हिंदी सिनेमा का वो ‘आवारा’ जिसकी एक फिल्म के लिए चीन ने किया भारत से समझौता

Shefali SrivastavaShefali Srivastava   2 Jun 2017 9:17 AM GMT

हिंदी सिनेमा का वो ‘आवारा’ जिसकी एक फिल्म  के लिए चीन ने किया भारत से समझौताआज राजकपूर की पुण्यतिथि है

लख‍नऊ। लोग इन दिनों दंगल और बाहुबली की बात कर रहे हैं लेकिन क्या आपको पता है कि दंगल से काफी साल पहले एक हिंदी फिल्म ने चीनी दर्शकों को बॉलीवुड का फैन बना दिया था। वो फिल्म थी 1951 में रिलीज हुई आवारा, इसे राजकपूर ने खुद ही डायरेक्ट किया और खुद ही एक्टिंग भी। उस दौर में भारत में ही फिल्म चल जाए बड़ी बात क्योंकि आजादी मिले कुछ ही समय बीता था और भारत का संविधान भी लागू हुआ था।

लेकिन फिल्म ने हिंदी सिनेमा को ग्लोबलाइज कर दिया। फिल्म दुश्मन देश चीन में इतनी पसंद की गई कि वहां हर किसी की जुबां पर फिल्म का गाना ‘आवारा हूं’ छा गया।

अब इस फिल्म थियेटर वर्जन में ढालने के लिए दोनों देशों के बीच एक एमओयू साइन किया गया है। यानी चीन में ये फिल्म अब थियेटर वर्जन में दिखेगी।

यह सच है कि राज कपूर को अभिनय विरासत में मिला था। उनके पिता पृथ्वीराज कपूर अपने समय के मशहूर रंगकर्मी और फिल्म अभिनेता थे लेकिन उनको यह विश्वास नहीं था कि वे कुछ विशेष काम कर पाएंगे इसलिए उन्होंने बॉम्बे टॉकीज में केदार शर्मा के साथ राज कपूर को क्लैपर ब्वाय का काम दिला दिया।

कहते हैं एक बार राज कपूर फ़िल्म ज्वारभाटा कि शूटिंग कर रहे थे। केदार शर्मा उस फ़िल्म के असिस्टेंट डायरेक्टर थे। जब वो शूट पर क्लैप कर के शूट शुरू करने के लिए बोलते थे तब-तब राज कपूर कैमरे के सामने आकर बाल ठीक करने लग जाया करते थे। दो-तीन बार देखने के बाद केदार शर्मा ने उन्हें एक थप्पड़ लगा दिया। फिर उन्हीं केदार शर्मा ने अपनी फ़िल्म नीलकमल में राज कपूर को मधुबाला के साथ लिया। उस थप्पड़ ने राजकपूर की किस्मत ही बदल कर रख दी।

राज कपूर की काम के प्रति लगन इतनी थी कि जब वह सत्रह वर्ष की उम्र में रणजीत स्टूडियो में नौसिखिया थे तो वजन उठाने और पोंछा लगाने के काम से भी परहेज नहीं किया। अब राजकपूर ने अभिनय के अलावा फिल्म निर्देशन में भी हाथ आजमाना चाहा और 1948 में आरके फिल्म्स की स्थापना करके फिल्म आग का निर्माण किया।

राज कपूर की कुछ यादगार फिल्में


आग (1948)

राजकपूर जब 23 साल के थे तभी उन्होंने प्रोडक्शन हाउस का निर्माण करके फिल्म आग बनाई। यह फिल्म बेहद सफल हुई थी और इसमें वह पहली बार फिल्मी पर्दे पर नरगिस के साथ नजर आए थे।

आवारा (1952)

वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म 'आवारा' राजकपूर के सिने करियर की अहम फिल्म साबित हुई। फिल्म की सफलता ने राजकपूर को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई। फिल्म का शीर्षक गीत 'आवारा हूं या गर्दिश में आसमान का तारा हूं', देश-विदेश में बहुत लोकप्रिय हुआ।

जिस देश में गंगा बहती है (1960)

इस फिल्म का प्रोडक्शन आरके स्टूडियो के तहत हुआ था। फिल्म हिंसा के प्रति एक सामाजिक संदेश देती है। फिल्म में राज कपूर ने राजू का किरदार निभाया है।

राम तेरी गंगा मैली (1985)

राज कपूर द्वारा निर्देशित इस फिल्म की कहानी में औरतों पर होते अत्याचार और जमींदारों द्वारा औरतों एक भोग-विलास की वस्तु समझे जाने के मुद्दे को दिखाया है।

प्रेमरोग (1982)

राज कपूर द्वारा निर्देशित इस फिल्म में बाल विवाह और पुनर्विवाह जैसे सामाजिक मुद्दे को उठाया है।

राज कपूर के बारे में कुछ दिलचस्प बातें

-राजकपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार के बीच बहुत गहरी मित्रता थी। ये तीनों जब भी मिलते तो खूब बाते करते। कुछ बातें उनकी फ़िल्मों की होती तो कुछ उनकी निज़ी ज़िन्दगी की। इतना ही नहीं राजकपूर साहब आरके स्टूडियो में अपना मेकअप रूम किसी और को इस्तेमाल नहीं करने देते थे लेकिन सिर्फ देव साहब को ही इज़ाज़त थी कि उस मेकअप रूम को इस्तेमाल कर लें।

-कहते हैं कि बचपन में राज कपूर सफेद साड़ी पहने हुई एक स्त्री पर मोहित हो गए थे। उसके बाद से सफेद साड़ी से उनका मोह इतना गहरा गया कि उनकी तमाम फिल्मों की अभिनेत्रियां (नर्गिस, पद्मिनी, वैजयंतीमाला, जीनत अमान, पद्मिनी कोल्हापुरे, मंदाकिनी) पर्दे पर भी सफेद साड़ी पहने नजर आईं। यहां तक कि घर में उनकी पत्नी कृष्णा हमेशा सफेद साड़ी ही पहना करती थीं।

-वे चार्ली चैपलिन के प्रशंसक थे और उनके अभिनय में चार्ली चैपलिन का पूरा पूरा प्रभाव पाया जाता था। राज कपूर को भारतीय सिनेमा का चार्ली चैपलिन भी कहा जाता है।

- हिन्दी फ़िल्मों में राज कपूर को पहला शोमैन माना जाता है क्योंकि उनकी फ़िल्मों में मौज-मस्ती, प्रेम, हिंसा से लेकर अध्यात्म और समाजवाद तक सब कुछ मौजूद रहता था और उनकी फ़िल्में एवं गीत आज तक भारतीय ही नहीं तमाम विदेशी सिने प्रेमियों की पसंदीदा सूची में काफ़ी ऊपर बने रहते हैं।

-वर्ष 1971 में राजकपूर ने फिल्म 'मेरा नाम जोकर' का निर्माण किया जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नकार दी गई। अपनी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' की असफलता से राजकपूर को गहरा सदमा पहुंचा। उन्हें काफी आर्थिक क्षति भी हुई। उन्होंने निश्चय किया कि भविष्य में यदि वे फिल्म का निर्माण करेंगे तो मुख्य अभिनेता के रूप में काम नहीं करेंगे।

-राजकपूर व नर्गिस की प्रेमकहानी काफी चर्चित रही। दोनों ने साथ में 9 वर्ष में 17 फ़िल्मों में अभिनय किया। दोनों ने 'अंदाज', 'जान-पहचान', 'आवारा', 'अनहोनी', 'आशियाना', 'अंबर', 'आह', 'धुन', 'पापी', 'श्री 420', 'जागते रहो' और 'चोरी-चोरी' जैसी कई फिल्मों में एकसाथ काम किया।

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