जन्मदिन विशेष: शर्मिला को देखते ही दिल दे बैठे थे पटौदी

जन्मदिन विशेष: शर्मिला को देखते ही दिल दे बैठे थे पटौदी27 दिसंबर, 1969 को पटौदी की बेगम बनी थीं शर्मिला

नई दिल्ली। गुजरे जमाने की अदाकारा शर्मिला टैगोर ने हिंदी फिल्मों में जो मुकाम हासिल किया है, वह कम लोगों को नसीब हुआ है। वर्ष 1959 से 1984 तक रुपहले पर्दे पर शर्मिला के रूप और अदाओं का राज रहा है। वह 1991 से 2010 तक अलग अंदाज में पर्दे पर सक्रिय रहीं। उन्हें बेहतरीन अभिनय के लिए दो बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और दो बार फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।

'अराधना', 'अमर प्रेम', 'सफर', 'कश्मीर की कली', 'मौसम', 'तलाश','वक्त','फरार', 'आमने-सामने' जैसी फिल्में शर्मिला के अभिनय की कहानी बयां करती हैं। उन्हें वर्ष 2013 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से नवाजा जा चुका है।

शर्मिला भारतीय फिल्मों की सशक्त अभिनेत्री रही हैं। उनका जन्म हैदराबाद में एक हिंदू बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता गितींद्रनाथ टैगोर गुलाम भारत में एक कंपनी में महाप्रबंधक थे। उनकी मां असम से थीं। शर्मिला की नानी नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के भाई द्विजेंद्रनाथ टैगोर की नातिन थीं।

शर्मिला का विवाह भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान पटौदी के नवाब मंसूर अली खान पटौदी से 27 दिसंबर, 1969 को हुआ था। शर्मिला की खूबसूरती का जादू पटौदी पर इस कदर बरपा था कि वह उन्हें देखते ही एक ही नजर में अपना दिल दे बैठे थे। शर्मिला भी उनकी तरफ काफी आकर्षित हुईं और दोनों के बीच मुलाकातें बढ़ने लगीं। दोनों एक-दूसरे को प्यार करने लगे और जिंदगीभर साथ रहने का निर्णय लिया।

शर्मिला- पटौदी की शाही शादी में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन और इंदिरा गांधी जैसी हस्तियां भी शामिल हुई थीं

विवाह के बाद शर्मिला ने इस्लाम कबूल कर लिया और वह नाम आयशा सुल्तान बन गईं। वर्ष 2011 में 70 वर्ष की आयु में पटौदी का निधन हो गया। वह फेफड़े के गंभीर संक्रमण से पीड़ित थे। शर्मिला आज अकेली हैं। उनके तीन बच्चे हैं -सैफ अली खान, सबा अली खान और सोहा अली खान। सैफ, सोहा फिल्म-जगत में सक्रिय हैं, जबकि सबा अली खान आभूषण डिजाइनर हैं।

शर्मिला और राजेश खन्ना की जोड़ी खूब सफल रही। इस जोड़ी ने एक समय सफलता के मिसाल कायम किए। दोनों ने कई हिट फिल्में दीं, जिनमें 'अमर प्रेम', 'दाग', 'अराधना' उल्लेखनीय हैं।

शर्मिला आज भले ही उम्र के तीसरे पड़ाव पर हैं, लेकिन उनका मन आज भी युवा है। इस बात का पता हाल ही में तब चला, जब उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में एक कार्यक्रम में एक बार फिर से युवा बनने की इच्छा जाहिर की।

'अराधना', 'अमर प्रेम', 'सफर', 'कश्मीर की कली', 'मौसम', 'तलाश','वक्त','फरार', 'आमने-सामने' जैसी फिल्में शर्मिला के अभिनय की कहानी बयां करती हैं। उन्हें वर्ष 2013 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से नवाजा जा चुका है।

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