसे हल कर ही लिया होता। 

जब 1957 में कश्मीर की संविधान सभा ने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना तो भी कश्मीर का मसला गृह मंत्रालय को न सौंपकर प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने पास रखा। इतना ही नहीं नेहरू की गलत विदेश नीति के कारण राष्ट्रसंघ में कश्मीर का मसला बहुत कमजोर रहा और पाकिस्तान को अमेरिका का साथ मिलता रहा। बाबा साहब अम्बेडकर ने नेहरू की विदेश नीति का खुलकर विरोध किया था। कश्मीर का मसला 1948 में ही हल हो गया होता यदि पटेल को गृहमंत्री के रूप में नेहरू ने पूरी छूट दी होती। 

भारत का अंग बन जाने के बाद कश्मीर की धरती की रक्षा करना भारत का कर्तव्य बन गया था। पाकिस्तान के शासक अयूब खां ने 1965 में भारत पर हमला किया लेकिन पहली बार अच्छा जवाब मिला उन्हें। मुझे याद है शास्त्री जी का लखनऊ में अमीनाबाद के झंडे वाला पार्क में दिया गया भाषण जब उन्होंने कहा था, ‘‘अयूब खां ने कहा था अमृतसर में नाश्ता करेंगे और दिल्ली में डिनर, मैंने सोचा लाहौर में लंच कर लेते है।” सचमुच ऐसा हुआ भी था जब लाहौर से बाहर इछोगिल कैनाल के एक तरफ भारतीय और दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेनाएं खड़ी थीं। चाहते तो लाहौर में घुस सकते थे लेकिन हमारा दुर्भाग्य कि शास्त्री जी नहीं रहे, जो भूभाग जीता था वह भी रूस के दबाव में वापस करना पड़ा। 

कश्मीर की समस्या कोरी बातचीत और तुष्टीकरण से हल नहीं होगी फिर चाहे बिरयानी खिलाकर आतंकवादियों का तुष्टीकरण रहा हो और पाकिस्तान को जीती हुई भूमि लौटाकर। बिलावल भुट्टो कहता है पूरा कश्मीर लेंगे परन्तु भारत तो ऐसा करने की शक्ति भी रखता है और भारतीय संसद ने संकल्प भी ले रखा है, यदि कमी है तो इच्छा शक्ति की। बुजुर्गों ने कहा है वीर भोग्या वसुन्धरा, तो यदि अपनी आबादी पर ही नियंत्रण नहीं कर सकते तो क्या उम्मीद की जाए।

जब तक कश्मीर में आबादी का सन्तुलन नहीं बदलेगा, तुष्टीकरण की नीति नहीं बदलेगी और राजनेताओं की नीयत ठीक नहीं होगी और सबसे महत्वपूर्ण धारा 370 रहेगी, बातचीत से कश्मीर का मसला सात जनम में नहीं हल होगा। यही कारण है कि कश्मीर में आतंकवादियों के पैरोकार उनके जनाज़े में ताकत दिखाते और जेएनयू में आतंकवादियों के समर्थक गुर्राते हैं। सिलसिला पसन्द है तो जारी रखिए।

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