लघु पशुपालन का बढ़ रहा दायरा

लघु पशुपालन का बढ़ रहा दायरागाँव कनेक्शन

लखनऊ। कम खर्च और ज्यादा मुनाफे के चलते पशुपालकों का रुझान छोटे पशुओं की ओर बढ़ता जा रहा है और सिकुड़ते चारागाह और चरने के लिए कम होती जमीन के चलते पशुपालक अब बड़े पशुओं को पालने में असमर्थ होते जा रहे हैं। 

मैनपुरी जिले के शशि कुमार गुप्ता (40 वर्ष) के पास छह बड़े पशु हैं और करीब 900 (मुर्गें-मुर्गी) छोटे पशु है। शशि बताते हैं, “एक महीने में बड़े पशु (गाय और भैंस) पर करीब डेढ़ से दो हजार रुपए का खर्चा आता है क्योंकि भूसा और हरे चारे के दाम बढ़ते घटते रहते हैं, साथ ही गाय भैसों का मिलिरल मिश्रण भी खरीदना पड़ता है, जिससे उनका दूध बढ़ता है। आजकल दूध का रेट भी कम चल रहा है जितना पशुओं को खिलाते हैं उतनी ही दूध से कमाई होती है।”

बड़े मवेशियों के घटते रुझान के बारे में मेरठ में स्थित सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफसर डॉ. डीके साहू बताते हैं, “बड़े पशुओं के रखरखाव और उनके खर्च अधिक है, जिस कारण लोग नहीं पालते है। अगर हरियाणा, पंजाब  इन सब जगहों को देखें तो वहां लोग बड़े पशुओं को पालने में रुझान दिखा रहे हैं। हर साल युवराज और हरधेनु जैसे पशुओं को ला रहे है, जो छोटे पशुपालक है वो ज्यादातर बकरी, भेड़ सुअर मुर्गें-मुर्गियों पर ही निर्भर है।”

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साल 2012 में की गई पशु गणना के अनुसार भारत में बड़े पशु में भैसों की संख्या 5 करोड़ 45 लाख, गायों की संख्या 7 करोड़ 30 लाख हैं, वहीं छोटे पशु बकरे-बकरियों की संख्या 14 करोड़ 5 लाख, पोल्ट्री की संख्या 64 करोड़ 88 लाख, भेड़ों की संख्या 7 करोड़ 16 लाख है।

“पहले पशुओं के चरने के लिए जमीन थी, तो उनके खिलाने पर खर्च कम आता था पर कई पशुपालक तो अब ऐसे जो अपने पशुओं को चराते ही नहीं है। लेकिन जो छोटे पशु हैं जैसे भेड़ बकरी सूअर उन पशुओं के लिए इतनी चरने की आवश्यकता नहीं होती है वह कम चारे के भी अच्छा उत्पादन देते हैं।” ऐसा बताते हैं, बाराबंकी जिले के पशु विशेषज्ञ डॉ एस. के. सिंह।

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के 2010-11 के आंकड़ों के अनुसार स्थायी चारागाह अन्य स्थानों को मिलाकर वर्तमान में देश में 10,301 हजार हेक्टेयर जमीन है जिसमें पिछले दो दशकों में 1,103 हजार हेक्टेयर चारागाह खत्म हो गए हैं।

बाराबंकी जिला मुख्यालय से पूर्व दिशा में लगभग 32 किमी दूर त्रिवेदीगंज ब्लॉक के मोहम्मदपुर गाँव में हाइटेक बकरी फार्म चला रहे हैं। विवेक बताते हैं, “अभी हमारे पास कुल 70 बकरे-बकरियां हैं, जिनमें रोज एक बकरी पर रोजाना चारा-दाना खिलाने में लगभग 10-15 रुपए का खर्चा आता है। इनका वजन देशी बकरी के मुकाबले ज्यादा होता है फिर भी यह कम खाकर ज्यादा मुनाफा देती है। इनके लाने के 8-10 महीनों बाद ही यह बिकने लायक हो जाते है।”

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