एक कमरे तक सिमट गए बच्चों के खेलकूद, सेहत पर पड़ रहा बुरा असर

Shrinkhala PandeyShrinkhala Pandey   31 July 2018 8:31 AM GMT

एक कमरे तक सिमट गए बच्चों के खेलकूद, सेहत पर पड़ रहा बुरा असरटीवी बन रहा बच्चों का दुश्मन।

लखनऊ। अब शाम के वक्त पार्कों में बच्चों की भीड़ आपको खेलते हुए कम देखने को मिलेंगे क्योंकि वो बच्चे अब अपने अपने घरों में मोबाइल व वीडियो गेम खेलने में व्यस्त होते हैं। यहां तक दादी-नानी की कहानियां भी अब मोबाइल पर ही सुनने की जिद करते हैं। संयुक्त परिवार की कमी और बढ़ते एकल परिवार की मजबूरी ने बच्चों के खेल-कूद का दायरा मोबाइल, टीवी व वीडियोगेम तक ही सीमित कर दिया है।

लखनऊ के इंदिरानगर की रहने वाली सलोनी तिवारी (33 वर्ष) निजी कंपनी में नौकरी करती हैं, उनका 12 साल का बेटा आयुष स्कूल से आने के बाद घर पर अकेले होता है। आयुष शाम को भी खेलने नहीं निकलता बल्कि टीवी और लैपटाप पर गेम खेलता रहता है। सलोनी बताती हैं कि, "मैं भी घर पर नहीं होती और जमाना इतना खराब हो चुका है कि किसी पर भरोसा नहीं कर सकते इसलिए मैंने ही आयुष को मना कर रखा है घर से बाहर निकलने को। अब घर पर वो अकेले बोर न हो इसलिए लैपटॉप पर गेम खेलता है या टीवी देखता है।"

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सलोनी जैसे कई महिलाएं हैं जो नौकरीपेशा हैं और मजबूरी के चलते अपने बच्चों को समय नहीं दे पातीं। इसके साथ ही असुरक्षा की भावना के कारण वो बच्चों को बाहर खेलने से भी मना कर देती हैं जबकि खेलकूद बच्चों के अच्छी सेहत के लिए बहुत जरूरी है।

लखनऊ के अलीगंज में रहने वाली प्रियंका (10वर्ष) बाहर न खेलने का कारण बताती है, "मुझे खेलना पंसद है लेकिन मेरे घर के आस-पास के बच्चे खेलने नहीं निकलते इसनिए मैं भी घर पर अकेले ही खिलौने से खेलती हूं।"

लखनऊ के जनरल फीजिशियन डॉ एमके खान बताते हैं, ''बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए उनका खेलकूद में हिस्सा लेना जरूरी होता है। खेलने कूदने से बच्चा चुस्त और फुर्तीला रहता है। इससे बच्चों में रक्त संचार ठीक से होता है। इससे उन्हें भूख और नींद अच्छी आती है।'' डॉ खान इंदिरा नगर कालोनी के मुंशी पुलिया स्थान पर प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं।

वो आगे बताते हैं, ''आज हमारे पास जिस प्रकार की तकनीक है वह बच्चों की मूवमेंट्स को सीमित कर देती है। स्कूल जाने वाले तीन बच्चों में से एक में शारीरिक विकास सुस्त दिखता है। इसके साथ ही मोटापा, डायबिटीज, डिप्रेशन जैसी बीमारियां अब बच्चों में भी होने लगी हैं। फिज़िकल एक्टिविटी करते रहने से बच्चे फोकस करना सीखते हैं और नई स्किल्स डेवलप करते हैं।"

बाहर खेलने के बजाय कमरों मे ही खेलते।

दादी-नानी की कहानियां भी अब मोबाइल पर

बच्चों की परवरिश में अब मोबाइल व टीवी जैसे गैजेट्स को मां बाप ही शामिल करते हैं और ये बाद में उनके लिए समस्या बन जाती है। लखनऊ के शक्तिनगर में रहने वाली अनुराधा पांडेय (35 वर्ष) की पांच साल की बेटी बिना मोबाइल में कहानियां सुने दूध नहीं पीती है। अनुराधा बताती हैं, "पहले जब वो दूध नहीं पीती थी तो मैं उसे मोबाइल पर स्टोरी सुनाती थी अब ये उसकी आदत बन गई है। अगर मना करो तो रोने लगती है और दूध गिरा देती है।"

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री सोहनराम यादव बताते हैं, "एक समय था जब बच्चों की परवरिश में दादी, दादा, नानी, नाना सबकी भूमिका होती थी लेकिन अब संयुक्त परिवार ही नहीं रहे तो ये रिश्ते भी फोन और वीडियो कॉलिंग तक सिमटते जा रहे हैं।" वो आगे बताते हैँ, "पहले दादी, नानी बच्चों को सोने से पहले कहानियां सुनाती थीं उन्हें पौराणिक कथाएं बताती थीं जिनका उनपर अच्छा असर होता था लेकिन अब बच्चे देर रात तक या तो टीवी देखते हैं या फिर मोबाइल पर गेम खेलते हैं और सो जाते हैं। ये सारी बातें उनके विकास पर भी असर डालती हैं।"

दादी व नानी की कहानियां भी मोबाइल पर सुनते हैं।

मानसिक विकास पर पड़ रहा बुरा असर

खेल का बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास से गहरा संबंध है। इसके बारे में लखनऊ के बालमनोरोग चिकित्सक डॉ राजेश पाण्डेय बताते हैं, "खेल से बच्चे हारना-जीतना सीखते हैं, उनमें प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ती है, मिलकर काम करना, निर्णय लेना की क्षमता बढ़ती है।" "जब खेलने की आदत ही नहीं बची तो धीरे-धीरे जो लोग होंगे वो आपस में मिलजुल कर काम नहीं कर पाएंगे उनमें एडजेस्टमेंट नाम की चीज ही नहीं होगी। हार स्वीकार नहीं कर पाएंगे जिसके चलते जल्दी निराश हो जाएंगे, डिप्रेशन, घबराहट व आत्मविश्वास की भावना कम होने की समस्याएं सामने आएगी।" डॉ पाण्डेय ने आगे बताया।

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