माँ का नहीं बल्कि डिब्बाबन्द दूध पीते हैं UP के ज़्यादातर बच्चे

Neetu SinghNeetu Singh   3 Aug 2016 5:30 AM GMT

माँ का नहीं बल्कि डिब्बाबन्द दूध पीते हैं UP के ज़्यादातर बच्चेgaonconnection

लखनऊ। कहावत है कि बिना रोये तो मां बच्चों को दूध भी नहीं पिलाती है। मगर इसमें सच्चाई कम और भ्रांति ज्यादा है। शिशुओं को दिन में अगर सात से आठ बार मां अपना दूध नहीं पिला रही है तो ये अच्छे संकेत नहीं है।

मां का दूध नवजात के लिए अमृत है मगर यूपी के बच्चे इससे वंचित हैं। प्रदेश में 40 फीसदी शिशुओं को जन्म से छह महीने तक अनिवार्य स्तनपान महिलाएं नहीं करवा रही हैं, जबकि 22 फीसदी शिशु पूरी तरह से स्तनपान से वंचित होते जा रहे हैं। शहरी ही नहीं ग्रामीण इलाकों में भी स्तनपान को लेकर जागरुकता बहुत कम है।

डिब्बा बंद ब्रान्डेड दूध ने आज हमारे गाँव के घरों में जगह बना ली है। घरेलू कामों की व्यस्तता की वजह से महिलाएं छह माह का स्तनपान गम्भीरता से नहीं ले रही है।

प्रतिवर्ष एक अगस्त से सात अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह दिवस मनाया जाता है। सन 1992 से शुरू हुई इस मुहिम में अब 170 से अधिक देश इसे मनाते हैं। इस साल स्तनपान सप्ताह का विषय “स्तनपान पोषणीय विकास का उपाय है” रखा गया है।

स्तनपान सप्ताह मनाने का मुख्य उद्देश्य ये है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को जागरूक किया जाये कि माँ का पहला पीला गाढ़ा दूध बच्चे के लिए कितना जरूरी होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जन्म के एक घंटे के भीतर अगर बच्चे को स्तनपान कराया जाये तो हजारों बच्चों को मरने से बचाया जा सकता है।

केवल शहर ही नहीं बल्कि हमारे गाँव की लाखों महिलायें अभी भी छह महीने तक पूर्ण रूप से अपने बच्चों को स्तनपान नहीं करा पाती हैं। किसी के पास समय नहीं, तो जागरूक नहीं है। नतीजा ये हो रहा है कि हमारे देश के लाखों बच्चे आज कुपोषित हो रहे हैं।

यूनिसेफ से मिले आंकड़ों के मुताबिक 2016 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में शिशु म्रत्यु दर 37 फीसदी है। साल 2013-14 के आंकड़ों के अनुसार जन्म के समय 2500 ग्राम से कम वजन के बच्चे पूरे देश में 18.6 प्रतिशत और उत्तर-प्रदेश में ये संख्या 22.5 प्रतिशत है। जन्म के एक घंटे के भीतर बच्चों को स्तनपान करवाने की संख्या (0-23 महीने तक )देश में 44.6 प्रतिशत और उत्तरप्रदेश में 22.6 प्रतिशत है |बच्चे के जन्म से पाँच महीने तक देश में 64.9 प्रतिशत और प्रदेश में 62.2 प्रतिशत है।

निश्चित तौर पर ये आंकड़े चिंताजनक है। इस स्तिथि को बेहतर करने के लिए सभी को जागरूक होना होगा। बच्चों की बेहतर सेहत के लिए छह महीने तक माँ का स्तनपान जरूरी है। इससे बच्चे और माँ दोनों स्वस्थ्य रहेंगे।

मां का पहला दूध कोलेस्ट्रम है औषिधि

“कोलस्ट्रम यानि मां का पहला पीला गाढ़ा दूध पोषणयुक्त व रोगप्रतिरोधक होता है। मां का दूध नवजात के लिए संपूर्ण पोषण और आहार है। जन्म के पहले घंटे के अंदर बच्चे को स्तनपान कराना बहुत जरूरी है। शिशु के जन्म से छह महीने तक कोई भी भोज्य पदार्थ और पानी न दें। बच्चे के साथ-साथ माँ के लिए भी स्तनपान कराना कई सारी बीमारियों से निजात दिलाना है।

स्तनपान कराने से बच रहीं ग्रामीण महिलाएं 

जहां आम तौर पर महिलाएं घंटों अपने बच्चे को सीने से लगाए रहती हैं वहीं पर एक मजदूरी करने वाली महिला कस्तूरी है जो स्तनपान के दौरान अपने बच्चे को जल्दी से छोड़ना चाहती है। ऐसा नहीं है कि कस्तूरी अपने बच्चे को प्यार नहीं करती और वो उसे स्तनपान नहीं कराना चाहती। उसे डर है कि शाम को चूल्हा कैसे जलेगा, अगर वह वक्त पर काम पर न पहुंची तो ठेकेदार काम नहीं देगा। ये स्थिति सिर्फ कस्तूरी की नहीं है बल्कि हमारे प्रदेश की उन हजारों महिलाओं की कहानी है जो हर सुबह काम पर निकल जाती हैं और अपने बच्चे को स्तनपान नहीं करा पाती हैं। 

कानपुर देहात के बैरीसवाई गाँव में कार्यरत आशा वर्कर नयनतारा बताती हैं कि गाँवों की महिलाएं बच्चों को दूध पिलाने में वैसे तो अधिक जागरूक हैं लेकिन उनको समय नहीं पता होता है। कम से कम आठ बार दूध पिलाना बहुत जरूरी है। यही जागरूकता हम फैला रहे हैं।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

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