मन्ना डे... तेरे बाद भी इस दुनिया में ज़िंदा तेरा नाम रहेगा

मन्ना डे... तेरे बाद भी इस दुनिया में ज़िंदा तेरा नाम रहेगा1 मई 1919 को कलकत्ता में मन्ना डे यानि प्रबोध चन्द्र डे का जन्म हुआ था।

लखनऊ। संगीत का सागर कहे जाने वाले मन्ना डे जिन्हें सब प्यार से मन्ना दा कहते हैं, का आज जन्मदिन है। 1 मई 1919 को कलकत्ता में मन्ना डे यानि प्रबोध चन्द्र डे का जन्म हुआ था। ऐसा कहते हैं कि संगीत के क्षेत्र में मन्ना डे की जो जगह है वह भरना नामुमकिन है।

4000 से ज्यादा गाना गाने वाले मन्ना डे सिर्फ हिंदी ही नहीं बल्कि 12 भाषाओं में गाने गाते थे। उन्होंने 1500 से ज्यादा हिंदी गानों के साथ 1200 से ज्यादा बंगाली गाने गाए। उनके द्वारा गाए गानों में 85 गुजराती, 70 मराठी, 35 भोजपुरी, 18 पंजाबी, 8 उड़िया, 6 असमी गाने, 2-2 कन्नड़ और मलयालम, 1-1 कन्नड़, मलयालम और मगही भाषा के गाने शामिल हैं।

मन्ना डे को संगीत की शुरुआती शिक्षा उनके चाचा केसी डे ने दी थी। उनके बचपन के दिनों का एक दिलचस्प वाकया है। उस्ताद बादल खान और मन्ना डे के चाचा एक बार साथ-साथ रियाज कर रहे थे। तभी बादल खान ने मन्ना डे की आवाज सुनी और उनके चाचा से पूछा - यह कौन गा रहा है? जब मन्ना डे को बुलाया गया तो वह उस्ताद बादल ख़ान से बोले - बस ऐसे ही गा लेता हूं लेकिन बादल खान ने मन्ना डे की छिपी प्रतिभा को पहचान लिया। इसके बाद वह अपने चाचा से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मन्ना डे 40 के दशक में अपने चाचा के साथ संगीत के क्षेत्र में अपने सपनों को साकार करने के लिये मुंबई आ गये। और फिर यहीं के होकर रह गये।

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कहते हैं कि कॉलेज के दिनों मन्ना डे को कुश्ती और मुक्केबाजी जैसे खेलों में काफी रुचि थी और वह इनसे जुड़ी प्रतियोगिताओं में भाग भी लेते थे। कुश्ती के साथ मन्ना फुटबॉल के भी काफी शौकीन थे लेकिन उनके पिता पूरन चन्द्र डे उन्हें वकील बनाना चाहते थे। संगीत के क्षेत्र में आने से पहले इस बात को लेकर लम्बे समय तक दुविधा में रहे कि वे वकील बनें या गायक। आखिरकार अपने चाचा कृष्ण चन्द्र डे से प्रभावित होकर उन्होंने तय किया कि वे गायक ही बनेंगे।

उनके गायन का सफर 1942 में फिल्म ‘तमन्ना’ से शुरू हुआ और 2013 तक चलता रहा। गायन के क्षेत्र में उनके अविस्मरणीय योगदान के लिए भारत सरकार की ओर से उन्हें 1971 में पद्मश्री और 2005 में पद्म विभूषण से नवाजा गया। 2007 में उन्हें भारतीय सिनेमा के प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

फिल्म तमन्ना मे बतौर प्लेबैक सिंगर उन्हें सुरैया के साथ गाने का मौका मिला। हालांकि इससे पहले वह फिल्म रामराज्य में कोरस के रूप में गा चुके थे। दिलचस्प बात है कि यही एक एकमात्र फिल्म थी, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कृति मधुशाला को स्वर देने के लिये भी मन्ना डे का चयन किया।

संगीत के दिग्गज कहे जाने वाले गायक भी उनके गाए गानों के दीवाने थे।

आप लोग मेरे गीत को सुनते हैं लेकिन अगर मुझसे पूछा जाये तो मैं कहूँगा कि मैं मन्ना डे के गीतों को ही सुनता हूँ।
मोहम्मद रफी, गायक

हम सभी उन्हें आज भी मन्ना दा के नाम से ही पुकारते हैं। शास्त्रीय गायकी में उनका कोई सानी नहीं।
महेन्द्र कपूर, गायक

मन्ना डे ने लोकगीत से लेकर पॉप तक हर तरह के गीत गाए और देश विदेश में संगीत के चाहने वालों को अपना मुरीद बनाया। फिल्म 'काबुलीवाला' का 'ए मेरे प्यारे वतन' और 'आनंद' का 'ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय' आज भी संगीतप्रेमियों के दिलों पर राज करता है। इसके अलावा 'आजा सनम मधुर चांदनी में हम, 'तू प्यार का सागर है', 'लागा चुनरी में दाग़', 'आयो कहां से घनश्याम' 'सुर न सजे' जैसे गीत भी काफी पंसद किए गए। तुझे सूरज कहूं या चंदा, कसमे वादे प्यार वफा सब, प्यार हुआ इकरार हुआ, दिल का हाल सुने दिलवाला, नदिया चले चले रे धारा, ये हवा ये नदी का किनारा, कौन आया मेरे मन के द्वारे, ऐ मेरी जोहर-ए-जबीं, ये रात भीगी-भीगी, ठहर जरा ओ जाने वाले, बाबू समझो इशारे जैसे गानों को आज के नौजवान भी गुनगुनाते नज़र आते हैं।

24 अक्टूबर 2013 को सुबह 4 बजकर 30 मिनट पर शरीर के कई अंगों के काम न करने से अस्पताल में ही उनका देहान्त हो गया। अन्तिम समय में मन्ना डे के पास उनकी पुत्री शुमिता व दामाद ज्ञानरंजन देव मौजूद थे।

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