Article 15: बेहतरीन से ज़्यादा, ज़रूरी और उससे ज़्यादा साहसी पेशकश

Article 15: बेहतरीन से ज़्यादा, ज़रूरी और उससे ज़्यादा साहसी पेशकश

- सौम्या बैजल

'जिस दिन फांसी दी गई

उनकी कोठरी में लेनिन की किताब मिली

जिसका एक पन्ना मुड़ा हुआ था

पंजाब की जवानी को

उसके आख़िरी दिन से

इस मुड़े पन्ने से बढ़ना है आगे, चलना है आगे'- पाश

इस फिल्म के बारे में कुछ भी कहने या लिखने से पहले, पाश की यह पंक्तियां मानो जीवित हो उठती हैं। उस मुड़े हुए पन्ने को हमें आगे ले जाना था। इस मुल्क के हम हज़ारों, लाखों लोग, जिनकी आँखों के सामने रोज़, असामनता के इतने प्रमाण हैं, जिन्हें हम अपनी साफ़-सुथरी-कामयाब ज़िन्दगी की चकाचौंध में भूल जाते हैं। जब तक हमारी निजी ज़िन्दगियों पर इस असमानता का कोई असर नहीं होता, वह हमें दिखाई ही नहीं देती और जिन्हें दिखती है, उन्हें हम देश-विरोधी का नाम देकर चुप करा देते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं की यह असमानताएं हैं नहीं और जिस तरह धर्म और जाती के विभाजन पर राजनीति खेली जाती है, नफरत की आग में देश को झुलसाया जा रहा है, लोगों को उनके होने की 'सज़ा' दी जा रही है, 'जय श्री राम' न बोलने पर मार दिया जा रहा है। यह जिन्न अब इन असमानताओं से पीड़ित लोगों की उम्मीद जिसको संविधान छोड़ कर नेताओं के नारेबाजी में रास्ता दिखता है, वह जिन्न और बड़ा, ताकतवर और कब्ज़े में न आने वाली भयंकर ताकत का रूप ले रहा है। इन हालातों को बखूबी दर्शाती है आर्टिकल 15। जहां संविधान, उसके पन्नों की, सोच की कोई इज़्ज़त नहीं है। उस देश में, जहां किसी और के लिए 'जय श्री राम' सुनना, किसी की जान से ज़्यादा अहमियत रखता है।

साभार: इंटरनेट


मुल्क के बाद, अनुभव सिन्हा (Anubhav Sinha) की यह बेहतरीन फिल्म, हमें बार-बार मजबूर करती है, कि हम अपने अंदर झांके, समझें की दुनिया और देश सिर्फ हमारी जीविका नहीं है। जब अखबारों से खबर निकल कर घरों में आ जाती है, तब उसके होने का पूरा प्रमाण मिलता है और आज के दौर में, जब हर तरह से खबरें हम तक आने से रोकी जा रही हैं, उस दौर में, अपने जीवन को ही सर्वप्रिय मान लेना भी स्वाभाविक है। लेकिन जब हम यह पढ़ते हैं, कि इंसान का मल साफ़ करते गटर में कितनों की जानें गयीं, तो हमें फर्क पड़ना होगा और जब हम यह बड़े परदे पर देखते हैं, तो इससे मुंह फेर लेना आसान नहीं होगा।

Article 15, का मुद्दा, जाति के नाम पर लोगों को विभाजित करना, जाति के ही आधार पर शक्ति हासिल करना, और उस शक्ति को बनाये रखने की हवस, इस फिल्म को हमारे दौर की सबसे ज़रूरी फिल्मों की श्रेणी में लाकर खड़ा करती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है इसका लेखन। पटकथा और कहानी दोनों की संवेदनशीलता, राजनीति की ज़बरदस्त समझ, एक पल को भी यह अहसास नहीं दिलाती की यह कहानी उन समस्याओं के बीच रहकर नहीं लिखी या बनाई गई। गौरव सोलंकी (Gaurav Solanki) के लेखन में एक जादू है, और अनुभव सिन्हा के निर्देशन में वह बात साफ़ निखर कर सामने आती है। चाहे वह दलित खुद की लड़ाई करते हुए हों, या एक IPS अफसर जो अपना काम करना चाहता हो, और जाति के नाम पर पीढ़ियों से चले आने वाले इस विभाजन को तोड़ना चाहता हो, या वह डॉक्टर जो अपना काम सही करना चाहती हो, एक एक दृश्य को जिस तरह से लिखा गया है, वह हर पात्र की, और हमारे देश की समस्याओं को बिना झुके, बिना टूटे दिखा देता है।


फिल्म के बारे में लिखने वाले लोग, अक्सर उसकी कहानी और दृश्यों को समझा देते हैं। मैं ऐसा नहीं करूंगी, क्यूंकि वह सही नहीं, और इस फिल्म को पूरी खुली आँखों से देखना अनिवार्य है। इस फिल्म का छायांकन इसके सच को बखूबी उभारता है। एवन मुलिगन का कैमरा उस हर एक शॉट पर, छोटी से छोटी बात पर ठहर कर, हमें सामाजिक समस्याओं से मुंह फेरने का मौका नहीं देता।

बहुत कम ऐसा होता है, कि हम अभिनेताओं को पूरा मौका दें अपनी कला दिखाने का, और अपनी पुरानी छवि मिटा पाने का। मनोज पाहवा, जो आज तक हमें हंसाते आये हैं, इस फिल्म में चौकाते हैं। चाहे वह उनकी नज़र हो, या लहज़ा, चाल हो या दांत पीस कर बोलना, जिस दृश्य में वह हमें दिखते आते हैं, उनसे नज़र हटा पाना असंभव है। कुमुद मिश्रा की संवेदनशीलता, लहज़ा, एक एक भाव हमें उनसे एक अलग रूप में मुत्तासिर कराता है। मुल्क में जितने अलग यह दोनों थे, इनका काम देख कर, आप बार बार यह सोचेंगे, कि हम अपने सिनेमा में, बेहतरीन अभिनेताओं को क्यों मौका नहीं दे पाते। मोहम्मद ज़ीशान आयूब की जितनी तारीफ की जाए, कम है।

साभार: इंटरनेट




ये भी पढ़ें: अनुभव सिन्हा: लोगों ने 'मुल्क' के बाद नोटिस किया कि मैं कितनी अलग फिल्में बना रहा हूं

इस फिल्म में बहुत उम्दा संदर्भ है। चाहे वह पाश हों, भगत सिंह, या फिर राजनितिक पार्टियाँ, या पात्र, देखने वालों को साफ़ नज़र आ जाएंगे वह। हम किस तरह अपना मतदान करते हैं, उसके बारे में कितना सोचते हैं, एक दृश्य में बखूबी सामने आता है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के अपने तनाव के साथ साथ चलता है। फिल्म ख़त्म होने के बाद भी, वह आपके ज़हन में गूंजता है।

मेरे लिए इस फिल्म की एक और बड़ी खासियत है कि कोई भी दल या समुदाय, बेचारा नहीं नज़र आता। विवशताएं जो सत्ता धारियों ने, और आजीवन ताकत अपने पास रखने वालों ने, बाक़ी सभी जातियों के लिए बनाई हैं, वह नज़र आतीं है। लेकिन सभी अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। कुछ ताकत को तोड़ने के लिए, कुछ रोकने के लिए, और कुछ अपने अधिकारों के लिए।

आयुष्मान खुराना( Ayushmann Khurrana ) ने अपनी फिल्में बहुत समझदारी से चुनी हैं और इस फिल्म में, उन्होंने उम्दा काम लिया है। अपने आज तक के निभाए हुए किरदारों से अलग, उन्होंने एक 'आउटसाइडर' के रूप में, हमें जातिवाद के अनौचित्य से जोड़े रखा है। यही बात हमें तापसी पन्नू के किरदार ने, मुल्क में दिखाई थी। यह श्रोताओंको अपने साथ बनाये रखने का बढ़िया तरीका है नहीं तो- 'ऐसा सभी जगह नहीं होता, या सभी घरो मेंनहीं होता' जैसे ख़याल कुछ न मैंने वाले लोगों के ज़हन में आ सकते हैं।


साभार: इंटरनेट


अनुभव सिन्हा की Article15, बेहतरीन से ज़्यादा ज़रूरी, और उससे ज़्यादा साहसी, पेशकश है और फिर एक बार हमें यह दिलासा दिलाती है, कि देश का भविष्य बदलने की लड़ाई में न तो हम अकेले हैं, और न ही हिम्मत हार सकते हैं। यह लड़ाई हमें जारी रखनी होगी, उन लोगों को जिन्हे यह असमानताएं रोज़ खाने को दौड़ती हैं। बिलकुल उसी मुड़े हुए पन्ने की तरह। ये फिल्म ज़रूर देखें औ रइसीलिए भी, क्योंकि हम अभी भी एक लोकतंत्र हैं। किसी और को यह हक़ नहीं है बताने का, कि हम क्या देखेंगे, क्या नहीं और कलाकार किस तरह कि कलाकारी कर सकते हैं, किस तरह की नहीं।

(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)


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