दिल्ली की देहरी: काल्पनिक नहीं है पद्मावती की कहानी

दिल्ली की देहरी: काल्पनिक नहीं है पद्मावती की कहानीकुछ दिनों पहले जयपुर में करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली की अलाउद्दीन खिलजी-पद्मिनी विषयक फिल्म की शूटिंग के दौरान पिटाई कर दी।

कुछ दिनों पहले जयपुर में करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली की अलाउद्दीन खिलजी-पद्मिनी विषयक फिल्म की शूटिंग के दौरान पिटाई कर दी। इतिहास की पृष्ठभूमि के नाम पर प्रेम की कथा कहने वाली नायक-नायिका केंद्रित इस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी की भूमिका में रणवीर सिंह है तो दीपिका पादुकोण पद्मिनी का किरदार निभा रही हैं।

बाजीराव मस्तानी फिल्म के बाद इतना तो तय ही माना जा सकता है कि फिल्म राजपूती शौर्य-बलिदान पर केंद्रित तो होगी नहीं। आखिर बंबईया फिल्मकार इतिहास को अपने हिसाब से मनमोहक बनाने के लिए प्यार की कहानी को ही परोसते हैं। अनारकली से लेकर जोधा अकबर और बाजीराव मस्तानी में यह तथ्य समान दिखता है जहां इतिहास और ऐतिहासिक तथ्य गौण हैं। आखिर अनारकली से लेकर जोधाबाई की ऐतिहासिकता ही संदिग्ध है।

अगर फिल्मी रसायन से परे शुद्ध इतिहास की बात करें तो समर सिंह की मृत्यु के बाद सन् 1302 में उसका पुत्र रतनसिंह चित्तौड़ के सिंहासन पर बैठा। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने हिजरी 703 मु को चित्तौड़ पर आक्रमण किया। खिलजी के साथ कवि अमीर खुसरो भी था, जिसे उसने खुसरूए-शाइरां की उपाधि दी थी। अमीर खुसरो ने ‘खजाइनुल फुतूह’ (विजय कोश) में लिखा, यह ‘तारीखे अलाई’ के नाम से भी प्रसिद्ध है। ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह रचना खिलजी के समय का एक छोटा सा इतिहास है, जिसमें 695 हिजरी से लेकर 711 हिजरी तक की घटनाएं ली गई हैं। यह उस समय का एकमात्र समसामयिक इतिहास है, जिसमें तथ्यों का सटीकता और पूरी गहराई से वर्णन किया गया है।

पद्मिनी ने सभी स्त्रियों के साथ जौहर किया

खुसरो ‘तारीखे अलाई’ में लिखता है कि जब सुल्तान ने चित्तौड़ किले पर घेरा डाला और किले को तोड़ने का प्रयास किया तो किले में मौजूद राजपूत सैनिकों को लगा कि अब दुर्ग नहीं बचाया जा सकता है, तब जौहर कर राजपूत महिलाओं व बच्चों को अग्नि में प्रवेश करा दिया और राजपूत केसरिया वस्त्र धारण कर दुर्ग का द्वार खोल मुगल सेना से लोहा लेने लगे। भयंकर युद्ध के बाद 25 अगस्त, 1303 को दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया। राजा रत्नसिंह अपने सभी योद्धाओं के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। जब अलाउद्दीन ने दुर्ग में प्रवेश किया, उस समय तक पद्मिनी किले में उपस्थित स्त्रियों के साथ जौहर कर चुकी थीं। चित्तौड़ दुर्ग को जीतने के बाद अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम बदलकर अपने बेटे के नाम पर खिज्राबाद रख दिया था।

दर्पण में रानी पद्मिनी को देखना चाहता था अलाउद्दीन

‘उदयपुर का इतिहास-भाग एक’ में गौरी शंकर ओझा ने लिखा है कि गुहिल वंश के राजाओं को चित्तौड़ दुर्ग पर शासन करते हुए 550 वर्ष से अधिक समय हो गया था जब अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 ई. में चित्तौड़ के राजा रत्नसिंह पर आक्रमण करके उन्हें मार दिया। वहीं अंग्रेज इतिहासकार जेम्स टॉड ने ‘एनल्स एण्ड एक्टिविटीज ऑफ राजस्थान’ (विलियम कुक द्वारा संपादित) में लिखा है कि रत्नसिंह की रानी पद्मिनी के नेतृत्व में हिन्दू ललनाओं ने जौहर किया। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ को तो अधीन कर लिया पर जिस पद्मिनी के लिए उसने इतना संहार किया था, उसकी तो चिता की अग्नि ही उसको नजर आई। कहा जाता है कि जब पद्मिनी को प्राप्त करने की अपनी योजना में अलाउद्दीन को सफलता नहीं मिली तो वह चित्तौड़ से डेरा उठाकर लौटने को राजी हो गया था लेकिन राजूपतों के सामने शर्त यह थी कि रत्नसिंह एक दर्पण में उसे रानी पद्मिनी के सुन्दर मुख का प्रतिबिम्ब-भर दिखा दें लेकिन जब राणा किले के बाहर सुल्तान को उसके खेमों तक पहुंचाने गए तो उसने धोखे से उन्हें गिरफ्तार करवा लिया लेकिन रानी बड़ी चतुराई से अपने पति को शत्रुओं के चंगुल से मुक्त कराने में सफल हुई।

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