कुटकी से किसान को नहीं मिलता मुनाफा

कुटकी से किसान को नहीं मिलता मुनाफा

पातालकोट (छिंदवाड़ा)। मध्यप्रदेश के दक्षिण में छिंदवाड़ा जिला के पातालकोट में कुटकी फसल की कटाई चल रही है। पर पैदावार अच्छी हो या कम हो दोनों ही स्थिति में किसान को इसका मुनाफा कम ही मिलता है।

मध्यप्रदेश के दक्षिण में छिंदवाड़ा जिला प्राकृतिक संपदा से भरपूर है। जिला मुख्यालय से करीब 80 किमी दूर स्थित पातालकोट की दुनिया में गोंड और भारिया जनजाति के वनवासी सदियों से बसे हुए हैं। पातालकोट घाटी के लोग कोदो, कुटकी, रागी, मडिय़ा, धान, ज्वार, तुअर, उड़द, मूंग, कुलथी, धान, बेलिया, खेसरी, मक्का व तिलहनी फसलें उगाते हैं। फिलहाल यहां स्थानीय अनाज कुटकी की कटाई की जा रही है।  

चैतराम गोंड (उम्र 52 वर्ष) घाटी के रातेड़ गाँव के एक टीले पर अपनी पत्नी सामाबाई (45 वर्ष) के साथ कुटकी फसल की कटाई करने में मस्त हैं। पिछले कुछ वर्षों की तुलना में इस साल अपेक्षाकृत कम फसलोत्पादन हुआ है। कुटकी की फसल मुख्यतौर पर मानसूनी वर्षा पर आधारित है और जिले में अच्छी खासी वर्षा भी हुई थी। पर इस क्षेत्र में कुटकी की बुवाई के दौरान वर्षा नहीं होने से फसल के उत्पादन पर काफी फर्क पड़ा है। 

बुवाई के लिए दोमट व हल्की दोमट भूमि उपयुक्त मानी जाती है। खेती के लिए घाटी के वे हिस्से चुने जाते हैं जो ऊंचे हों। प्राय: कम उपजाऊ, पहाड़ी या पठारी, कंकरीली जमीन में इन फसलों का अधिक प्रचलन है। स्थानीय किसान भूमि को एक बार मट्टी पलटने वाले हल एवं 2-3 बार खेत में पाटा चलाकर ढेलों को तोड़ देते हैं व बुआई वाले हिस्से को समतल कर देते हैं। कुटकी छिड़क कर या बिखेर कर बोई जाती है, इसमें पौधों के बीच की दूरी बराबर नहीं होती है। बीज को 25-30 सेमी की दूरी पर बनी पंक्तियों में बोया जाता। दो पौधों के बीच का अन्तर करीब 8-10 सेमी तक होता है। करीब 2-3 बार निराई-गुराई कर खरपतवार को नष्ट कर दिया जाता है ताकि पौधों का उचित विकास हो सके। फसल करीब 90 से 140 दिन में सितम्बर से नवम्बर तक पककर तैयार हो जाती है। केवल बालियों को काटकर, सुखाकर तथा कूटकर दाना अलग कर लिया जाता है या फिर पूरा पौधा ही काटकर, सुखाकर बैलों से मड़ाई करके दाना निकाला जाता है। 

इस साल पातालकोट में कुटकी की बुवाई जुलाई के पहले सप्ताह से प्रारंभ हो गयी थी और नवंबर-दिसम्बर में फसल कट रही है।  

चैतराम ने लगभग 10 एकड़ के पहाड़ी हिस्से पर कुटकी की बुवाई की थी और उनकी आशा के विपरीत महज 80 फीसदी पैदावार हो पायी है इसके बावजूद चैतराम और उसका परिवार इस पैदावार से खुश है। करीब एक एकड़ में बुवाई के लिए आठ किलो कुटकी के बीजों की आवश्यकता होती है। चैतराम ने पहाड़ी के एक हिस्से में करीब 10 एकड़ के क्षेत्रफल में 80 किलो बीज के साथ बुवाई की थी और इनके अनुमानित तौर पर 400 किलो कुटकी तैयार हो सकती है। 

रातेड़ के नजदीक ही करेयाम बस्ती है जहां भूरा गोंड ने कुटकी की खेती करीब छह एकड़ में की है। भूरा बताते हैं, ''कुटकी का भाव करीबी गाँव छिंदी बाज़ार के व्यापारी तय करते हैं, इसके भाव को तय करने में हमारी कोई भूमिका नहीं होती है।"

इससे आगे अपनी चिंता जाहिर करते हुए भूरा कहते हैं, ''कुटकी की बिकवाली के लिए कोई खास सरकारी जगह या केंद्र नहीं है और अपनी फसल के दानों को बोरों में डालकर हम कहां-कहां भटकेंगे।"

छिंदी पातालकोट घाटी के ऊपर करीब छह किमी दूर बसा हुआ एक छोटा सा कस्बा है। पातालकोट के वनवासियों के लिए ये कस्बा व्यापार केंद्र की तरह ही है। यहां के व्यापारी कुटकी की खरीदी दो तरह से करते हैं। यदि कुटकी छिलकों सहित हो तो इसका बाज़ार भाव करीब 30 रुपए प्रति किलो होता है, इसे खड़ी कुटकी कहा जाता है और यदि कुटकी साफ करके बेची जाए तो इसकी कीमत करीब 50 से 60 रुपए प्रति किलो तक तय हो जाती है। दुर्भाग्य की बात है कि कुटकी की फसल ज्यादा हो या कम दोनों सूरत में इसका बाजार मूल्य छिंदी के व्यापारी ही तय करते हैं। ऐसे हालात में वनवासियों को असल कीमत मिलने की गुंजाईश लगभग खत्म हो जाती है। सरकार की तरफ से कुटकी की सही मूल्य पर बिकवाली के लिए कोई भी उचित प्रबंध नहीं दिखायी देते हैं और इस सूरत में नजदीकी इलाकों के दलालों का बोल-बाला साफ दिखायी देता है।

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