मध्य प्रदेश: बरसात के चार महीनों में टापू बन जाता है पन्ना जिले का यह गांव

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के इस गांव में बरसात के चार महीने गांव वालों पर भारी पड़ते हैं, किसी के बीमार पड़ने पर मरीज को खाट में लिटाकर कीचड़ भरे रास्ते से पहाड़ी नालों को पार करते हुए अस्पताल पहुंचाते हैं।

Arun SinghArun Singh   7 Aug 2021 8:45 AM GMT

मध्य प्रदेश: बरसात के चार महीनों में टापू बन जाता है पन्ना जिले का यह गांव

 कंचनपुरा गांव के आदिवासी बीमार युवक को खाट में लिटा कर नाला पार करते हुए। (सभी फोटो: अरेंजमेंट)

पन्ना (मध्य प्रदेश)। मध्य प्रदेश के कई जिले इस समय बाढ़ से प्रभावित हैं, लोगों को बाढ़ से बाहर निकालने के लिए राहत कार्य जारी है, लेकिन मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के कई गाँव बारिश के मौसम में टापू में बदल जाते हैं, लोगों का गांव से निकलना मुश्किल हो जाता है।

बारिश के इस मौसम में मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में ऐसे दर्जनों गांव है जहां पहुंचना यदि नामुमकिन नहीं तो आसान भी नहीं है। इन गाँवों तक पहुंचने के लिए कीचड़ भरे रास्तों से पैदल पहाड़ी नालों को पार करना पड़ता है। गांव में यदि कोई बीमार हो जाता है तो उसे चारपाई में लिटाकर ग्रामीण कई किलोमीटर पैदल कंधे में रखकर सड़क मार्ग तक लाते हैं। गर्भवती महिलाओं को बारिश के इन चार महीनों के दौरान विकट परिस्थितियों से जूझना पड़ता है।

जिला मुख्यालय पन्ना से तकरीबन 105 किलोमीटर दूर पवई ब्लॉक की ग्राम पंचायत फतेहपुर के ग्राम कंचनपुरा से अभी हाल ही में जो तस्वीर सामने आई हैं, जिनसे इस गाँव के लोगों की मुश्किलों को देखा जा सकता है। आदिवासी ग्राम मक्केपाला के मजरा कंचनपुरा के प्रेम सिंह धुर्वे के 36 वर्षीय बेटे बबलू सिंह धुर्वे की बीते 3 अगस्त को अचानक जब तबीयत बिगड़ गई। तो ऐसी स्थिति में इस बीमार युवक को गांव में उपचार की कोई सुविधा ना होने के चलते उसे चारपाई में लिटा कर कीचड़ भरे रास्ते से 3 किलोमीटर दूर सड़क तक ले जाना पड़ा।

कीचड़ भरे रास्ते से 3 किलोमीटर दूर सड़क मार्ग तक ले जाते ग्रामीण

ग्राम पंचायत फतेहपुर के पूर्व सरपंच प्रेम सिंह परस्ते ने गांव कनेक्शन को बताया, "बारिश के दिनों में यहां के हालात बदतर हो जाते हैं। सड़क न होने से बारिश के सीजन में यहां बीमार को चारपाई पर लिटा कर पैदल ले जाने के अलावा और कोई चारा नहीं है। बबलू सिंह धुर्वे को भी इसी तरह कीचड़ भरे रास्ते व नाले को पार कर झालाडुमरी तक ले जाया गया। यहां से बस से पड़ोसी जिला कटनी पहुंचकर युवक का इलाज कराया गया।"

इस क्षेत्र के समाजसेवी अशोक जैन ने गांव कनेक्शन से बताते हैं, "पवई क्षेत्र के आदिवासी बहुल ग्रामों की हालत अत्यधिक दयनीय है। ग्राम मक्के पाला में शत प्रतिशत आदिवासी रहते हैं। इस गांव के मजरा कंचनपुरा के आदिवासी बुनियादी सुविधाओं को भी मोहताज हैं। आलम यह है कि लगभग डेढ़ सौ की आबादी वाली इस बस्ती के लोग नाले का ही पानी पीते हैं।"

मामले के संबंध में पूछे जाने पर तहसीलदार रैपुरा राम प्रताप सिंह कहते हैं कि खाट पर मरीज को ले जाने की सूचना मिली है। आपने बताया कि गांव में सड़क बनाने के लिए ग्राम पंचायत में प्रस्ताव डाला जायेगा। यहां सड़क पर कुछ वन विभाग की आपत्ति हैं, कुछ क्षेत्र वन क्षेत्र में है। ऐसे में निराकरण कर नाले पर पुलिया व सड़क बनाने के लिए प्रयास करेंगे।"

अजयगढ़ क्षेत्र के कुड़रा गांव की गर्भवती महिला इस दुर्गम मार्ग पर चलकर 7 किलोमीटर दूर धर्मपुर गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में टीका लगवाने जा रही है।

टापू में बदल जाता अजयगढ़ क्षेत्र का कुड़रा गाँव

पन्ना जिले के ही अजयगढ़ जनपद के ग्राम कुड़रा की तस्वीर भी कंचनपुरा से अलग नहीं है। यह गांव बारिश के चार महीने पूरी तरह से टापू में बदल जाता है, जहां पहुंच पाना आसान नहीं है। बुनियादी और आवागमन सुविधाओं से वंचित ग्रामों की फेहरिस्त में अजयगढ़ जनपद क्षेत्र का कुड़रा गाँव भी शामिल है। अजयगढ़ जनपद क्षेत्र में आने वाली धरमपुर ग्राम पंचायत के राजस्व ग्राम कुड़रा के निवासी आज भी आवागमन की सुविधा के लिये तरस रहे हैं। वर्षों से ग्रामवासी कुड़रा से धरमपुर तक सड़क बनाने की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन उनकी यह मांग आज तक पूरी नहीं हो सकी है।

जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 52 किमी. दूर अजयगढ़ जनपद की सबसे बड़ी पंचायत धरमपुर के अन्तर्गत आने वाले कुड़रा गांव की आबादी तकरीबन 600 है। धरमपुर तक तो पक्की सड़क है, जहां तक बसें आती हैं, लेकिन धरमपुर से कुड़रा गांव तक 7 किमी. की दूरी तय करना आसान नहीं है। बारिश के मौसम में इस 7 किमी. रास्ते पर निकलना आसान नहीं। पूरा रास्ता कीचड़ और फिसलन से भरा तो है ही, रास्ते में 7 पहाड़ी नाले भी हैं जो बारिश में खतरनाक हो जाते हैं।

धरमपुर क्षेत्र के संजय सिंह राजपूत बताते हैं, "पहाड़ी नाले बरसात के मौसम में आपस में मिलकर इस गांव को टापू में तब्दील कर देते हैं, जिससे यहां के लोगों का आना जाना लगभग बंद हो जाता है। गांव के लोग गांव में ही कैद होकर रह जाते हैं।"

गर्भवती महिला ने नाले को इस तरह से पार किया

संजय सिंह ने बताया कि 5 अगस्त को कुड़रा गांव की एक गर्भवती महिला टीका लगवाने के लिए 7 किलोमीटर के दलदल और नालों को पैदल पार करते हुए धरमपुर पहुंची, क्योंकि इस रास्ते पर इस समय मोटरसाइकिल से सफर करना भी खतरे से खाली नहीं है। एंबुलेंस का तो यहां साधारण मौसम में भी पहुंचना संभव नहीं है।

ग्रामीणों के मुताबिक कई पीढ़ियों से हर साल बारिश के 4 महीने हम लोग गांव में ही कैद होकर रह जाते हैं। बुनियादी सुविधाओं के अभाव व सड़क मार्ग न होने के कारण इस गाँव के युवक कुंवारे ही रह जाते हैं। इस गांव में दूसरे गांव के लोग अपने बेटी या बेटे का विवाह नहीं करना चाहते, जिससे यहां का सामाजिक ताना बाना भी प्रभावित हो रहा है। लोग इस गाँव के पहाड़ी पथरीले मार्गों को देख कर ही डर जाते हैं और रिश्ता होने से पहले ही टूट जाता है।

आठवीं के बाद नहीं पढ़ पाते बच्चे

कुड़रा गांव में सिर्फ आठवीं कक्षा तक के लिए स्कूल है, इसलिए गांव के लड़के व लड़कियां आठवीं तक पढ़ाई कर लेते हैं, लेकिन आगे की पढ़ाई नहीं

कर पाते। गाँव वाले अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं लेकिन मजबूरी ऐसी है कि चाहकर भी वे पढ़ा नहीं पाते। पक्की सड़क न होने से बारिश के मौसम में पैदल जाना मुश्किल हो जाता है। कुड़रा से धरमपुर तक 7 किमी. लम्बे मार्ग पर सात नाले पड़ते हैं जिन्हें बारिश में पार करना कठिन हो जाता है। ठंड के मौसम में भी बच्चे जंगली रास्ते से होकर नहीं जा पाते, जिससे आगे की पढ़ाई थम जाती है।

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