आखिर क्या वजह छोटा कर्ज लेकर किसान करता है आत्महत्या और उद्योगपति माल्या और मोदी मौज

Sanjay SrivastavaSanjay Srivastava   2 July 2018 6:34 AM GMT

आखिर क्या वजह छोटा कर्ज लेकर किसान करता है आत्महत्या और उद्योगपति माल्या और मोदी मौजमहाराष्ट्र में इसी साल जनवरी और फरवरी माह में 117 किसानों ने आत्महत्या कर ली है। इनमें से 46 किसानों के परिवारों को मुआवजा दिया गया। फाइल फोटो

भोपाल। एक तरफ देश का किसान कर्ज से बेहाल है, तो दूसरी ओर उद्योगपतियों की कर्ज से ही पौ बारह हो रही है। विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे उद्योगपति बैंक से हजारों करोड़ों का कर्ज लेकर फरार हो जाते हैं, वहीं छोटा कर्ज लेकर किसान आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जाते हैं।

देश के किसानों का नॉन परफॉर्मेस एसेट्स (सकल गैर-निष्पादित आस्तियां) 66,176 करोड़ है, तो उद्योगों का एनपीए 5,67,148 करोड़ है।

देश के संपूर्ण एनपीए (जीएनपीए) पर नजर दौड़ाएं, तो एक बात साफ होती है कि यह राशि 7,76,067 करोड़ रुपए है। इसमें से 6,89,806 करोड़ रुपए सार्वजनिक बैंकों के हैं, तो 86,281 करोड़ रुपए निजी बैंकों के हैं। इस तरह निजी बैंकों के मुकाबले सार्वजनिक बैंकों का एनपीए आठ गुना से कहीं ज्यादा है।

ये भी पढ़ें- प्रधानमंत्री मोदी का विपक्ष कोई पार्टी नहीं, अब किसान हैं

मध्यप्रदेश के नीमच निवासी सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी हासिल की है, वह इस बात का खुलासा करती है कि किसानों और खेती से जुड़े लोगों का एनपीए कुल जमा 66,176 करोड़ है। इसमें से सार्वजनिक बैंकों का 59,177 करोड़ और निजी बैंकों का 6,999 करोड़ रुपए है।

किसानों और खेती के काम से जुड़े लोगों के एनपीए के मुकाबले उद्योग जगत का जीएनपीए 5,67,148 करोड़ रुपए है। इसमें से सार्वजनिक बैंकों का 5,12,359 करोड़ और निजी बैंकों का 54,789 करोड़ रुपए है।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए ब्यौरे के मुताबिक, सेवा क्षेत्र का एनपीए 1,00128 करोड़ रुपए है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का 83,856 और निजी बैंकों का 16,272 करोड़ रुपए है। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों का एनपीए बहुत कम है।

ये भी पढ़ें- यकीन मानिए ये वीडियो देखकर आपके मन में किसानों के लिए इज्जत बढ़ जाएगी …

बैंक के जानकारों की मानें, तो एनपीए वह राशि है जिसकी बैंकों के लिए आसान नहीं है। एक हिसाब से यह डूबत खाते की रकम की श्रेणी में आती है, इस राशि को बैंक राइट ऑफ घोषित कर अपनी बैलेंस शीट को साफ -सुथरा कर सकता है। बीते पांच साल में बैंकों ने 3,67,765 करोड़ की रकम आपसी समझौते के तहत डूब (राइट ऑफ) की है।

ये भी पढ़ें- प्रधानमंत्री जी किसानों के भी मन की बात सुन लीजिए...

बैंक के जानकार बताते हैं कि बैंकों की खस्ताहालत का एक कारण एनपीए है, तो दूसरा लंबित कर्ज है। बैंक के द्वारा जो रकम राइट ऑॅफ की जाती है, वह आम उपभोक्ता के ही खातों से वसूली जाती है। एनपीए सीधे तौर पर वह रकम है, जो बैंक वसूल करने में असफल नजर आता है।



More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top