विश्व कठपुतली दिवस: समय के साथ बदली कठपुतली कला, मनोरंजन के साथ देती है संदेश

विश्व कठपुतली दिवस: समय के साथ बदली कठपुतली कला, मनोरंजन के साथ देती है संदेशसमय के साथ बदलती रही कठपुतली

एक समय था जब कठपुतली को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम समझा जाता था लेकिन आज कठपुतली कला मनोरंजन के साथ ही लोगों को जागरुक भी कर रही है। विश्व कठपुतली दिवस 21 मार्च को मनाया जाता है, कठपुतली का इतिहास बहुत ही पुराना है यह रंगमंच पर खेले जाने वाले प्राचीनतम खेलों में से एक है।

लखनऊ के कानपुर रोड स्थित साक्षरता भवन के चचाजान अब लोगों का मनोरंजन के साथ ही गाँव-गाँव जाकर लोगों को शिक्षा, साफ-सफाई के प्रति भी जागरुक करते हैं। ये चचाजान कोई इंसान नहीं बल्कि कठपुतली हैं। चचाजान को बनाने वाले मुख्य कठपुतली संचालक आरके त्रिवेदी बताते हैं, “मैं पिछले 30 वर्षों से भी अधिक समय कठपुतली दिखाने का कार्यक्रम कर रहा हूं। हम गाँव-गाँव जाकर लोगों का मनोरंजन करने के साथ ही उनकों जागरुक भी करते हैं।” त्रिवेदी आगे बताते हैं, “अब पहले की तरह कठपुतली के कार्यक्रम में दर्शक नहीं रह गए हैं। इसके बावजूद हमारी पूरी कोशिश रहती है कि कठपुतली की इस कला को मिटने न दें।”

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राजधानी के ही हुसैनगंज के रहने वाले मेराज़ आलम भी कठपुतलियों को बचाने की मुहिम में लगे हुए हैं। मेराज पिछले बारह वर्षों से कठपुतली को बचाने में लगे हुए हैं। वे बताते हैं, “शुरू में मैंने केवल कठपुतलियां बनाना शुरू किया लेकिन धीरे-धीरे मेरा मन इसमें रम गया। कठपुतली बनाने के साथ ही फिर मैंने कठपुतली का नाटक भी दिखाना शुरू कर दिया और इसमें मेरे घरवालों ने भी मेरा साथ दिया।”

मेराज़ आलम बच्चों को कठपुतली बनाना और उनको नचाना भी सिखाते हैं। इस बारे में मेराज़ कहते हैं, “कठपुतली एक लोक कला है। अगर इस पर ध्यान न दिया गया तो ये भी दूसरी कलाओं की तरह लुप्त हो जाएगी।” मेराज़ आगे कहते हैं, “मैं अब दूसरों को भी प्रशिक्षण देता हूं और मुझे विश्वास है कि भविष्य में कठपुतली की कला बहुत आगे तक जाएगी।”

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महात्मा गांधी के जीवन को दिखा रहीं कठपुतलियां

वाराणसी की गैरसरकारी संस्था आशा ट्रस्ट और सृजन कला मंच कठपुतली के माध्यम गांधी के जीवन को मंचित करते हैं। इस कार्यक्रम का नाम रखा गया है, मोहन से महात्मा। ट्रस्ट के संयोजक बल्लभाचार्य पाण्डेय कठपुतली कला के बारे में बताते हैं, “पिछले कुछ दिनों में गांधी जी के बारे में गलत अफवाहें फैलाई जा रही हैं। इसलिए हमने सोचा कि कठपुतली के माध्यम से गांधी जी के जीवन की सच्चाई गाँव और शहरों तक पहुंचाऐं।” वे आगे कहते हैं कि शुरू में उन्हें लग रहा था कि ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे मुद्दे शायद न पसंद किए जाऐं लेकिन परिणाम इसके उलट हुआ। ग्रामीणों ने इसे बेहद पसंद किया। अब इलाहाबाद और गाजीपुर के गमहर में भी कठपुतली कार्यक्रम किया जाएगा।

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पश्चिम बंगाल में कहते हैं पतुल नाच

दस्तानेवाली कठपुतलियां नचाने वाला दर्शकों के सामने बैठकर ही उन्हें प्रदर्शित करता है। इस क़िस्म की कठपुतली का नृत्य केरल का ‘पावकथकलि’है। उड़ीसा का ‘कुंधेइनाच’ भी ऐसा ही है। पश्चिम बंगाल का ‘पतुल नाच’ डंडे की सहायता से नचाई जाने वाली कठपुतली का नाच है। एक बड़ी-सी कठपुतली नचाने वाले की कमर से बंधे खंभे से बांधी जाती है और वह पर्दे के पीछे रहकर डंडों की सहायता से उसे नचाता है। उड़ीसा के ‘कथिकुंधेई’ नाच में कठपुतलियां छोटी होती हैं और नचाने वाला धागे और डंडे की सहायता से उन्हें नचाता है।

कई जगह जानवरों की खाल से बनाई जाती है कठपुतली

जानवरों की खाल से बनी, ख़ूबसूरती से रंगी गई कठपुतलियां आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, उड़ीसा और केरल में काफ़ी लोकप्रिय हैं। उनमें कई जोड़ होते हैं जिनकी सहायता से उन्हें नचाया जाता है। केरल के ‘तोलपवकूथु’ और आंध्र प्रदेश के ‘थोलु बोमलता’ में ज्यादातर पौराणिक कथाऐं ही दर्शाई जाती हैं। जबकि कर्नाटक के ‘तोगलु गोम्बे अट्टा’ में धार्मिक विषय और चरित्र भी शामिल किए जाते हैं।

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अलग-अलग प्रदेशों में है इसके अनेक रूप

राजस्थान की कठपुतली काफ़ी प्रसिद्ध है। यहां धागे से बांधकर कठपुतली नचाई जाती है। लकड़ी और कपड़े से बनी और मध्यकालीन राजस्थानी पोशाक पहने इन कठपुतलियों द्वारा इतिहास के प्रेम-प्रसंग दर्शाए जाते हैं। अमरसिंह राठौर का चरित्र काफ़ी लोकप्रिय है क्योंकि इसमें युद्ध और नृत्य दिखाने की भरपूर संभावनाऐं हैं।

उत्तर प्रदेश में इस कला का खूब प्रचलन रहा है। पहले कठपुतलियों का इस्तेमाल यहीं शुरू हुआ था। शुरू में इनका इस्तेमाल प्राचीनकाल के राजा महाराजाओं की कथाओं, धार्मिक, पौराणिक व्याख्यानों और राजनीतिक व्यंग्यों को प्रस्तुत करने के लिए किया जाता था। प्रदेश से धीरे-धीरे इस कला का प्रसार दक्षिण भारत के साथ ही देश के अन्य भागों में भी हुआ।

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यहां धागे और डंडों से नचाई जाती हैं कठपुतलियां

उड़ीसा का ‘साखी कुंदेई’, आसाम का ‘पुतला नाच’, महाराष्ट्र का ‘मालासूत्री बहुली’ और कर्नाटक की ‘गोम्बेयेट्टा’ धागे से नचाई जाने वाली कठपुतलियों के रूप हैं। तमिलनाडु की ‘बोम्मलट्टम’ काफ़ी कौशल वाली कला है, जिसमें बड़ी-बड़ी कठपुतलियां धागों और डंडों की सहायता से नचाई जाती हैं।


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