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लखनऊ के स्कूलों में बनाई जाए लाइब्रेरी, सुधर सकता है शिक्षा का स्तर

Meenal TingalMeenal Tingal   1 Aug 2016 5:30 AM GMT

लखनऊ के स्कूलों में बनाई जाए लाइब्रेरी, सुधर सकता है शिक्षा का स्तरगाँव कनेक्शन

लखनऊ। अप्रैल में शैक्षिक सत्र शुरू हुए आज अगस्त महीने की भी शुरुआत हो गयी लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को अभी भी बिना किताबों के ही पढ़ाई करनी पड़ रही है। कुछ बच्चों ने किसी तरह से किताबों की व्यवस्था कर भी ली है तो उस किताब की स्थिति बेहाल है। 

शैक्षिक सत्र शुरू हुए चार महीने पूरे हो चुके हैं और पांचवा महीना लग गया है लेकिन किताबों के अब तक बच्चों तक न पहुंच पाने के चलते हर स्कूल के तो नहीं पर कई स्कूलों के शिक्षकों ने चिंता जतायी है। उनका कहना है कि सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों को ही इस बात का जिम्मेदार ठहराया जाता है कि शिक्षक स्कूलों में पढ़ाते नहीं हैं तभी बच्चों की शिक्षा का स्तर ठीक नहीं हो रहा। लेकिन सच यह है कि इसके लिए शिक्षकों से ज्यादा सरकार जिम्मेदार है। न तो सरकार को बच्चों की किताबों की परवाह है और न ही ड्रेस और अन्य सामानों की। 

वैसे तो बच्चों को स्कूल ड्रेस की भी जरूरत होती है लेकिन अन्य ड्रेस पहन कर भी बच्चे स्कूल आ सकते हैं लेकिन किताबों के बिना पढ़ाई करवाना बेहद मुश्किल है। हम यह नहीं कहते कि शैक्षिक सत्र की शुरुआत में किताबें मिलने के बाद बच्चे पढ़ाई में बहुत आगे निकल जायेंगे, लेकिन यह जरूर है कि उनकी शिक्षा का स्तर कुछ हद तक अवश्य सुधर सकता है। 

इस सम्बन्ध में क्वीन्स इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य डाॅ. आरपी मिश्र कहते हैं “सरकार को पता है कि शैक्षिक सत्र शुरू होने वाला है तो उससे पहले ही किताबों, बस्तों, ड्रेस, एमडीएम और बच्चों की अन्य जरूरतों के सामानों को पहले से तैयार करवा लेना चाहिये। लेकिन हाल यह है कि शैक्षिक सत्र शुरू होने के तीन महीने गुजरने के बाद भी किताबों की छपाई का टेंडर नहीं हो पाता। अर्धवार्षिक परीक्षाएं शुरू होने तक भी यदि किताबें बच्चों तक पहुंच जाएं तो बड़ी बात है।”

वह आगे कहते हैं “हमारा सुझाव है कि जब तक इस स्थिति में सुधार नहीं किया जाता तब तक ऐसी लाइब्रेरी स्कूल में खोली जानी चाहिये जहां पर उन बच्चों की किताबों को सुरक्षित कर लेना चाहिये जो आगे की कक्षा में जा रहे हैं। इससे छात्रों को शैक्षिक सत्र की शुरुआत में ही किताबें मिल जाएंगी। साथ ही किताबों को छपवाने में जो पैसा सरकार का खर्च होता है वह भी बच जायेगा। किताबें छपवाने और स्कूलों में वितरित करने की प्रक्रिया दो या तीन वर्ष में एक बार ही होनी चाहिये। डाॅ. मिश्रा कहते हैं कि यह मत केवल मेरा नहीं है। चूंकि मैं शिक्षक संघ से जुड़ा हुआ हूं तो अक्सर ही यह बाते अन्य शिक्षकों से भी होती हैं। लगभग हर शिक्षक ऐसा ही चाहता है।”

स्कूल में पुस्तकालय जरूरी : राय

कालीचरण इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य डाॅ. महेन्द्र नाथ राय कहते हैं कि मैं अपने स्तर पर किताबें एकत्र कर बच्चों को हर वर्ष वितरित कर देता हूं ताकि उनकी पढ़ाई में कोई बाधा न आ सके। लेकिन ऐसा केवल अनौपचारिक रूप से ही कर पाता हूं। स्कूल में ऐसी लाइब्रेरी बनाने की तमन्ना मेरी भी है जहां कक्षाओं को पास कर चुके बच्चों की किताबों को सही स्थिति में करके रखा जा सके और जरूरतमंद बच्चों को दिया जा सके जैसा कि विदेशों में होता है।

लेकिन औपचारिक रूप से लाइब्रेरी बनाकर और बच्चों से किताबों को लेकर अन्य बच्चों को देने का काम हम लोग चाहकर भी अपनी मर्जी से नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा करने में लोग हम शिक्षकों पर भ्रष्टाचार का  इल्जाम लगा दिया जायेगा। लेकिन इस बारे में सरकार को सोचने की जरूरत है। डाॅ. राय कहते हैं कि हम शिक्षक बच्चों के हित के लिए ऐसा सोचते हैं लेकिन सरकार नहीं सोचती है। यदि सरकार भी इस बारे में सोच सके तो बच्चों के शिक्षा का स्तर कुछ हद तक अवश्य सुधारा जा सकता है।

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