‘बाहुबली- द कंक्लूजन’ के दमदार डायलॉग्स के पीछे हैं इनकी कलम का कमाल

‘बाहुबली- द कंक्लूजन’ के दमदार डायलॉग्स के पीछे हैं इनकी कलम का कमालअमेठी से ताल्लुक रखने वाले लेखक मनोज मुतंशिर बॉलीवुड में कई हिट सॉन्ग्स लिख चुके हैं। 

लखनऊ। राजनीति में अहम मायने रखने वाला उत्तर प्रदेश का जिला अमेठी अब बॉलीवुड के लिए भी पॉपुलर हो रहा है। बॉलीवुड की ‘गलियां’ उन्हें इतनी पसंद आईं कि उन्होंने यहीं रम जाने का फैसला किया। उसके लिए काफी स्ट्रगल भी करना पड़ा लेकिन रियलिटी शो कौन बनेगा करोड़पति ने इनकी किस्मत भी बदल दी। हम बात कर रहे हैं मशहूर लेखक गीतकार मनोज मुतंशिर की।

बाहुबली-द कन्क्लूजन का इंतजार जितना सिनेमा प्रेमियों को है उतना ही मनोज को भी। आखिर हो भी क्यों न, इस तमिल-तेलुगू फिल्म को हिंदी सिनेमा में इतना पॉपुलर बनाने का श्रेय इन्हें भी जाता है। मनोज इस फिल्म के हिंदी वर्जन के लेखक हैं और वह कहते हैं कि बाहुबली- द बिग्निंग ने अगर आपको शुरुआत से ही चौंका दिया था, तो ‘बाहुबली- द कंक्लूज़न’ आपको पूरी तरह हक्का-बक्का कर देगी। पेश है उनसे गाँव कनेक्शन की एक्सक्लूसिव बातचीत-

मनोज कहते हैं कि हिंदी बाहुबली इस तरह की फिल्म है जिसकी आपने कभी हिंदी सिनेमा में कल्पना ही नहीं की होगी। पहले से कितनी अलग होगी इस बारे में वह कहते हैं कि बाहुबली एक में काफी ड्रामा, एग्रेशन और युद्ध के दृश्य थे, वहीं बाहुबली- 2 में ड्रामे के साथ-साथ कॉमेडी और ह्यूमर भी है, जो पहले पार्ट में नहीं थी।

बाहुबली-2 के डायलॉग्स हिंदी ऑडियंस को समझकर लिखे गए हैं

एक तमिल-तेलुगू फिल्म के डायलॉग डब लिखने में कितनी दिक्कतें आती हैं, इस बारे में मनोज का कहना है कि 1995 में आई फिल्म बॉम्बे के बाद डब हिंदी फिल्में इतनी चली नहीं तो इसकी वजह यही रही कि हमारा अप्रोच गलत था। जब मुझे बाहुबली-2 ऑफर की गई तो मैंने एस राजामौली सर से यही कहा कि मैं यह बिल्कुल करूंगा लेकिन डायलॉग्स का ट्रांसलेशन नहीं बल्कि ट्रांसक्रियेशन करूंगा।

ट्रांसलेट करने में शिकायत यही रहती है कि कई बार लिप मैच नहीं करते। मतलब लिपसिंग कुछ हो रही है और डायलॉग्स कुछ बोले जा रहे हैं। मैंने बस सीन समझकर अपने हिसाब से डायलॉग्स लिखे। मैं यह कह सकता हूं कि अगर बाहुबली एक में हमने 85 फीसदी लिप मैच किए थे तो इस बार हम 95 कर रहे हैं। पहले पार्ट में जो बीच-बीच में साउथ इंडियन टच था वो आपको पार्ट टु में देखने को नहीं मिलेंगे। डायलॉग्स पूरी हिंदी ऑडियंस को समझकर लिखे गए हैं।

शब्दों के मामले में धनी हूं, रिपीटेशन का सवाल नहीं

मनोज की आने वाली फिल्मों में नाम शबाना, नूर, बाहुबली, हाफ गर्लफ्रेंड और बादशाहो है। मनोज बताते हैं कि उन्होंने एक साल में 100 गाने लिखे हैं। इतनी बड़ी संख्या में गाने लिखने के बाद रिपीटेशन के डर पर मनोज कहते हैं, आपके पास खजाना कितना है ये इस बात पर निर्भर करता है। अगर आपकी शब्दों की दुनिया बहुत छोटी है तो एक-दो गाने के बाद ही रिपीटेशन होने लगेगा। मैं इस मामले में संपूर्ण धनी हूं। मेरे पास शब्दों की कोई कमी नहीं है। दसवीं से पोएट्री की तरफ झुकाव हो गया था और यही वो चीज है जो समय के साथ छूटी नहीं है मैं इस मामले में भरा हुआ हूं। मनोज आगे कहते हैं कि मैं कहानी से प्रेरित होकर ही गाने लिखता हूं। कहने को तो मैंने कई लव सॉन्ग्स लिखे हैं लेकिन सभी एक-दूसरे से अलग हैं। फिर वो चाहे ‘रुस्तम’ हो, ‘एक विलेन’ हो ‘कपूर एंड संस हो’ या फिर ‘एम एस धोनी’।

धोनी के लिए गाने लिखना सबसे चैलेंजिंग रहा

अब तक के गीतों में सबसे ज्यादा चैलेंजिंग मनोज फिल्म एमएस धोनी के गानों को मानते हैं। मनोज कहते हैं कि धोनी एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जो असल जिंदगी में गर्लफ्रेंड को प्रपोज करने के लिए या पत्नी से प्यार का इजहार करने के लिए गाने नहीं गाता। फिल्म से जुड़ा एक किस्सा शेयर करते हुए मनोज बताते हैं कि मैं नीरज पांडेय और अरमान मलिक (संगीतकार) साथ में बैठे थे, मैंने उन्हें गीत की एक लाइन सुनाई जिसे हीरो गा रहा है, ‘तू आती है सीने में, जब-जब सांसे भरता हूं, कौन तुझे यूं प्यार करेगा जैसे मैं करता हूं...’, इसे सुनकर नीरज ने कहा, पंक्तियां तो अच्छी हैं लेकिन धोनी पर फिट नहीं बैठेगी। धोनी इस तरह नहीं बोलेगा, उन्होंने कहा, ‘इसे टर्नअराउंड कर दो, यानी धोनी नहीं गा सकते तो उनकी प्रेमिका इसे गा सकती है।’ फिर यह गाना इतने हिट हुए कि हर लड़की के लिए खास हो गया। जिसके बारे में पूरी फिल्म हो, आप उसके लिए ही ज्यादा गाने नहीं लिख सकते तो यह काफी चैलेंजिंग है।

पोएट्री को सेलिब्रेट करना बंद दिया है हमने

सोशल मीडिया पर उर्दू शायर और कवियों के लिए लोगों के बढ़ते रुझान के बारे में मनोज बताते हैं कि पोएट्री को अब हम सेलिब्रेटिंग आर्ट की तरह मनाते नहीं है। इसमें दोष लोगों का नहीं है बल्कि हम लेखक और कवियों का है जो इतने ज्ञानी हैं, हमारे पास इतना ज्ञान है कि सिर्फ दो लाइन में ही उसे दिखा देना चाहते हैं। ट्विटर पर #मुंतशिरज्म नाम से मैं कई शायरियां लिखता हूं जिस पर लोग काफी रियेक्ट करते हैं। हमें अब आसान शब्दों में लिखना होगा, किसी कॉलेज के लड़के की तरह बात करनी होगी। मैं मानता हूं कि 99 फीसदी ऐसे लोग हैं जो गालिब को एक शायर के रूप में जानते हैं लेकिन एक-दो शेर बता देंगे लेकिन उन्हें तीसरे-चौथे के बारे में पता ही नहीं होंगे क्योंकि वे उनका मतलब ही नहीं समझ सकते।

नए कवियों ने कुछ ऐसा किया ही नहीं है कि लोग उन पर फोकस करें

हम लेखक हैं हमारा काम इमोशंस लाना है, हम टीचर या प्रोफेसर नहीं है कि लोगों को ज्ञान दें। हमें इस बारे में सोचने की जरूरत है। किसी को भाषा नहीं सिखानी है बल्कि लोगों की बात अपनी तरह से समझानी है। नए कवियों ने कुछ ऐसा किया ही नहीं है कि लोग उन पर फोकस करें। पुराने में भी लोगों को न अहमद फराज समझ आते हैं न नासिर काजमी। ले-देकर सिर्फ बशीर बद्र की शायरियों से ही खुद को कनेक्ट कर पाते हैं।

सोशल मीडिया को इग्नोर करेंगे तो खुद इग्नोर हो जाएंगे

आप जो काम करते हैं उसे दिखाना भी जरूरी है, ऐसा मानते हैं मनोज मुतंशिर। मनोज कहते हैं कि जब टेलीविजन नहीं था तब सिनेमा ही जरिया था। अब तो टीवी पर भी काम दिखाना है और सोशल मीडिया में खुद की पहचान बनानी है, अगर आप इसे इग्नोर करेंगे तो हो आप इग्नोर हो जाएंगे। एक दौर था जब मीडिया इतना सक्रिय नहीं था फिर भी साहिर लुधियानवी के ऑटोग्राफ के लिए मीठीबाई कॉलेज दो किमी लाइन लग जाती थी। ये एक इतिहास है।

अभी तक का सफर अद्भुत रहा है। केबीसी से शुरुआत करने के बाद 17 साल टेलीविजन किया फिर 2014 से फिल्मों में असली पहचान बना पाया। फिल्मों में मैंने एक साल में 100 गाने लिखें, एक साल में 17 रिलीज आईं।

इंडस्ट्री में महिला लेखकों की कमी पर मनोज कहतेहैं कि कौशर मुनीर और अन्विता दत्त महिला लेखकों के रूप में काफी प्रसिद्ध हैं। महिला लेखक अगर कम हैं तो इसकी वजह उनका महिला होना नहीं है बल्कि उन्होंने खुद इसे अपने व्यवसाय के रूप में नहीं चुना।

मनोज ने विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के लिए बीएसपी एंथम लिखा था। मनोज कहते हैं कि मैं एक लेखक हूं और लेखक के तौर पर अगर किसी भी पार्टी से मुझे लिखने के लिए कहा जाता है तो मैं जरूर लिखूंगा क्योंकि ये मेरा प्रफेशन है। वहीं यूपी में नई सरकार के बारे में वह कहते हैं कि काफी समय बाद ऐसा हुआ है कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार है अब शायद शिकायतों का मौका कम हो जाएगा। वर्ना अमेठी के लिए केंद्र सरकारें हमेशा यहीं कहती आई हैं कि हम जिले के विकास के लिए हर बार पैसे देते हैं लेकिन राज्य सरकारें कुछ नहीं करती हैं। शहर में कई तरह की परेशानियां हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, सड़कें खस्ताहाल हैं। अमेठी जैसा होना चाहिए उसको वैसा बनाने की जरूरत है।

सपा सरकार की फिल्म विकास नीति पर मनोज कहा कहना है कि सरकार एक बार अच्छा काम शुरू करती है तो उसे नई सरकार को भी जारी रखना चाहिए। सिर्फ इसलिए नहीं बंद कर देना चाहिए कि इसे तो पिछली सरकार ने बनाया था।

पांच हजार लोग लिखते हैं लेकिन पांच लोग अच्छा लिखते हैं

कंगना रनौत के भाई-भतीजावाद बयान पर मनोज कहते हैं कि उन्होंने यह अपने नजरिये से बयान दिया होगा मैंने कभी ये चीज फेस नहीं की। अगर ऐसा होता तो अमेठी जैसे छोटे शहर से कोई आकर इंडस्ट्री में नाम नहीं कमा सकता था। थोड़ा बहुत परिवारवाद तो हर-जगह है। इसे आप ऐसे भी ले सकते हैं कि जैसे डॉक्टर अपने बेटे को भी डॉक्टर बनाना चाहेगा। राजनीति में भी परिवारवाद है। उसी तरह यहां भी लोग सोचते हैं लेकिन पूरी तरह दरवाजे किसी के लिए नहीं बंद हैं। अगर आपमें टैलेंट है तो जरूर कामयाब होंगे। पांच हजार लोग लिखते हैं लेकिन पांच लोग अच्छा लिखते हैं।

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