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जिनकी आवाज़ सुनकर केएल सहगल भी खा गए थे धोखा

जिनकी आवाज़ सुनकर केएल सहगल भी खा गए थे धोखामुकेश

लखनऊ। 50 के दशक में बॉलीवुड में एक महान गायक थे केएल सहगल। उस दौर में जो नौजवान इंडस्ट्री में आता था वो केएल सहगल ही बनना चाहता था लेकिन एक कलाकार ऐसा आया जिसकी आवाज सुनकर खुद केएल सहगल भी धोखा खा गये कि ये गाना उन्होंने गाया था या किसी और ने।

1945 में आई फिल्म पहली नजर और गाने के बोल थे 'दिल जलता है तो जलने दे' जब ये गाना केएल सहगल साहब को सुनाया गया तो वो सोच में पड़ गये और कहने लगे मुझे याद ही नहीं आ रहा है कि ये गाना मैंने कब गाया तब उनको बताया गया कि ये गाना आपने नहीं मुकेश ने गाया है।

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मुकेश की आवाज में दर्द को भी एक सुकून मिलता था। यूं तो मुकेश को शोमैन राजकपूर की आवाज कहा जाता है लेकिन इस छवि से बाहर निकलकर उनहोंने अपने 40 साल के लंबे करियर में बहुत से सुपर स्टार्स के लिये अपनी आवाज दी। राज कपूर ने खुद कई इंटरव्यू में कहा था कि मै तो बस शरीर हूं मेरी आत्मा तो मुकेश है।

बतौर प्लेबैक सिंगर मुकेश इंडस्ट्री में अपना मकाम बना चुके थे। कुछ नया करने की चाह जगी तो प्रोड्यूसर बन गए और साल 1951 में फिल्म 'मल्हार' और 1956 में 'अनुराग' लेकर आए। एक्टिंग का शौक बचपन से था इसलिए 'माशूका' और 'अनुराग' में बतौर हीरो भी आए। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर ये दोनों फिल्में फ्लॉप हो गईं। काफी पैसा डूब गया। कहते हैं कि इस दौर में मुकेश आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे।

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बतौर एक्टर प्रोड्यूसर मुकेश को सफलता नहीं मिली। गलतियों से सबक लेते हुए फिर से सुरों की महफिल में लौट आए। 50 के दशक के आखिरी सालों में मुकेश फिर प्लेबैक के शिखर पर पहुंच गए। 'यहूदी', 'मधुमती', 'अनाड़ी' जैसी फिल्मों ने उनकी गायकी को एक नई पहचान दी। और फिर 'जिस देश में गंगा रहता है' के गाने के लिए उन्हें फिल्मफेयर में नॉमिनेशन मिला।

60 के दशक की शुरुआत मुकेश ने कल्याण जी आनंद जी के डम-डम डीगा-डीगा, नौशाद का मेरा प्यार भी तू है, और एसडी बर्मन के नगमों से शुरू किया और फिर राज कपूर की फिल्म 'संगम' में शंकर जयकिशन का कंपोज किए गाने के लिए उन्हें एक और फिल्मफेयर नॉमिनेशन मिला। 60 के दशक में मुकेश का करियर अपने चरम पर था।

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70 के दशक में मनोज कुमार की फिल्म 'पहचान' के लिये उन्हें दूसरा फिल्मफेयर अवार्ड मिला। साल 1974 में फिल्म 'रजनीगंधा' के गाने के लिए मुकेश को नेशनल फिल्म अवॉर्ड दिया गया। साल 1976 में यश चोपड़ा की फिल्म 'कभी कभी' के इस टाइटल सॉन्ग के लिए मुकेश को अपने करियर का चौथा फिल्मफेयर मिला और इस गाने ने उनके करियर में फिर से एक नई जान फूंक दी। मुकेश ने अपने करियर का आखिरी गाना अपने दोस्त राज कपूर की फिल्म के लिए ही गाया था। लेकिन 1978 में इस फिल्म के रिलीज से दो साल पहले ही 27 अगस्त को मुकेश का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

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