माहवारी पर आज भी नहीं होती खुलकर बात

माहवारी पर आज भी नहीं होती खुलकर बातगाँव कनेक्शन

लखनऊ। मासिक धर्म या माहवारी एक ऐसा विषय है जिस पर लड़कियां न तो खुलकर बात कर पाती हैं और न ही हमारे समाज में आमतौर पर ऐसे विषयों पर बात करने की इज़ाजत है। 

संयुक्त राष्ट्र के एक सर्वे के दौरान कई देशों में जब लड़कियों से बात की गई तो उनमें से एक तिहाई ने बताया कि मासिक धर्म शुरू होने से पहले उन्हें इस बारे में नहीं बताया गया। इसलिए जब अचानक शुरू हुआ तो समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें? 

लड़कियों के स्वास्थ्य के लिए काम करने वाली संस्था ‘वात्सल्य’ के प्रोग्राम मैनेजर अंजनी कुमार सिंह कहते हैं, “भारत सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल 35 करोड़ महिलाओं में से केवल 12 प्रतिशत ही सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल कर रही हैं।”  

एक सर्वे के अनुसार भारत में 70 फीसदी महिलाओं को माहवारी के दौरान साफ कपड़े, या नैपकिन उपलब्ध ही नहीं है, वहीं पश्चिमी भारत की स्थिति सबसे खराब है, यहां 83 फीसदी महिलाओं के पास सुरक्षित साधन नहीं है। जहां सिंगापुर और जापान में 100 फीसदी, इंडोनेशिया में 88 फीसदी और चीन में 64 फीसदी को सुरक्षित साधन उपलब्ध हैं।

कानपुर में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन श्रमिक भारती के वाटर ऐड परियोजना प्रबंधक विनोद दुबे बताते हैं, “150 शहरी गरीब बस्तियों में माहवारी विषय पर काम करने के दौरान जो लड़कियों के बारे में पता चला वो यह कि-इस दौरान खुद को अपराधबोध महसूस करना, जानकारी के आभाव में गलत तरीके अपना लेना, आत्मविश्वास कम होना, उन दिनों स्कूल न जाना, एकाकीपन, मजाक के डर से घुलमिलकर न रहना, शिक्षा पर असर, लोग क्या कहेंगे इस बात का डर, जैसे तमाम बातें सामने आईं।”इस बात को सरकार भी मानती है कि लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता उतनी नहीं है जितनी कि होनी चाहिए।

कृषि उत्पादन आयुक्त प्रवीर कुमार ने भी हाल में कहा, “अभी तक सिर्फ दो फीसदी बालिकाओं तक ही सैनिटरी नैपकिन ही पहुंचाए जा सके हैं।” कानपुर के रीजेंसी अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ, डॉ. आरती सिंह कहती हैं, “आज हम कम्प्यूटर युग में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन सच ये है कि महिलाएं और लड़कियां महावारी जैसे विषय पर खुलकर बात नहीं करतीं, जिस कारण वो गंभीर रोगों की शिकार हो रही हैं, इन रोगों के बारे में तब पता चलता है जब स्थिति खराब हो चुकी होती है।” अंजनी कुमार बताते हैं, “2010 में जब वात्सल्य संस्था ने महावारी विषय पर काम करना शुरू किया तो लड़कियाँ बोलने के लिए तैयार ही नहीं थीं। पैरा गाँव में रहने वाली विनीता ने एक बड़ा सवाल पूछा-पीरियड को लेकर। उसका सवाल करना एक बड़ी उपलब्धि थी। विनीता को प्रशिक्षण देकर उसे गाँव की दूसरी लड़कियों से महावारी पर चर्चा करने के लिए कहा गया, अब उसके पास एक खुद की दुकान है, जहाँ सेनेटरी नैपकिन मिलती हैं। गाँव की लड़कियाँ अब आसानी से इसे खरीद लेती हैं।”

रिपोर्टर - नीतू सिंह

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