मंदसौर से ग्राउंड रिपोर्ट : किसानों का आरोप मोदी सरकार आने के बाद घट गए फसलों के दाम

मोदी नहीं आए थे, उससे पहले सोयाबीन 5000-6000 रुपए प्रति कुंतल बिक रही थी, इस साल 2200 रुपए में बेचना पड़ा। वहीं, लहसुन साल 2015 में 15000 रुपए प्रति कुंतल बिका था, 2018 में 200 रुपए तक में बेचने की नौबत आ गई।

Arvind ShuklaArvind Shukla   11 Jun 2018 6:08 AM GMT

मंदसौर से ग्राउंड रिपोर्ट : किसानों का आरोप मोदी सरकार आने के बाद घट गए फसलों के दाम

मंदसौर (मध्य प्रदेश)। एक तरफ मोदी सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने की कवायद में जुटी है, दूसरी ओर मध्य प्रदेश के किसानों का आरोप है कि सरकार ने किसानों के बुरे दिन ला दिए। उनकी उपज के दाम आधे हो गए हैं।

"मोदी नहीं आए थे, उससे पहले सोयाबीन 5000-6000 रुपए प्रति कुंतल बिक रही थी, इस साल 2200 रुपए में बेचना पड़ा। वहीं, लहसुन साल 2015 में 15000 रुपए प्रति कुंतल बिका था, 2018 में 200 रुपए तक में बेचने की नौबत आ गई। प्याज, चना, सरसों, मेथी, मसूर, ईसबगोल सबके दाम आधे रह गए हैं," इंदर सिंह चौहान, गर्रावद जिला मंदसौर ने बताया।

मंदसौर वही जिला है, जहां पिछले वर्ष जून में किसान आंदोलन के दौरान छह किसानों की मौत हुई थी। मरने वालों में दो किसान इंदर सिंह के पड़ोसी गाँवों के थे, चिल्लौद पिपलिया गाँव में कन्हैयालाल पाटीदार की मूर्ति लगगई है, किसानों ने उन्हें शहीद का दर्जा दिया है। इसी तरह टकरावद गाँव में सरदार पटेल की पुरानी मूर्ति के साथ बबलू पाटीदार की मूर्ति लगाई गई है। यहां के किसान फिर गुस्से में हैं, पिछले साल आंदोलन के दौरान शिवराज सरकार ने जो वादे किए थे, वो किसानों को पूरे होते नहीं दिख रहे। भावांतर जैसी योजना को किसान बंद करने की मांग कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश के मंदसौर की पिपलियामंडी में राहुल गांधी की रैली के दौरान बड़ी संख्या में पहुंचे किसान।

यही वजह रही, दलहन के रेट तेजी से नीचे गिए

ऑल इंडिया दाल मिल एसोसिएशन के चेयरमैन सुरेश अग्रवाल कहते हैं, "साल 2015 के बाद किसानों के ही नहीं कारोबारियों के भी अच्छे दिन नहीं आए। 2015 में जब अरहर की दाल 200 के पार पहुंची तो सरकार के होश उड़ गए। अफ्रीकी देशों में दाल खरीद का समझौता हुआ। यहीं से दिक्कतें शुरू हुईं।"

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अपने तर्क के समर्थन में वो दहलन का उदाहरण देते हुए बताते हैं, "वर्ष 2015 में पूरे देश में 173 लाख मीट्रिक टन दहलन का उत्पादन हुआ। इसी साल रेट तेज हुए। किसान ने अगले साल खूब बुआई की। वर्ष 2016 में 221 लाख मीट्रिक टन यानि 48 लाख मीट्रिक टन ज्यादा पैदावार हुई। इतना ही नहीं, इसी साल 57 लाख मीट्रिक टन दालों का सरकार को बाहर से आयात करना पड़ा। यही वजह थी कि दलहन के रेट तेजी से नीचे गिए, किसान की लागत नहीं निकल पाई।

कांग्रेस को किसान आंदोलन का हथियार मिल गया

किसान सड़क पर भले ही साल 2017 और 2018 में उतरे हों, लेकिन इसकी पठकथा, 2015 में लिखी जाने लगी थी। ये वही साल था जब अरहर की दाल 200 रुपए किलो बिकी थी। अच्छे रेट की उम्मीद में मध्य प्रदेश के किसानों ने खूब अरहर बोई, लेकिन विदेश से दाल के आयात ने किसानों का खेल बिगाड़ दिया। और पिछले कई वर्षों से जिस शिवराज सरकार के खिलाफ कांग्रेस को कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था, उसे किसान आंदोलन का हथियार मिल गया।

किसान से उसकी समस्या पूछेंगे तो…


मध्य प्रदेश में इंदौर से लेकर हरदा, नीमच, मंदसौर और रतलाम तक जिस भी किसान से उसकी समस्या पूछेंगे, जवाब होगा फसलों का रेट नहीं मिल रहे। सोयाबीन, गेहूं, चना, लहसुन, प्याज, ईसबगोल, दलहनी फसलें मध्य प्रदेश की मुख्य फसलें हैं, और इन्हें उगाने वाला किसान परेशान है।

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कन्हैया लाल पाटीदार पिछले वर्ष पुलिस की गोली से मारे गए थे, उनके घर में भी 10 बोरी लहसुन रखा था। बेटा खोने के दर्द से टूट चुकी कन्हैया लाल पाटीदार की मां ने बताया, "100 किल्ला (किलो) लहसुन उगाने में 1000 रुपए खर्च होते हैं, बिक्री 200 में हो रही थी, (सरकार भावांतर के तहत 700-800 दे रही है) में बेचकर क्या मिलेगा, यहीं रखा सड़ जाएगा, जब तक भाव नहीं मिलेगा, आंदोलन होते रहेंगे।"

काली, पथरीली मिट्टी वाली मंदसौर की मिट्टी सोना उगल सकती है, लेकिन पाताल से पानी निकालकर किसान सिंचाई भी करें तो जो पैदा होता है, उसका रेट नहीं मिलता है। खरीदार को तरसते किसान गाँव बंद करते हैं, सड़कों पर उतरने की चेतावनी देते हैं, 44 डिग्री तापमान में राहुल गांधी की रैली में चले आते हैं।

लहसुन रखा है, मगर बेचना नहीं चाहते

मनोहर सिंह के पास 50 कुंतल लहसुन रखा है, जो वो मौजूदा रेट में बेचना नहीं चाहते। चिल्लौद पिपलिया के नंदलाल पाटीदार पिछले साल गाँव बंद के आंदोलन में शामिल थे, इस बार भी अपनी गाँव बंद के साथ हैं।

नंदलाल बताते हैं, "हम किसी पार्टी के समर्थक नहीं हैं, लेकिन ये जरूर कहेंगे कि जब कांग्रेस की केंद्र में सरकार थी, किसानों की उपज के अच्छे रेट मिल रहे थे, अब सब आधे हो गए, हमने सुना है सरकार चीजों का निर्यातनहीं कर रही, इसलिए किसानों का नुकसान हो रहा। विदेशों से शक्कर और दाल मंगवाकर सरकार खेती को चौपट कर रही।" नंदलाल ने इस बार 15 हजार रुपए लगातर टमाटर की खेती की थी, 50 पैसे का रेट हुआ तो गाय-भैंस को खिला दिए।

मंदसौर के लगभग हर किसान के घर भाव न मिलने से रखी है लहसुन की उपज।

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नंदलाल के पड़ोस में बैठे 62 साल के दन्नालाल पाटीदार बड़े किसान हैं और 10 हेक्टेयर में खेतीं करते हैं। दन्नालाल बताते है, "यहां पानी का बिल्कुल इंतजाम नहीं, पूरी खेती मानसून पर है। मानूसन अच्छा हो तो दो फसलें होगी वर्ना घर में साल भर खाने को नहीं होगा। ऐसे में किसान जो उगाए उसकी उपज की खरीद की पूरी गारंटी चाहिए, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू क्यों नहीं करती सरकार।" वो आगे कहते हैं, "लहसुन का रेट पांच हजार और सोयाबीन के कम से कम चार हजार प्रति कुंतल भाव होना चाहिए वर्ना किसान उबर नहीं पाएगा।"

दो सालों में खेती की लागत तेजी से बढ़ी

यहीं के किसान रमेशचंद कहते हैं, "पिछले दो वर्ष में किसान खेती की लागत तेजी से बढ़ी है। मजदूरी दोगुनी हो गई है। डीजल, खाद, बीज सब महंगा हुआ, लेकिन उपज के दाम कम हुए। हमें एमएसपी नहीं, फायदे में सामान बिके ऐसा रेट चाहिए और ये भावांतर योजना तुरंत बंद कर देनी चाहिए।"

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पिछले वर्ष किसान आंदोलन के बाद शिवराज सरकार ने भावांतर योजना शुरू की, जिसके अनुसार अगर मंडी में एमएसपी से चीजें कम बिकी तो उसकी भरपाई सरकार अपने खजाने से करेगी, लेकिन किसानों का आरोप हैकि उसका फायदा कारोबारियों ने उठाया और ये योजना पूरी तरह फेल है। राहुल की रैली में कांग्रेसी नेताओं ने इसे भ्रष्टाचार योजना बताया।

पिपलियामंडी में राहुल गांधी की रैली के दौरान सभा स्थल पर लगा पोस्टर।

सोयाबीन किसानों को भाव नहीं मिले

मंदसौर के पोस्ट बूढ़ा गर्रावद के किसान मनोज सिंह चौहान बताते हैं, "केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद सोयाबीन किसानों को भाव नहीं मिले, पहले चार से पांच हजार तक रेट था, अब सरकारी रेट 2500-2800 में चले गए, और जब 2300 से 2400 में बिका तो हंगामा हुआ, भावांतर लागू हुए तो 2850 से 3500 तक भाव दिया, लेकिन उसका फायदा किसानों को नहीं मिला।"

प्याज और लहसुन आपके खाने का सिर्फ स्वाद बढ़ाते हैं, लेकिन अगर इनके भाव ऊंचे नीचे हो जाएं तो सरकार के लिए संकट हो जाता है। दिल्ली में सुषमा स्वराज की प्याज ने कुर्सी छीन ली थी, अब ये प्याज और लहसुन शिवराज के लिए संकट का सबब बना हुआ है।

लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा, लागत दर घट नहीं रही

स्वामीनाथन आयोग का ड्राफ्ट तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले किसान और अखिल भारतीय किसान सभा के नेता अतुल अंजान बताते हैं, "मोदी जी ने 2014 के इलेक्शन की 430 मीटिंग (चुनावी रैलियों )में कहा पीएम बनेंगे तो लागत घटाएंगे, दो करोड़ लोगों को रोजगार देंगे, स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करेंगे, लाभकारी मूल्य देंगे, लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा, लागत दर घट नहीं रही, फसलों का उचित मूल्य मिल नहीं रहा।"

अतुल अंजान ने आगे कहा, "लागत दर घटेगी कैसे, देश में सिर्फ 38 फीसदी सिंचित जमीन है, बाकी सब मानसून और भूतल के पानी पर निर्भर है। भूतल के पानी के लिए डीजल और बिजली चाहिए, जो आपने महंगी कर रखी है।डीजल और पेट्रोल के महंगा होने से सबसे ज्यादा असर गाँव पर पड़ता है। नार्थ ईस्ट की पूरी अर्थव्यवस्था डीजल के दाम बढ़ने से बिगड़ जाती है, महंगाई ने कमर तोड़ दी है।"

देश की निर्यात और विदेश नीति में बड़ा घोटाला

अतुल अंजान कहते हैं, "देश की निर्यात और विदेश नीति में बड़ा घोटाला है। बड़े-बड़े अधिकारी और नेता बाहर की चीजों को मंगाने और भेजने में भारी कमीशन खाते हैं, मोदी सरकार में ये कमीशन तेजी से बढ़ा है।" देश मेंबेरोजगारी बढ़ी है, इसका सबसे ज्यादा असर किसान पर पड़ा है। किसी देश की स्थिति तब अच्छी होती है जब निर्यात बढ़ता है, लेकिन हमारे देश में निर्यात घट गया है।

सरकार किसान को डराना चाहती है

दूसरी ओर, एक जून से शुरू हुए किसान आंदोलन 'गांव बंद' के बारे में मध्य प्रदेश में सक्रिय किसान संगठन आम किसान यूनियन के कोर सदस्य केदार सिरोही बताते हैं, "सरकार किसानों को डराना चाहती है, लेकिन वो ये नहीं समझ रही कि जितना डराओगे, डर उतना खत्म हो जाएगा। इन 10 दिनों में किसानों ने गांव बंद कर सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ हल्ला बोला दिया है।" सिरोही ने आगे कहा, "लोकतांत्रिक देश में किसान को इतना तो अधिकार है कि वो अपना सामान कहां बेचे, सरकार ने पुलिस, कृषि और राजस्व विभाग, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों तक को आंदोलन के खिलाफ लगा दिया है, लेकिन किसानों की आवाज अब थमेगी नहीं।"

मंदसौर में किसान आंदोलनों को लेकर किसान नेताओं से चर्चा करते डिप्टी न्यूज रिपोर्टर अरविंद शुक्ला।

ये मुश्किलें देश के हर किसान के सामने

किसान संघर्ष समन्यव समिति के संयोजक और किसान नेता वीएम सिंह कहते हैं, "ये दिक्कत सिर्फ मध्य प्रदेश के किसानों की नहीं, पूरे देश की है। इसीलिए मंदसौर कांड के बाद हमने पूरे देश में घूमकर पार्टियों से समर्थनलेकर दो बिल पास कराएं हैं। उसमें एमएसपी को लेकर कानून बनाने की बात है।"

उन्होंने आगे कहा, "किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य (सी-2) मिलना चाहिए। लागत मूल्य वो चाहिए, जिसमें किसान की जमीन का किराया, परिवार की मजदूरी और उपकरणों का किराया चाहिए। समर्थन मूल्यपर ऐसा कानून चाहिए, जिसमें हर चीज का समर्थन मूल्य होगा और उसके नीचे किसी ने बेचा तो उसे जेल होगी। जैसे मक्के का रेट 1400 रुपए है, जो मंडी में इसके ऊपर बोली लगेगी।"

गाँवों में हर घर में 20 से 30 बोरी लहसुन

अगर आप मंदसौर के गाँवों में जाएंगे तो हर घर में 20-30 बोरी लहसुन मिलेगा। इस बार लहसुन 200 से 700 रुपए कुंतल बिका है, जबकि पिछले साल इसका भाव 1200 से 1500 के ऊपर था। यही हाल पिछले वर्ष प्याज का था, साल 2016 में प्याज से किसानों को मुनाफा मिला था, जबकि 2017 में 50 पैसे किलो तक पहुंच गया था। यही हाल यहां की मुख्य फसलों में एक सोयाबीन का था, जो पिछले वर्ष 4000 रुपए तक बिकी थी, इस बार 2200 प्रति कुंतल तक पहुंच गई।

अब निर्यात-आयात में भारी अंतर

वर्ष 2013-14 में देश के किसानों ने 43.23 बिलियन डॉलर का निर्यात किया, जो वर्ष 2016 17 में 33.87 बिलियन डॉलर रह गया। दूसरी तरफ वर्ष 2013-14 में यदि देश में 15.03 बिलियन डॉलर की कृषि जिंसों का आयात किया तो वर्ष 2016-17 में इस आयात की कीमत देश को 25.09 बिलियन डॉलर चुकानी पड़ी। अखिल भारतीय किसान सभा के नेता अतुल अंजान कहते हैं, "देश की निर्यातऔर विदेश नीति में बड़ा घोटाला है। बड़े-बड़े अधिकारी और नेता बाहर की चीजों को मंगाने और भेजने में भारी कमीशन खाते हैं, मोदी सरकार में ये कमीशन तेजी से बढ़ा है।"

किसान आंदोलन के पांच बड़े कारण

  1. किसानों का आरोप, फसलों का नहीं मिल रहा लाभकारी मूल्य, पहले से कम हुईं कीमतें
  2. पेट्रोल-डीजल, उर्वरक, मजदूरी सब महंगा हुआ
  3. कारोबारियों पर अंकुश नहीं।
  4. कर्जमाफी की मांग नहीं हुई पूरी।
  5. निर्यात और आयात में भारी अंतर बनी वजह

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