110 साल पुरानी है मुंबई में दही हांडी की परंपरा, जानिए क्यों खास है ये त्योहार

110 साल पुरानी है मुंबई में दही हांडी की परंपरा, जानिए क्यों खास है ये त्योहारमुबंई में खास तरीके से मनाई जाती है दही हांडी।


लखनऊ। कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर महाराष्ट्र समेत पूरे देश में 'दही-हांडी' का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र में यह सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। इस उत्सव में लाखों युवा भाग लेते हैं। दही हांडी के पीछे श्री कृष्ण की माखन चुराने की पौराणिक कथा जुड़ी है।

दही हांडी परम्परा की शुरुआत

कृष्ण पुराण की कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ माखन की चोरी किया करते थे। भगवान कृष्ण ऊपर चढ़कर पास-पड़ोस के घरों में मटकी में रखा दही और माखन चुराया करते थे।जब वे गोकुल के घरों में मटकियां फोड़ने का प्रयास करते थे, तो महिलाएं उन्हें रोकने के लिए पानी फेंकती थी। कान्हा के इसी रूप के कारण बड़े प्यार से उन्हें ‘माखनचोर’ कहा जाता है। हांडी फोड़ने वाले बच्चे को ‘गोविंदा’ कहा जाता है, जो ‘गोविंद’ का ही दूसरा नाम है।

कैसे मनाया जाता है दही हांडी

दही-हांडी प्रतियोगिता में युवाओं का एक समूह पिरामिड बनाता है, जिसमें एक युवक ऊपर चढ़कर ऊंचाई पर लटकी हांडी, जिसमें दही होता है, उसे फोड़ता है। ये गोविंदा बनकर इस खेल में भाग लेते हैं। आसपास के लोग दही-हांडी फोड़ने का प्रयास कर रही टोली पर पानी की बौछार करते हैं, ताकि वे आसानी से दही हांडी फोड़ न सके। प्रतियोगिता जीतने वालों पर लाखों के इनाम की बौछार होती है।

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मुंबई में 1907 से शुरू हुई थी दही-हांडी परम्परा

नवी मुंबई के पास घणसोली गांव में यह परंपरा पिछले 110 वर्षों से चली आ रही है। यहां सबसे पहले वर्ष 1907 में कृष्ण जन्माष्टमी मनाने की परंपरा की शुरुआत की गई थी। यहां के हनुमान मंदिर में जन्माष्टमी के एक सप्ताह पहले से ही भजन-कीर्तन शुरू हो जाता है, जो दही-हांडी फोड़ने के साथ समाप्त होता है। दही-हांडी फोड़ने के लिए युवा लड़कों की टोली मानव पिरामिड बनाकर ऊपर टंगी मटकी तोड़ती थी। मुंबई ही नहीं, ठाणे, नवी मुंबई, डोंबिवली, कल्याण, उल्हासनगर, मीरा-भाईंदर, वसई-विरार तक दही हांडी उत्सव का आयोजन होता है।

दही-हांडी फोड़ने के लिए युवा लड़कों की टोली मानव पिरामिड बनाकर ऊपर टंगी मटकी तोड़ती थी।

सामूहिकता को मिलता है बढ़ावा

दही-हांडी उत्सव के दौरान सार्वजनिक स्थलों पर हांडी को रस्सी के सहारे काफी ऊंचाई पर लटका दिया जाता है. दही से भरे मटके को लोग समूहों में एकजुट होकर फोड़ने का प्रयास करते हैं। हांडी को फोड़ने के प्रयास में लोग एक-दूसरे के ऊपर व्यवस्थित तरीके से चढ़कर पिरामिड जैसा आकार बनाते हैं। इससे लोग काफी ऊंचाई पर बंधे मटके तक पहुंच जाते हैं। इस प्रयास में चूंकि एकजुटता की काफी जरूरत पड़ती है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि दही-हांडी उत्सव से सामूहिकता को बढ़ावा मिलता है।

शारीरिक जांच जरूरी

ट्रेनिंग की शुरुआत होने से पहले ही एक तरह से इनके शिविर आयोजित होते हैं। जहां पर इनके शरीर की पूरी जांच की जाती है। दही हंडी के त्योहार में हिस्सा लेने वाले बच्चे या नवयुवक को किसी भी तरह की कोई शारीरिक परेशानी नहीं होनी चाहिए। हर बड़ा मंडल अपने सदस्यों का हेल्थ चेकअप करता है, ताकि हंडी को फोड़ने के लिए चढ़ते या उतरते समय किसी को कोई दिक्कत न हो

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फेस्टिवल में 14 साल से कम उम्र के बच्चे नहीं लेगें हिस्सा

बांबे हाईकोर्ट ने दही-हांडी फेस्टिवल के दौरान मानव पिरामिड की मैक्सिमम ऊंचाई पर कोई भी बैन लगाने से इंकार कर दिया है, साथ ही बच्चों को इसमें भाग लेने से मना कर दिया। न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस एमएस कार्णिक की बेंच ने कहा, "पार्टिसिपेंट्स" की उम्र या पिरामिड की ऊंचाई पर हाईकोर्ट रोक नहीं लगा सकता। यह विधायिका का विशेषाधिकार है। हम राज्य सरकार का बयान स्वीकार करते है कि वह सुनिश्चित करेगी कि दही-हांडी में 14 साल से छोटा कोई बच्चा भाग नहीं लेगा।

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