यह रक्षा-बंधन पर्यावरण के नाम

रक्षा बंधन रक्षा और स्नेह का त्यौहार है। तो हमने सोचा कि बच्चे पेड़ पौधों की अहमियत समझें और इन्हें संरक्षित करें इसलिए हम सब में नहीं मिलकर इनसे राखियां बनवायी और फिर सभी बच्चों को तीन-तीन के समूह में बांटकर उनसे पौधे लगवाकर उनमें राखियां बंधवाईं।

यह रक्षा-बंधन पर्यावरण के नाम

सलौली (लखनऊ)। हर सुबह इस स्कूल में बच्चों के दिन शुरूआत पेड़-पौधों की देखभाल से होती है, यही नहीं इस रक्षाबंधन पर बच्चों ने अपने लगाए पेड़-पौधों को राखियां भी बांधी और उनकी देखभाल करने का भी प्रण लिया।

गमले में लगाए पौधे की जड़ों में रानी अपने नन्हें हाथों से पानी छिड़कती हैं और फिर साहिल और दिव्या के साथ मिलकर जो राखी उसने बनाई है, उसे वह पौधे की शाखा से बांध देती है। राखी बाँधने के बाद रानी के चेहरे पर जो संतोष भरी मुस्कान आयी है वह किसी उपहार की उपेक्षा नहीं करती।

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यह अनोखा दृश्य प्राथमिक विद्यालय सलौली का है जहाँ कक्षा एक में पढ़ने वाली रानी (6 वर्ष) के साथ विद्यालय भर के बच्चों ने गमलों और क्यारियों में पौधे लगाए और फ़िर उन पौधों मे अपने हाथों से बनायीं हुई राखियां बांधी। सलौली, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 30 किलोमीटर दूर गोसाईगंज ब्लॉक में स्थित है। पर्यावरण प्रदूषण के बीच बढ़ते बच्चों को पर्यावरण अनुकूल त्यौहार मानाना सीखने के लिए विद्यालय के प्रधानध्यापक संतोष कुमार ने यह अनोखी तरकीब निकाली। "रक्षा बंधन रक्षा और स्नेह का त्यौहार है। तो हमने तो हमने सोचा की बच्चे पेड़ पौधों की अहमियत समझें और इन्हें संरक्षित करें इसलिए हम सब में.नहीं मिलकर इनसे राखियाँ बनवायी और फिर सभी बच्चों को तीन-तीन के समूह में बाँटकर उनसे पौधे लगवाकर उनमें राखियाँ बंधवायीं, "संतोष बताते हैं।

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प्रधानाचार्य और शिक्षकों साथ मनाये गए बच्चों के इस हरित-रक्षा-बंधन में अभिभावकों ने भी सहयोग कर पर्यावरण के करीब एक कदम बढ़ाया। विद्यालय में पढ़ने वाले युवराज के पिता रज्जन लाल ने खुद युवराज की राखी बनाने में मदद की ताकि अनुराग विद्यालय जाकर वृक्ष की सुरक्षा कर सके। "हमने पापा-मम्मी को जब बताया तब उन्होंने घर के बाहर भी वृक्षारोपण किया और फिर मुझे उसके लिए राखी बनाने को कहा। फ़िर सुबह विद्यालय आकर यहां अशोक के पौधे को लगाकर उसमें भी राखी बांधी। अब कुछ साल में यह बड़ा होकर पेड़ बन जाएगा, "अनुराग ने ख़ुशी से बताया।

दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली रेशमा और पांचवीं के साहिल ने नये पौधे लगाने की बजाय विद्यालय प्रांगण में लगे विशाल वृक्ष को ही राखी बांधी। साहिल बताता है कि कैसे उसने पूरे मैदान को अपनी घनी शाखाओं ढकने वाले पीपल के पेड़ के लिए तीन मीटर लम्बी डोर वाली राखी बनाई। हमें सर ने बताया है की जैसे वृक्षारोपण ज़रूरी है, वैसे ही पुराने वृक्षों को बचाना।

विद्यालय के सहायक अध्यापक कमलेश शर्मा जिन्होंने बच्चों के साथ बैठकर राखी बनवायी, बताते हैं, "बच्चों से राखी बनवाने में करीबन 30 रुपए खर्च हुए जो कि विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने खर्च किये बाकी ऐसे वस्तुओं को इस्तेमाल में लिया गया जो उपयोग की नहीं थी पुराने गत्ते, रूई, बचे हुए रंगीन चार्ट के टुकड़े, बटन जैसे सामान का हमने इस्तेमाल किया।

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