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मीना कुमारी: जिसने अदाकारी में ही नहीं नज़्मों में भी दिखाए अपने जज़्बात  

Divendra SinghDivendra Singh   1 Aug 2018 4:59 AM GMT

मीना कुमारी: जिसने अदाकारी में ही नहीं नज़्मों में भी दिखाए अपने जज़्बात  मीना कुमारी।

मीना कुमारी ने अपनी अदाकारी के साथ ही अपनी कलम के जादू से भी अपने प्रशंसकों को दीवाना बना रखा था। उनके अदाकारी के जितने दीवाने हैं उतने ही उनकी नज्मों और शायरियों के भी।

एक अगस्त, 1932 को महजबीन जिन्हें हम मीना कुमारी के नाम से जानते हैं ने इस दुनिया में आयी थीं। पैदा होते ही उनके मां-बाप से उन्हें अनाथालय की सीढ़ियों पर छोड़ दिया था, क्योंकि वो इतने गरीब थे कि उनकी बेटी उनके लिए बोझ सी लगी थी।

आगाज़ तॊ होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वॊ नाम नहीं होता

जब ज़ुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं हॊता

हँस- हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख्स़ की किस्मत में ईनाम नहीं होता

बहते हुए आँसू ने आँखों से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वॊ जाम नहीं होता

दिन डूबे हैं या डूबे बारात लिये कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता

पिता अली बख्श और मां इकबाल बेगम ने उन्हें अनाथालय के बाहर सीढ़ियों पर छोड़ भी दिया लेकिन पिता का मन नहीं माना। पलट कर अली बख्श भागे और बच्ची को गोद में उठा कर घर ले आए। किसी तरह परवरिश की।

महजबीन ने छोटी उम्र में ही घर का सारा बोझ अपने कंधों पर उठा लिया। सात साल की उम्र से ही फिल्मों में काम करने लगीं। बेबी मीना के नाम से पहली बार फिल्म 'फरजद-ए-हिंद' में नजर आईं। इसके बाद लाल हवेली, अन्नपूर्णा, सनम, तमाशा आदि कई फिल्में कीं। लेकिन उन्हें स्टार बनाया 1952 में आई फिल्म 'बैजू बावरा' ने। इस फिल्म के बाद वह लगातार शोहरत की बुलंदियां चढ़ती गईं।

कहते हैं न जो इंसान अपनी जिंदगी में जितना मुकाम हासिल करता है, निजी जिंदगी में उतनी ही परेशानियां झेलता है। मीना कुमारी ने कैरिअर में जो बुलंदियां हासिल की, निजी जिंदगी में उतनी ही मुश्किलें झेलीं। जन्म से लेकर अंतिम घड़ी तक उन्होंने दुख ही दुख झेला।

चौदह साल में बनकर तैयार हुई थी पाकीज़ा।

अपनी पहचान को तलाशती मीना कुमारी को लगभग दस वर्षों तक फ़िल्म जगत में संघर्ष करना पड़ा। इस बीच उनकी 'वीर घटोत्कच' (1949) और 'श्री गणेश महिमा' (1950) जैसी फ़िल्में प्रदर्शित तो हुई, पर उन्हें इनसे कुछ ख़ास पहचान नहीं मिली। वर्ष 1952 में मीना कुमारी को विजय भट्ट के निर्देशन में 'बैजू बावरा' में काम करने का मौक़ा मिला। इस फ़िल्म की सफलता के बाद मीना कुमारी बतौर अभिनेत्री फ़िल्म जगत में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गईं।

यह न सोचो कल क्या हो
कौन कहे इस पल क्या हो

रोओ मत, न रोने दो
ऐसी भी जल-थल क्या हो

बहती नदी की बांधे बांध
चुल्लू में हलचल क्या हो

हर छन हो जब आस बना
हर छन फिर निर्बल क्या हो

रात ही गर चुपचाप मिले
सुबह फिर चंचल क्या हो

आज ही आज की कहें-सुने
क्यों सोचें कल, कल क्या हो.

उसी साल मीना कुमारी का फ़िल्म निर्देशक कमाल अमरोही के साथ विवाह हो गया। वर्ष 1964 में मीना कुमारी और कमाल अमरोही की विवाहित ज़िंदगी में दरार आ गई। काम के प्रति समर्पित मीना कुमारी अपने काम में कमाल अमरोही की बेवजह दख़ल को बर्दाश्त नहीं कर सकीं। वर्ष 1964 के बाद मीना कुमारी और कमाल अमरोही अलग-अलग रहने लगे और उन्होंने अपने आप को शराब के नशे में डूबो लिया।

वर्ष 1962 मीना कुमारी के सिनेमा करियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। इस वर्ष उनकी 'आरती', 'मैं चुप रहूंगी' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। इसके साथ ही इन फ़िल्मों के लिए वे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार के लिए नामित की गईं। यह 'फ़िल्मफेयर' के इतिहास में पहला ऐसा मौक़ा था, जहां एक अभिनेत्री को 'फ़िल्मफेयर' के तीन वर्गों में नामित किया गया था।

मीना कुमारी को मिले सम्मानों की चर्चा की जाए तो उन्हें अपने अभिनय के लिए चार बार 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मीना कुमारी को सबसे पहले वर्ष 1953 में प्रदर्शित फ़िल्म 'परिणीता' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1954 में भी फ़िल्म 'बैजू बावरा' के लिए उन्हें 'फ़िल्मफेयर' के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इसके बाद मीना कुमारी को 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार के लिए लगभग आठ वर्षों तक इंतज़ार करना पड़ा और वर्ष 1963 में प्रदर्शित फ़िल्म 'साहिब बीबी और ग़ुलाम' के लिए उन्हें 'फ़िल्मफेयर' मिला। इसके बाद वर्ष 1966 में फ़िल्म 'काजल' के लिए भी मीना कुमारी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार से सम्मानित की गईं।

मीना कुमारी अदाकारा के साथ ही शायरा भी थीं।

मीनाकुमारी की वसीयत के मुताबिक प्रसिद्ध फ़िल्मकार और लेखक गुलज़ार को मीनाकुमारी की 25 निजी डायरियां मिली थीं। उन्हीं में लिखी नज़्मों, ग़ज़लों और शेरों के आधार पर गुलज़ार ने मीनाकुमारी की शायरी का यह एकमात्र प्रामाणित संकलन तैयार किया है।

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