सीता मां के सम्मान के लिए राम का अपमान करने को फैशन न बनाएं: अमीष त्रिपाठी

Shefali SrivastavaShefali Srivastava   11 May 2017 7:42 PM GMT

सीता मां के सम्मान के लिए राम का अपमान करने को फैशन न बनाएं: अमीष त्रिपाठीहाल ही में किताब का कवर पेज लॉन्च किया 

लखनऊ। आज के मॉडर्न लोगों में सीता जी की छवि एक आदर्श नारी और पति का साथ निभाने वाली पत्नी के रूप में है लेकिन लेखक अमीष त्रिपाठी के अगले उपन्यास में पाठक सीता को एक योद्धा के रूप में पढ़ेंगे।

आईआईएम ग्रैजुएट अमीष त्रिपाठी की अगली किताब है सीता- द वॉरियर ऑफ मिथिला। हाल ही में उन्होंने अपनी किताब के कवर पेज को लॉन्च किया, जो राम सीरीज की दूसरी नॉवेल है।

हिंदू देवी-देवताओं के पौराणिक कथाओं को काल्पनिक कहानियों के जरिए नए अंदाज में पेश करने वाले अमीष की पहली किताब द इम्मॉर्टल्स ऑफ मेलुहा 2010 में आई थी। शिव की पौराणिक कहानी पर आधारित यह किताब साल के अंत होते-होते बेस्ट सेलिंग बुक बन गई थी। इसके बाद उनकी दूसरी किताबें ‘द सीक्रेट ऑफ नागाज’ और ‘द ओथ ऑफ वायु पुत्राज’ भी आई। इन्हें पहली किताब की तरह पाठकों की वाहवाही मिली। 2015 में अमीष ने राम सीरीज की पहली नॉवेल ‘द स्कियॉन ऑफ इक्ष्वाकु’ लॉन्च की थी।

पेश है उनसे विशेष बातचीत-

सवाल- सीता- द वॉरियर ऑफ मिथिला में सीताजी के किरदार को नए अंदाज में पेश करने का आइडिया कहां से आया?

जवाब- कई हद तक सीता जी की शहरी भारत में जो छवि है वो 90 दशक के टीवी सीरियल्स पर आधारित है। टेलीविजन सीरियल्स में सीता जी के जिस रूप को देखा वो रामचरितमानस पर आधारित था। रामचरितमानस और वाल्मीकि की रामायण में काफी फर्क है। वाल्मीकि रामायण में सीता जी की काफी मजबूत छवि पेश की गई है। इसी तरह रामायण के दूसरे वर्जन अद्भुत रामायण और गोंड रामायणी में भी सीता जी को योद्धा के रूप में दिखाया गया है और भी कई तथ्य अलग-अलग हैं। जैसे अद्भुत रामायण में दो रावण का जिक्र है और बड़े रावण का वध सीता जी ने किया था जब उन्होंने काली का रूप धारण किया था। तो इस तरह आज के भारतीयों को भले ही मेरी किताब में सीता की छवि अलग दिखे लेकिन जो प्राचीन रामायण है उसमें और मेरी किताब में सीता मां की छवि बहुत अलग नहीं है। मुझे प्रेरणा भी पुरानी रामायण से ही मिली है।

सवाल- सीता की मजबूत छवि के जरिए महिला सशक्तीकरण को भी रिप्रजेंट करती है आपकी नॉवेल?

जवाब- मेरा उद्देश्य ये भी है। हमारे ग्रंथों में भी कहा गया है कि जिस देश में औरतों की इज्जत नहीं होती वहां देवता भी वास नहीं करते। हमारे देश की 2000 साल पहले लिखी गई कहानियों को पढ़े तो उसमें जानेंगे कि उस दौर में महिलाओं के लिए कितना सम्मान बताया गया है। हमारे सबसे पुराने वेद ऋग्वेद में कई सूक्त ऐसे हैं जिनकी रचना ऋषिकाओं (महिला ऋषि ) ने की और उस समय में ऋषि-महात्मा की इज्जत राजाओं से भी ज्यादा थी। तो सोचिए आज हम जब महिलाओं की बराबरी की बात करते हैं या महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं तो वो नई नहीं है। ये तो हमारा धर्म है, हमारी प्राचीन सभ्यता है।

सवाल- आपकी फिक्शन नॉवेल भी रिसर्च आधारित होती है। किस तरह से आप इस पर तथ्य ढूंढते हैं?

जवाब- जो मैं किताबें लिखता हूं उसकी रिसर्च मैं उस समय से करता आ रहा हूं जबसे मैंने जीवन में पढ़ाई शुरू की थी। मैं कई तरह की कहानियां पढ़ता हूं। पौराणिक कथाओं को ज्यादा पढ़ता हूं। अपने परिवार से भी सीखा है। मेरे बाबाजी पंडित थे बनारस में। मां- पिता भी धार्मिक हैं। न सिर्फ रामचरित मानस और रामायण बल्कि गोंड रामायणी, अद्भुत रामायण, आनंद रामायण और कई वर्जन हैं जिन्हें पहले मैंने सुना है या पढ़ा हुआ है। तो ये सब मेरे दिमाग के किसी खेत में घुसा हुआ था और जब लिखने की बारी आई तो सामने आ गया।


सवाल- सीता जी को लिखते समय किस तरह के अनुभवों से गुजरे?

जवाब- इसे पढ़कर प्रेरणा मिलती है कि हमारी सीता मां ऐसी भी है। आज के मॉडर्न लोग भूल जाते हैं कि सीता मां की इज्जत करने के लिए राम की बेइज्जती करने की जरूरत नहीं है। इसे लोग फैशन बनाते जा रहे हैं। मेरे हिसाब से ये गलत है। हम दोनों का सम्मान कर सकते हैं। दोनों की अराधना कर सकते हैं। हमें दोनों की पूजा करनी चाहिए। दूसरी बात धर्म और मर्यादा की हर बार इज्जत होनी चाहिए लेकिन हर बार मर्यादा की इज्जत करने के लिए शक्ति का अपमान करने की जरूरत नहीं है। शक्ति की भी इज्जत होनी चाहिए। ये जो समाज में असंतुलन है उसे दूर करने की जरूरत है।

सवाल- पौराणिक कथाओं का फिक्शन, इस एक्सपेरिमेंट के साथ जब आपने अपनी पहली किताब लिखी तो क्या मन में किसी तरह का भय था समाज में लोगों के विद्रोह का?

जवाब- आप फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन की बात कर रहे हैं और ऐसा कोई देश नहीं है जहां ये पूरी तरह से माना जाता हो। अगर पूरी दुनिया में देखे तो फिर भी हमारा देश फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के मामले में टॉप देशों में है। मैं ये कहूंगा कि हमारे देश में कानून इस अधिकार को सुरक्षित नहीं रखता लेकिन लोग अलग-अलग पहलू सुनने को तैयार हैं। बस बात ये है कि अगर अलग राय दे रहे हैं या पहलू पेश कर रहे हैं तो उसे इज्जत के साथ पेश करिए। उसे लिखते समय मन में कोई खोट न रहे कि इसे कंट्रोवर्सी क्रियेट करने के लिए लिखा जाए। मैं इज्जत के साथ फिक्शन लिखता हूं। मैं खुद उन भगवानों की अराधना करता हूं जिनके बारे में लिखता हूं। दूसरी बात कानून में सुधार की जरूरत है लेकिन मैं ये मानता हूं कि हमारे देश की जनता कानून से आगे है। कानून में जो पहला सुधार हुआ 1951 में उसमें फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन हद तक कंट्रोल किया गया था उसे रिपीट करने की जरूरत है।

सवाल- आगे भी पौराणिक कथाओं की थीम पर ही लिखेंगे या फिर कुछ अलग में भी ट्राइ करेंगे?

जवाब- इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकता। दस साल पहले मैंने ये भी नहीं सोचा था कि मैं फुल टाइम राइटर बन जाऊंगा लेकिन इस समय मैं एक लेखक की जिंदगी बिता रहा हूं। मेरा हाल में कोई लव स्टोरी लिखने का प्लान नहीं है। मैं पौराणिक विषयों पर लिखना चाहता हूं करीब 20-25 साल तक प्लान है मेरा इस पर। ऐतिहासिक कैरेक्टर पर भी लिख सकता हूं।

सवाल- क्या आपको लगता है कि लेखक के लिए प्रमोशन भी उतना ही जरूरी हो गया है? पहले बुक लॉन्चिंग पर कार्यक्रम होते थे अब कवर पेज को भी प्रमोट किया जा रहा है।

जवाब- इस पर प्रैक्टिकल होने की जरूरत है। जब आप किताब लिख रहे हैं तो किसी के बारे में न सोचे दिल से लिखे। जब पूरी हो जाए और मासकॉम का वक्त आ जाए तो प्रैक्टिकल होने की जरूरत है, हमें ये मानना होगा कि किताब अकेले की नहीं है इसे लोगों तक ले जाने के लिए काम करना होगा। प्रमोशन करना होगा और ये जमाना है ऐसा। मेरा धर्म है कि मैं अपने पब्लिशर की सहायता करूं। अगर पब्लिशनर ने मेरी किताब पर इतना पैसा इंवेस्ट किया है तो उसके लिए कोशिश करूं कि पब्लिशनर अपना पैसा कमा लें और मुनाफा भी कमा ले।

सवाल- आप शिव भक्त है, धर्म पर विश्वास करने को कहते हैं लेकिन इस समय देश में धर्म को लेकर जगह-जगह बवाल हो रहे हैं लोग कट्टर हो रहे हैं।

जवाब- मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि लोग कट्टर हो रहे हैं। मैं कहूंगा कि 1991 के बाद कुछ दशक के बाद उभर के आ रहा है। आर्थिक सुधार हो रहा है। गरीबी कम हुई है पैसा आया है पूरी दुनिया में नाम हो रहा है। देश में अभी मंथन चल रहा है। मंथन होता है तो अमृत निकलेगा। थोड़ा विष भी निकलेगा। हम पहले गुलाम थे ये स्वतंत्रता के बाद भी गुलामी से बंधे हुए थे। इस समय देश में बदलाव आया था। अब हम भास्कराचार्य या आर्यभट्ट नहीं पढ़ाते। मैं मानता हूं कि थोड़ा समय देने की जरूरत है।

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