मकर संक्रान्ति और पतंगबाजी

मकर संक्रान्ति और पतंगबाजीभारत में कई पर्वो पर उड़ाई जाती है पतंग। 

अलग अलग राज्यों में विशेष त्यौहारों पर उड़ाई जाती है पंतगें

किशन कुमार (स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क)

रायबरेली। मकर संक्रान्ति हो और आसमान में रंग बिरंगी पतंगें न दिखें ऐसा तो हो ही नहीं सकता हर वर्ष की तरह इस बार भी रायबरेली शहर के सब्जी मन्डी इलाके में अचार वाली गली रंग बिरंगी पतंगों से पट चुकी है। पतंग बाजी के शौकीनों का मजमा लगने लगा है और चरखी, तिकल्ला, ढोब्बा, लहरिया जैसे शब्द सुनाई देने लगे हैं।

मकर सक्रान्ति का पर्व नजदीक आते ही पतंग की दुकानों पर रौनक शुरू हो गई है। इस वर्ष भी बाजार में देशी के साथ-साथ चायनीज पतंगों और मंझे की भरमार है। पतंग के लिए पूरे रायबरेली में मशहूर पतंग की “चच्चा की दुकान“ में कार्टून से लेकर मशहूर हस्तियों की तस्वीर वाली पतंगें अपना जलवा दिखा रही हैं।

कई पर्वों पर पतंग उड़ाने का रिवाज

आज भी भारत के महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली आदि में पतंग उड़ाने के लिए समय निर्धारित है। अलग-अलग राज्यों में पतंग को अलग-अलग नाम से जाना जाता है। आधुनिक समय में पतंग के प्रति लोगों का प्रेम कम हो गया है। पहले पतंगबाजी के मुकाबले बहुत होते थे किन्तु अब पहले जैसे पारगंत पतंगबाज नहीं दिखाई देते न ही मुकाबले। उत्तर प्रदेश में रक्षा बन्धन, स्वतन्त्रा दिवस, दीपावली, ईद और मकरसंक्रान्ति पर पतंग उड़ाने का खास रिवाज है।

कितनी पुरानी है पतंगबाजी

ग्रीक इतिहासकारों के मुताबिक पतंगबाजी का खेल 2500 वर्ष पुराना है जबकि अधिकतर लोगों का मानना है कि पतंग बाजी की शुरूआत चीन में हुई। चीन में पतंगबाजी का इतिहास 2000 साल से भी ज्यादा का बताया जाता है। कुछ लोग पतंगबाजी को पर्शिया की देन मानते हैं। वहीं अधिकांश इतिहासकार पतंग का जन्म चीन में ही मानते हैं। उनके अनुसार चीन के एक सेनापति हान सीज ने कागज को चौकोर काटकर उसे हवा में उड़ाकर अपने सैनिकों को संदेश भेजा और बाद में कई रंगों की पतंग बनाई गई।

पौराणिक समय से चलती आ रही पतंग

हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध और धार्मिक ग्रन्थ रामचरित मानस में महाकवि तुलसीदास ने ऐसे प्रसंगों का उल्लेख किया है जब श्री राम ने अपने भाईयों के साथ पतंग उड़ाई थी। इस सन्दर्भ में बालकाण्ड की चौपाई है-

राम एक दिन चंग उड़ाई।

इन्द्रलोक तक पहुंची जाई।।

इस सन्दर्भ में एक अन्य रोचक प्रसंग है। पम्पापुर से हनुमान को बुलाया गया था तब हनुमान बाल रूप में थे जब वो आए तब मकरसंक्रान्ति का पर्व था। श्रीराम भाईयों और मण्डली के साथ पतंग उड़ाने लगे कहा गया कि वह पतंग उड़ते हुए देवलोक जा पहुंची। उस पतंग को देखकर इन्द्र के पुत्र जयन्त की पत्नी आकर्षित हो गई। वह उस पतंग और पतंग उड़ाने के वाले के बारे में सोचने लगी।

जासु चंग असु सुन्दरताई।

सो पुरूष जग में अधिकाई।।

इस भाव के मन में आते ही उसने पतंग को पकड़ लिया और सोचने लगी कि पतंग उड़ाने वाला अपनी पतंग लेने जरूर आएगा। उधर पतंग दिखाई नहीं दी तो बालक श्री राम ने हनुमान को पता लगाने भेजा। पवन पुत्र हनुमान आकाश में उड़ते हुए आकाश में जा पहुंचे वहां देखा कि एक सुन्दर स्त्री उस पतंग को अपने हाथ में पकड़े हुए है उन्होंने पतंग की मांग की तो उस स्त्री ने पूछा ? ये पतंग किसकी है हनुमान जी ने रामचन्द्र का नाम बताया। इस पर उसने दर्शन करने की इच्छा प्रकट की। हनुमान यह सुनकर लौट आए और सारा किस्सा श्रीराम को सुनाया। श्रीराम ने यह सुनकर हनुमान को वापस भेजा और कहा कि वे उन्हें चित्रकूट में अवश्य दर्शन देंगे। हनुमान ने यह उत्तर जयन्त की पत्नी को सुनाया। जिसे सुनकर जयन्त की पत्नी ने पतंग छोड़ दी।

मुगलकाल में भी होती थी पतंगबाजी

भारत में पतंग उड़ाने का शौक पुराना है। कुछ लोगों के अनुसार पवित्र लेखों की खोज में लगे चीनी बौद्ध यात्रियों द्वारा पतंगबाजी का शौक भारत पहुंचा। मुगलकाल में खुद बादशाह और शहजादें भी पतंगबाजी का खेल खेलते थे। उसी समय पेंच लड़ाने की प्रतियोगिता शुरू हुई। मुगल सम्राट बहादुरशाह जफ़र भी पतंगबाजी का शौकीन था। मुगलिया दौर के बाद लखनऊ, रामपुर और हैदराबाद के नवाबों पर भी पतंगबाजी का खुमार चढ़ा। नवाबों ने पतंगबाजी को गरीबी दूर करने का माध्यम भी बनाया “ये लोग अपनी पतंगों में अशरफियां बांधकर उड़ाया करते थे। बाद में पतंग की डोर तोड़ दिया करते थे। ताकि गाँव के लोग उन्हें लूट सकें। धीरे-धीरे नवाबों को यह शौक आम आदमी की जिन्दगीं का हिस्सा बनता गया।

गुजरात में मनाया जाता है पतंग महोत्सव

मकरसंक्रान्ति के दिन गुजरात के अहमदाबाद में अन्तरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव मनाया जाता है जिसमें देश के ही नहीं, विदेशों के भी पतंगबाज हिस्सा लेते हैं। यह महोत्सव 1989 से मनाया जाता है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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