लोगों को भाया बनारस का पहला ग्रामीण 'कैथी फिल्म महोत्सव'

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कैथी (वाराणसी)। गंगा-गोमती नदियों के संगम के लिए प्रसिद्व कैथी गाँव में पहला मौका था, जब एक ही मंच पर लोकगीत, लोक नृत्य, नाटक के साथ ही कई फिल्में भी दिखायी गईं, मौका था पहले 'कैथी फिल्म महोत्सव' का, जिसमें आस-पास के गाँव ही नहीं, दूसरे ज़िले, दूसरे प्रदेश के साथ ही विदेश से आये लोगों ने हिस्सा लिया।

शहरों में तो बहुत महोत्सव होते हैं, लेकिन वाराणसी जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी दूर चोलापुर ब्लॉक के कैथी गाँव में तीन दिवसीय फिल्म महोत्सव बनारस के किसी गाँव में अपने तरह का ये पहला फिल्म महोत्सव था।

जिसमें शीला गिरी(35 वर्ष) दोपहर में ही घर का सारा काम करके कैथी के शिवालय के पास आ जाती और रात दस बजे के पहले के घर नहीं जाती। ये शीला ही नहीं कैथी के आस-पास के दर्जनों गाँव के हज़ारों लोग दोपहर से ही डेरा जमा लेते और रात के पहले नहीं जाते।

कैथी फिल्म सोसाइटी के संयोजक और सामाजिक कार्यकर्ता बल्लभाचार्य महोत्सव के शुरुआत के बारे में बताते हैं, ''आज लोगों के पास समय ही नहीं है कि लोग एक साथ बैठ सकें किसी मुद्दे पर चर्चा कर सकें, महोत्सव के जरिए हजारों लोग इकट्ठा हुए कई मुद्दों पर चर्चाएं हुई। किसी ग्रामीण अंचल में सांस्कृतिक विविधताओं सहित स्वस्थ मनोरंजन के साथ सामाजिक सन्देश देने में काफी हद तक सफल इस कार्यक्रम का श्रेय स्थानीय युवकों की दिन-रात की मेहनत को जाता है, हम प्रतिवर्ष ऐसे आयोजन करने की कोशिश करेंगे।"

कार्यक्रम के पहले दिन का शुभारम्भ में दीप प्रज्वलन किसी बड़े नेता से न करा, गाँव के ही वरिष्ठ लोगों से कराया गया। इस बारे में 'आयाम का सिनेमा' से जुड़े सुनील दत्ता कहते हैं, ''गाँव का कार्यक्रम है तो हम किसी नेता को क्यों बुलाते, इसलिए गाँव के बड़े बुर्जुगों से कार्यक्रम का उद्घाटन कराया गया।" 

कैथी फिल्म सोसाइटी, आवाम का सिनेमा और नेशनल लोकरंग अकादमी उत्तर प्रदेश के संयुक्त तत्वाधान में इस कार्यक्रम की शुरुआत की गयी। तीन दिन तक चले फिल्म महोत्सव से गाँव में मेले का माहौल रहा। बच्चे, औरते, बूढ़े सभी कार्यक्रम स्थल पर दोपहर से ही इकट्ठा होने लगती और शाम होते होते संख्या कई हज़ारों की संख्या में हो जाती। 

इंदौर, मध्यप्रदेश से आयी गायिका अंजना सक्सेना के नेतृत्व में स्वरागिनी समूह के कलाकारों ने कबीर अमृत वाणी की सुमधुर प्रस्तुति से समां बांध लिया, आकाशवाणी और दूरदर्शन के कलाकार युगल किशोर सिंह ने भोजपुरी भजन, दादरा, चैती, कजरी प्रस्तुत कर लोगों को भावविभोर कर दिया।

क्रांतिकारियों की स्मृति में लगायी गयी प्रदर्शनी

महोत्सव में क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ बक्शी स्मृति पोस्टर प्रदर्शनी, शहीद अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँ स्मृति दस्तावेज प्रदर्शनी, जनकवि धूमिल स्मृति पुस्तक प्रदर्शनी और कैथी मुक्ताकाशी छायाचित्र एवं कला प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया। प्रदर्शनियों में क्रांतिकारियों की दुर्लभ तस्वीरों के साथ ही उनसे जुड़े कई दस्तावेजों का प्रदर्शन किया गया। महोत्सव में आये भंदहा कला के राम आधार सिंह बताते हैं, "प्रदर्शनी में क्रांतिकारियों से जुड़ी ऐसी बहुत सी चीजें देखने को मिली जिनके बारे में अब तक किताबों में पढ़ता आया था। पुस्तक प्रदर्शनी में कई प्रकाशकों की किताबें गाँव में ही मिल गयीं।"

लोक कलाकारों ने किया अपने हुनर का प्रदर्शन

आज़मगढ़ जि़ले का मशहूर लोक नृत्य कहरवा और जांघिया साथ ही गाजीपुर के हुड़ुप और गोंड़ऊ जैसे लोक नृत्य जिसको लोग भूल रहे हैं। ऐसे लोक कलाओं का भी प्रदर्शन कलाकारों ने किया। गाजीपुर जि़ले के रेउसा गाँव से आये रघुवर राम (55 वर्ष) पिछले पच्चीस वर्षों से भी अधिक समय से हुड़ुप और धोबिया लोक नृत्य कर रहे हैं और रघुवर राम ने ही अपने ग्रुप के लोगों का इस कला से परिचय कराया। रघुवर राम बताते हैं, ''पिछले कई साल से कई ज़िलों में जाकर हम अपनी कला को दिखाते हैं, मेरे ग्रुप में मैं जोकर बनता हूं मेरा काम है लोगों को हंसाना। वो आगे कहते हैं, हम लोगों ने पटना, नैनीताल के साथ ही यहां के कई ज़िलों में अपना कार्यक्रम दिखाया है।"

समाज के गंभीर मुद्दों पर बनी फिल्मों का किया गया प्रदर्शन

महोत्सव के दिन अंधेरा होते ही लोगों की भीड़ बढ़नी शुरु हो जाती, हर दिन सात बजे से आवाम के सिनेमा के तत्वाधान में लघु और फीचर फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता। पहले दिन गाँव के ही कलाकारों द्वारा अभिनित और वैभव पाण्डेय द्वारा निर्देशित लघु फिल्म तीन पहिया, गंगा नदी पर आधारित डॉ. राजीव श्रीवास्तव की बनायी फिल्म गंगा और हिन्दी फीचर फिल्म सुभाष चन्द्र बोस, दूसरे दिन लघु फिल्म इंकलाब और फिल्म मदर इंडिया का प्रदर्शन किया गया और तीसरे दिन लघु फिल्म दशरथ मांझी और दो बीघा जमीन दिखायी गयी। आवाम के सिनेमा के संस्थापक शाह आलम कहते हैं, ''गाँव के लोग भी अब फोन और टीवी तक सिमट गये हैं, हमारा उद्देश्य है कि गाँवों के लोगों का आजादी की लड़ाई में शामिल क्रांतिकारियों की ज़िन्दगी से परिचय कराना। हम लोग कई जि़लों के गाँवों में फिल्मों का प्रदर्शन करते हैं बनारस के गाँव में ऐसा पहला कार्यक्रम है।"

नाटकों के जरिए समाज की कुरीतियों पर किया गया प्रहार

पहले दिन प्रेरणा कला मंच की प्रस्तुति 'गंगा हो या गांगी' से नदी और नारी की व्यथा दर्शायी गयी, दूसरे दिन प्रेमचंद्र की कहानी अमानत पर आधारित नाटक का प्रदर्शन किया गया तीसरे दिन स्कोर्ड्स कला मंच के कलाकारों ने मूक और हास्य अभिनय करके लोगों को हंसाया।

समाज के ज्वलंत मुद्दों पर हुई परिचर्चा

पहले दिन की परिचर्चा 'सत्तर साल बनाम सात सवाल' में बोलते हुए वक्ताओं ने आजादी के बाद देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, कुपोषण, अपराध, रोजगार, पर्यावरण और आपसी सौहार्द आदि मुद्दों पर हुए परिवर्तन पर बात की गयी। दूसरे दिन 'भारतीय क्रांति में नारियों का योगदान' पर लखनऊ की निवेदिता श्रीवास्तव, इलाहाबाद की सरस दरबारी और अमेरिका से आयी गुड्डो दादी ने चर्चा की। तीसरे दिन 'किसानों की आत्म हत्याएं और सरकारें मौन' पर बोलते हुए वक्ताओं ने किसानो की समस्याओं पर चर्चा की किसानों की समस्या पर प्रो.सोमनाथ त्रिपाठी ने कहा, ''आज अन्नदाता निरीह प्राणी हो गया है, भारत जैसे कृषि प्रधान देश में आये दिन हो रही किसानो की आत्महत्याएं दुर्भाग्यपूर्ण हैं, इसके लिए निसंदेह सरकारों की नीतियां जिम्मेदार हैं, गोष्ठी में प्रमुख रूप से प्रो. सोमनाथ त्रिपाठी, डॉ. राजीव श्रीवास्तव, अरविन्द मूर्ति व दिवेंद्र सिंह ने अपने विचार रखे, संचालन सुनील दत्ता ने किया।"

अमेरिका के शिकागो शहर से खींच लायी गाँव की खुशबू

पिछले कई वर्षों से अमेरिका के शहर शिकागो में रहने वाली गुड्डो दादी को अपने फेसबुक मित्र सुनील दत्ता के जरिए कैथी फिल्म महोत्सव के बारे में पाता चला। फिर क्या गुड्डो दादी दो दिन पहले ही फ्लाइट पकड़कर सीधे डॉ. राजीव श्रीवास्तव के पास दिल्ली आ गयी, वहां से सीधे कैथी गाँव। गुड्डो दादी बताती हैं, ''बहुत साल से परदेश में हूं, फेसबुक के जरिए देश के लोगों से यहां की खबर मिलती रहती है। जब कैथी महोत्सव के बारे में पता चला तो मुझे लगा यही मौका है अपने देश तक आने का बस आ गयी।"

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