लखनऊ पूछेगा सोनिया-राहुल से, फ़ीरोज़ गांधी कौन थे

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उत्तर प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस ने भी चहलकदमी आरम्भ की है, बच्चों को पर्चे मिलेंगे खेलने को, कांग्रेसियों को पैसे मिठाई खाने को और थोड़ा शोरोशराबा होगा बस। यह वही लखनऊ है जो कांग्रेस की कर्मभूमि हुआ करता था, जहां से कांग्रेस के पुलिन बिहारी बनर्जी जैसे अनजान व्यक्ति ने जनसंघ के अटलजी को हराया था। चन्द्रभानु गुप्त की धरती थी और कांग्रेस की तिजोरी। हालात बदले और चन्द्रभानु गुप्त ने कांग्रेस छोड़ दी और उसके अख़बारों की हालत भी पतली होने लगी।  

अब हालत यह है कि सुब्रमन्यम स्वामी द्वारा दायर याचिका में नेशनल हेराल्ड की सम्पत्ति में तथाकथित भ्रष्टाचार का मामला उठाया गया है और सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित अनेकों लोगों पर आरोप हैं। ध्यान रहे लखनऊ से छपने वाले नेशनल हेराल्ड, नवजीवन और कौमी आवाज़ ये वहीं अख़बार हैं जिन्होंने आजादी की लड़ाई में बड़ा योगदान दिया था। ये अखबार कब और कैसे बन्द हुए और भ्रष्टाचार के शिकार हुए यह अदालत में विचाराधीन है। 

इन अखबारों के प्रबंध निदेशक थे राहुल गांधी के दादा फ़ीरोज़ जहांगीर गांधी। वह इन्दिरा गांधी के पति और राजीव गांधी के पिता थे। फ़ीरोज़ गांधी ने गांधी परिवार को अपना नाम दिया क्योंकि भारत में पिता के नाम से ही परिवार का नाम चलता है। फ़ीरोज़ गांधी प्रबन्ध निदेशक ही नहीं अखबारों के माध्यम से जनता की आवाज़ बुलंद करने वाले, आजाद भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ने वाले पहले सांसद थे। प्रेस की आजादी और जन सूचना अधिकार के लिए लड़ने वाले फ़ीरोज़ गांधी हमारे देश के अग्रणी नेता थे। नेशनल हेराल्ड के स्वनामधन्य सम्पादक थे चेलापति राव। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि फ़ीरोज़ गांधी के परिवार ने ना तो उनका कोई स्मारक बनवाया और न जन्म शताब्दी मनाई। हम उम्मीद करते हैं यहां का वोटर यह सवाल पूछेगा। 

फ़ीरोज़ गांधी ने नेहरू से अपनी रिश्तेदारी की परवाह किए बिना सरकार की औद्योगिक नीतियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ दी थी। उनकी सन्तानों पर भ्रष्टाचार का केस चले, बड़े कष्ट की बात है। फ़ीरोज़ गांधी ने 1955 में डालमियां-जैन कम्पनी द्वारा बीमा धारकों के पैसे के दुरुपयोग का मामला उठाकर नेहरू सरकार और संसद को स्तब्ध कर दिया था। भ्रष्टाचारों के खिलाफ बड़ी मेहनत से आंकड़े इकट्ठे किए और सदन में साबित किया कि सरकार द्वारा जाने अनजाने भ्रष्टाचार को समर्थन मिल रहा था। उनके अथक प्रयासों का परिणाम था कि भारतीय जीवन बीमा निगम का जन्म हुआ भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई बन्द नहीं हुई। 

जब दूसरी बार 1957 में सांसद चुनकर आए तो एचडी मूंधड़ा के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला जोर-शोर से उठाया और नेहरू सरकार के वित्तमंत्री टी टी कृष्णमाचारी को त्यागपत्र देना पड़ा। पूरे मामले की जांच के लिए बम्बई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अली करीम छागला की अध्यक्षता में एक जांच कमीशन बिठाया गया। फ़ीरोज़ गांधी ने साबित कर दिया था कि एक सांसद यदि मेहनत करे और जनता के मुद्दे उठाए तो क्या नहीं कर सकता है। देश के नौजवानों को पता होना चाहिए कि स्वतंत्र भारत मे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का आरम्भ फ़ीरोज़ गांधी ने किया था। 

उनकी जन्म शताब्दी का वर्ष 2012 में आया और चला गया लेकिन संसद के अन्दर और संसद के बाहर प्रेस के लिए लड़ने वाले इस महापुरुष की याद ना तो उनके परिवार और ना ही हमारे मीडिया को आई। शायद ही कोई जानता हो कि उन्हें नजरअन्दाज क्यों किया गया। सच तो यह है कि अगर फ़ीरोज़ साहब के वंश परिवार ने उनका रास्ता अपनाया होता तो भ्रष्टाचार मिट गया होता। अफसोस की बात है कि जिसके ससुर प्रथम प्रधानमंत्री थे, जिसकी पत्नी प्रधानमंत्री बनी और जिसका बेटा प्रधानमंत्री बना वह स्वयं आज तक देश में गुमनाम है। 

फ़ीरोज़ गांधी 48 साल की आयु में 1960 में इस दुनिया से चले गए लेकिन फ़ीरोज़ गांधी का योगदान अखबारों को चलाने तक ही नहीं, प्रेस की आजादी के लिए जो संघर्ष किया उसे भुलाया नहीं जाना चाहिए। परिवार और प्रेस ने तो भुलाया ही, अल्पसंख्यकों के नाम पर राजनीति करने वाले लोग भी भूल गए।

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