लोकतंत्र में बेसिक के ख़िलाफ़ है फ्री बेसिक

लोकतंत्र में बेसिक के ख़िलाफ़ है फ्री बेसिकगाँव कनेक्शन

आजकल आप अख़बार में फेसबुक का विज्ञापन देख रहे होंगे। फेसबुक चार-चार पन्ने का विज्ञापन दे रहा है। बाज़ार से लेकर हवाई अड्डे तक फेसबुक के विज्ञापन से भरे हैं। फेसबुक इन महंगे विज्ञापनों के ज़रिए अपने उत्पाद के लिए आंदोलन चला रहा है। आंदोलन का उसका तरीका जनलोकपाल और मिस्ड कॉल के ज़रिए दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनने का दावा करने वाली बीजेपी से मिलता जुलता है। फेसबुक अपने इस अभियान के ज़रिए भारत सरकार की संवैधानिक संस्था trai ( ट्राई ) पर दबाव डाल रहा है। 

फेसबुक को टेलीकॉम नियामक संस्था ट्राई के एक फ़ैसले से आपत्ति है और फेसबुक कंपनी लाखों मिस्ड काल और ईमेल के ज़रिए जनदबाव की लहर पैदा करना चाहती है ताकि trai उसके मनोनुकूल फ़ैसला दे। केरल में एक कंपनी ने पंचायत पर ही कब्जा कर लिया। इसलिए फेसबुक के इस विज्ञापन युद्ध पर विचार करना चाहिए। हमारे राजनीतिक दल सोते रहते हैं। इससे पहले एयरटेल ज़ीरो के प्लान को लेकर जब विरोध हुआ तब भी सो रहे थे। गनीमत है कि उस वक्त सरकार जल्दी जाग गई और मंत्री भी नेट न्यूट्रालिटी के हक में बयान देने लगे। सीमित जनदबाव के आगे एयरटेल कंपनी ने अपनी उस योजना को वापस ले ली। पर फेसबुक कंपनी जनता के बीच चली गई है। वो अपने प्लान फ्री बेसिक का विरोध कर रहे नेट कार्यकर्ताओं और trai के खिलाफ आंदोलन चला रही है। 

मुझे नहीं पता या फेसबुक ने अभी तक नहीं बताया कि फेसबुक ने मिस्ड कॉल का जो नंबर दिया है उस पर कितने कॉल आए हैं और उनकी सत्यता की जांच कैसे की जा रही है। जो ईमेल भेजे जा रहे हैं उनकी सत्यता की जांच करने का अधिकार और संसाधन  trai के पास है या नहीं या trai जांच करेगी भी या सिर्फ संख्या को राय मान लेगी। नियामक संस्था संख्या के आधार पर फ़ैसला करती है या अपनी नीतियों पर विचार करने के बाद फ़ैसला लेती है। क्या  trai को फेसबुक को नोटिस नहीं भेजना चाहिए कि उसका ऐसा करना ही नेट न्यूट्रालिटी की सोच के ख़िलाफ़ है।

फेसबुक हमारी राजनीति का विकल्प पेश कर रहा है पर क्या यह राजनीति के लिए चिन्ता की बात नहीं। मान लीजिए कि कोई भारतीय कंपनी नरेंद्र मोदी सरकार की किसी नीति के ख़िलाफ़ इस तरह से विज्ञापन युद्ध की घोषणा कर दे तो क्या सरकार चुपचाप सहन कर लेगी? फिर फेसबुक जैसी कंपनी को यह छूट क्यों मिल रही है। हमारी सरकार और हमारा विपक्ष चुप क्यों है? 

फ्री बेसिक क्या है? फेसबुक कंपनी दावा करती है कि तीस देशों में हैं। अमरीका या फ्रांस में है, थोड़ा बहुत पढ़कर लगा कि ग़रीबी उन्मूलन का कोई कार्यक्रम है। फेसबुक के विज्ञापन में लिखा है ''एक अरब भारतीयों को नौकरी, शिक्षा, ऑनलाइन के अवसरों और बेहतर भविष्य से जोडऩे का पहला क़दम है।" फेसबुक ने इतना पैसा खर्च कर दिया पर यह नहीं बताया कि फ्री बेसिक के तहत क्या सुविधा मिलेगी और कब तक।

भारत में करीब एक अरब लोगों के पास फोन है। क्या भारत सरकार यह मानती है, जिसके पास फोन है वो ग़रीबी रेखा से नीचे है या ऊपर? हमें नहीं मालूम। अगर ग़रीबी रेखा से ऊपर है तो फिर फेसबुक किसे ग़रीबी से बाहर लाएगा। क्या अगर सबको सूचना हो तो ग़रीबी नहीं रहेगी? ये किस अर्थशास्त्री का फ़ॉर्मूला है? क्या फेसबुक सिर्फ ग़रीबों का क्लास ही बदलता है। एकाध क़िस्सों से बदलाव की गाथा नहीं बनती।

अमरीका में एक मोबाइल कम्पनी है T-Mobil। इस कंपनी ने bing on नाम से एक सेवा शुरू की है। इसके तहत निश्चित डेटा प्लान के लिए कुछ वीडियो चैनलों को असीमित मात्रा में देखने की छूट होगी। इसमें यू ट्यूब नहीं है। यू ट्यूब ने आरोप लगाया कि मोबाइल कंपनी ने अपनी सेवा में यू ट्यूब के वीडियो को कमज़ोर कर दिया है। मतलब आप T-Mobil के उपभोक्ता है और यू ट्यूब पर कोई वीडियो देखना चाहते हैं तो वह रूक रूक कर आएगा। डेली हेरल्ड अख़बार ने लिखा है, फेन कंपनी अपने इस प्लान को सभी थ्रीजी उपभोक्ता को दे रही है। इस तरह से कंपनी ने बड़े उपभोक्ता वर्ग की पहुंच यू ट्यूब से दूर कर दी। 

न्यूज चैनलों की दुनिया में ये हो चुका है और हो रहा है। आप जानते हैं कि केबल में एक से सौ तक चैनल आते हैं। सौवें नंबर पर जो चैनल आएगा वो साफ नहीं आएगा। इसलिए केबल वाले पहले दस में दिखाने के लिए चैनलों से अनाप शनाप पैसा लेने लगे और चैनल भी देने लगे। इस कारण धंधे में ब्लैकमेलिंग होने लगी है। खर्चे में कटौती होने से पत्रकार समाप्त हो गए। इससे आपको क्या नुक़सान हुआ ये तब पता चलेगा जब आप किसी बात से प्रभावित होंगे और सरकार का ध्यान खींचने के लिए चैनलों के दफ्तर फोन करेंगे। कोई नहीं आएगा क्योंकि खबर की जगह तो पूरी शाम बहस चल रही होती है। निगम वाले रिश्वत न देने पर आपका मकान तोड़ जाएंगे और वाइस चांसलर अपनी मनमानी करता रहेगा।

सोचिए आप कोई ऐप बनाकर गूगल में डालते हैं। गूगल अपने सर्च ईंजन में आपके ऐप पर बंदिशें लगा दे कि कोई खोज ही न सके, आपसे दाम मांगे तो क्या करेंगे। इससे तो टेलीकाम कंपनियां और कुछ बड़ी कंपनियां मिलकर बाकियों को बाहर कर देंगी। इंटरनेट का प्रयोग बिना रोक-टोक होना चाहिए। इसीलिए यह लड़ाई लड़ी जा रही है कि नेट न्यूट्रालिटी होनी चाहिए। फ्री बेसिक को लेकर बहस में बराबरी होनी चाहिए। फेसबुक, ट्राई, नैसकॉम सब अपनी बात पब्लिक में रखें। मान लीजिए फेसबुक कंपनी किसानों को मौसम समाचार बताने का ऐप देगी लेकिन मौसम की जानकारी तो सरकार के भारी निवेश से हासिल होती है। उपग्रह किसके पैसे से भेजे जाते हैं, मौसम और तापमान बताने के ऐप तो हर फोन में मुफ़्त होने ही चाहिए। यह तो वैसे ही मेरे फोन पर है लेकिन फेसबुक कंपनी इसे फोन बेसिक में शामिल कर हमें क्या देना चाहती है, एक बात आप पाठक लोग ध्यान से समझ लीजिए। अस्पताल नहीं बनेंगे, डाक्टर नहीं होंगे तो ऐप बनाकर मरीज़ों की भीड़ कम नहीं हो जाएगी। किसी चीज़ की नौटंकी की भी हद होती है।

फ्री बेसिक तो बड़ा सवाल है ही, उससे भी बड़ा सवाल है फेसबुक का तरीका। क्या यह लोकतंत्र और उसकी बनाई संस्थाओं के बेसिक के अनुकूल है? आप कहेंगे कि क्या फ़र्क पड़ता है। जब तक मिलता है ले लो। तो आपने तय कर लिया है कि अब से किसी बात के लिए किसी पत्रकार को फोन नहीं करेंगे? हमेशा डिबेट ही देखेंगे? आपको मेरी शुभकामनाएं।

(लेखक एनडीटीवी में सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं, ये उनके निजी विचार हैं) 

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